
इंतजार : 12 साल से बंद पड़ी हैं जिला में लगी 2 भस्मक मशीनें
नालंदा जिले में 12 साल से बंद पड़ी भस्मक मशीनों के कारण मेडिकल कचरे का निपटान पटना पर निर्भर है। पावापुरी मेडिकल कॉलेज और बीड़ी मजदूर अस्पताल में ये मशीनें चालू नहीं हो सकी हैं। जिले के 172 अस्पतालों से रोजाना 2 क्विंटल से अधिक मेडिकल वेस्ट निकलता है, जिससे प्रदूषण और संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है।
इंतजार : 12 साल से बंद पड़ी हैं जिला में लगी 2 भस्मक मशीनें मेडिकल कचरा निपटान के लिए अब भी पटना पर निर्भर पटना आईजीआईएमएस भेजा जा रहा मेडिकल कचरा नवादा-शेखपुरा को भी मशीनों का नहीं मिल पा रहा लाभ पावापुरी मेडिकल कॉलेज और बीड़ी मजदूर अस्पताल में लगी भस्मक मशीनों में लग रही जंग जिला के 172 अस्पतालों से रोजाना निकलता है 2 क्विंटल से अधिक मेडिकल वेस्ट फोटो : पावापुरी मेडिकल वेस्ट : पावापुरी भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान में लगी भस्मक मशीन। बिहारशरीफ/पावापुरी, निज संवाददाता। नालंदा जिले में मेडिकल कचरे के निपटारे को लेकर काफी गंभीर स्थिति बनी हुई है।

पावापुरी स्थित भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान (बीमिम्स) और बीड़ी मजदूर अस्पताल में 12 साल से अधिक समय से लगी भस्मक मशीन (इंसिनीरेटर) आज तक चालू नहीं हो सकी है। इस कारण जिले के सभी अस्पतालों व क्लीनिकों से निकलने वाला जैव चिकित्सा कचरा (मेडिकल वेस्ट) निपटान के लिए अब भी पटना आईजीआईएमएस में भेजा जा रहा है। इसके शुरू होने से नालंदा के अलावा नवादा और शेखपुरा जिला को भी लाभ मिलेगा। जिला के 172 अस्पतालों से रोजाना दो क्विंटल से अधिक मेडिकल वेस्ट निकलता है। हालांकि, मेडिकल कचरे के उठाव के लिए पटना आईजीआईएमएस से प्रतिदिन एक वाहन आता है, जो नालंदा जिले की बढ़ती जरूरतों के लिए नाकाफी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, जिले में कम से कम एक आधुनिक भस्मक यूनिट और तीन समर्पित कचरा उठाव वाहन होने चाहिए। जो निरंतर इन कचरा को भस्मक मशीनों तक पहुंचा सके। नवादा व शेखपुरा को भी होता लाभ : यदि पावापुरी मेडिकल कॉलेज व बीड़ी अस्पताल की भस्मक मशीनें चालू हो जाती हैं, तो नालंदा के साथ-साथ नवादा और शेखपुरा जिलों को भी इससे फायदा होगा। इन जिलों की क्लीनिकों से उत्पन्न मेडिकल कचरे को स्थानीय स्तर पर ही सुरक्षित रूप से नष्ट किया जा सकेगा। इससे समय और संसाधन दोनों की बचत होगी। जिले में स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति : नालंदा जिले में 500 बेड वाला पावापुरी मेडिकल कॉलेज, 300 बेड वाला सदर अस्पताल, 30-30 बेड वाले सात सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा प्रत्येक प्रखंड में 6-6 बेड वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कार्यरत हैं। साथ ही, लगभग 150 निबंधित निजी क्लीनिक भी जिला के विभिन्न शहरों में चल रहे हैं। इसके अलावा पैठना में भी अस्पताल शुरू है। लगभग 172 अस्पतालों से प्रतिदिन सैकड़ों किलोग्राम जैविक कचरा निकलता है, जिसका उचित निपटान बहुत ही जरूरी है। इसके अलावा भी शहरों में छोटे मोटे दर्जनों क्लीनिक व जांच घर चल रहे हैं। उन्हें जोड़ा जाए, तो यहा आंकड़ा और गंभीर हो सकता है। 2013 से अब तक नहीं हुई मशीन की जांच : पावापुरी मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2013 में भस्मक मशीन लगाई गई थी। लेकिन, अब तक इसकी टेस्टिंग तक नहीं हो सकी है। यही स्थिति बीड़ी अस्पताल में लगी मशीन की भी है। कॉलेज व अस्पताल प्रशासन ने इसे चालू कराने के लिए कई बार स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र भेजा है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। नई सरकार के गठन के बाद इसे लेकर लोगों में एक नई उम्मीद जागी है। जहां-तहां खुले में फेंका जा रहा मेडिकल कचरा : स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिहारशरीफ शहर के रांची रोड जैसे आबादी वाले इलाकों में भी कई जगहों पर मेडिकल कचरा खुले में फेंका जा रहा है। सदर अस्पताल परिसर के पश्चिमि भाग में भी यदा कदा मेडिकल वेस्ट फेंका हुआ मिलता है, जो संक्रमण व प्रदूषण का गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। प्राचार्या ने जताई चिंता, कहा प्रयास किया जाएगा : पावापुरी मेडिकल कॉलेज संस्थान लगातार स्वास्थ्य विभाग से मशीन को चालू कराने की मांग कर रहा है। इसमें प्रदूषण विभाग के द्वारा अनुमति नहीं मिलने से समस्या आ रही है। उन्होंने बताया कि विभाग को फिर से पत्र लिखा जाएगा। इसका जल्द से जल्द समाधान कराने का प्रयास किया जाएगा। ताकि, इसका लाभ लिया जा सके। प्रो. डॉ. सर्विल कुमारी, प्राचार्या

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