हर साल 10 फीसद बढ़ जाती है लागत पर उस अनुपात में कीमत नहीं मिलती
किसानों की समस्याओं पर आधारित इस कहानी में खेती की लागत में हर साल 10% की बढ़ोतरी, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितता पर चर्चा की गई है। किसानों को लागत के अनुपात में उपज का मूल्य नहीं मिल रहा है। सरकारी नलकूपों की खराब स्थिति और निजी बोरिंग पर निर्भरता ने उनकी स्थिति को और खराब कर दिया है।

धरती पुत्रों की व्यथा 07 : हर साल 10 फीसद बढ़ जाती है लागत पर उस अनुपात में कीमत नहीं मिलती बाजार की अनिश्चितता के कारण मुनाफे पर मंडराता रहता है संशय के गहरे बादल जलवायु परिवर्तन से रूठीं नदियां और आहर-पइन, 4 माह में ही सूख रही जलधारा मौसत छोड़ रहा अन्नदाताओं का साथ, बिजली और निजी बोरिंग के भरोसे खेती फोटो खेती : सरदार बिगहा के पास खेत में लहलहाती भिंडी की फसल। बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। धरती पुत्रों की व्यथा सीरीज के सातवें अंक में आज खेती की बढ़ती लागत, सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधनों, संसाधन का अभाव और बाजार के उस चक्रव्यूह की पड़ताल कर रहे हैं, जिसमें किसान हर साल फंसते हैं।
एक तरफ जहां खेती के आधुनिक साधनों और मशीनों का दायरा बढ़ा है, वहीं जलवायु परिवर्तन और बढ़ती महंगाई ने अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है। जमीनी हकीकत यह है कि हर साल खेती की लागत (बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक) में 10 फीसद का इजाफा हो रहा है। लेकिन, इस बढ़ती लागत के अनुरूप उपज की कीमत मिलेगी या नहीं, इस पर हमेशा संशय के बादल छाए रहते हैं। प्रकृति और बाजार की दोहरी मार झेल रहे किसान आज सिर्फ आधुनिक मशीनों के दम पर अपनी खेती की सांसें बचाए हुए हैं। नयी-नयी वेरायटी और अधिक उपज देने वाले बीज अन्नदाताओं को जरूर थोड़ी राहत दे रही है। नूरसराय के किसान संजीव कुमार, रहुई के मनोज कुमार कहते हैं कि इस बार गेहूं की खेती में लागत 12 से 14 सौ रुपये प्रति एकड़ बढ़ी है। लेकिन, खुले बाजार में उपज का दाम कम मिल रहा है। पिछले साल 24 सौ से 25 सौ रुपए क्विंटल कीमत मिली थी। इस बार व्यापारी 22 सौ से 2250 रुपये क्विंटल से अधिक देने को तैयार नहीं हैं। ऐसा ही हाल धान में भी हुआ था। खुले बाजार में 2000 से 2200 रुपए क्विंटल धान बेचना पड़ा था। यही कीमत पिछले साल भी थी। सूखती नदियां और कबाड़ बन गये सरकारी नलकूप: पहले नालंदा में 355 राजकीय नलकूप थे। वर्तमान में इनमें से महज 197 ही चालू हैं। 158 विभिन्न तकनीकी कारणों से खराब हैं। नलकूपों के खराब रहने के कारण किसान पूरी तरह निजी बोरिंग पर आश्रित हैं। पंचायत प्रतिनिधियों की अनदेखी ऐसी कि 80 से ज्यादा नलकूप मामूली फॉल्ट की वजह से बंद हैं। कई प्रखंड ऐसे हैं, जहां के सारे के सारे नलकूप बेकार पड़े हैं। इतना ही नहीं पहले नदियों, आहर और पइन के बूते आठ महीने तक खेतों की सिंचाई के लिए पानी आसानी से उपलब्ध रहता था। लेकिन, जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक संसाधनों का गला घोंट दिया है। अब महज चार महीने में ही नदियों का पानी खत्म हो जाता है और वे सूखकर मैदान बन जाती हैं। ऐसे संकट के समय में सरकारी नलकूपों से सिंचाई की उम्मीद थी। लेकिन, देखरेख के अभाव में अधिकतर सरकारी नलकूप जंग खाकर बेकार पड़े हैं। मजबूरन किसानों को निजी नलकूपों (बोरिंग) का सहारा लेना पड़ रहा है। एक बोरिंग कराने और मोटर लगाने पर करीब एक लाख 80 हजार तक खर्च हो जाते हैं। मानसून का साथ छुटने और बिजली पर बढ़ती निर्भरता सिंचाई का खर्च बढ़ा रहा है, जो सीधे लागत में जुड़कर मुनाफे को खा रहा है। लागत का बढ़ता ग्राफ और बाजार का खेल: सरदार बिगहा के धनंजय कुमार, अस्थावां के प्रेम रंजन कहते हैं कि महंगाई के दौर में खाद (उर्वरक), उन्नत बीज, कीटनाशक और तकनीकी मदद का खर्च हर साल आठ से दस फीसदी बढ़ जाता है। लेकिन, उस अनुपात में उन्हें बाजार में कीमत नहीं मिल पाती। बाजार का अर्थशास्त्र किसानों के लिए एक क्रूर मजाक बन गया है। खपत और उपज में जितना अधिक अंतर होता है, दाम में उतना ही इजाफा होता है। विडंबना देखिए, जब मौसम साथ देता है और खेतों में बंपर पैदावार होती है, तो बाजार में उपज की भरमार हो जाती है। मांग से अधिक उपज होने पर कीमतें इस कदर धड़ाम होती हैं कि किसानों को अपनी लगाई गई मूल पूंजी लौटाने में भी आफत आ जाती है। पंचायत स्तर पर सुरक्षित भंडारण (कोल्ड स्टोरेज/गोदाम) की व्यवस्था न होने के कारण वे उपज को रोक कर भी नहीं रख सकते, और औने-पौने दाम पर बिचौलियों को बेचने को विवश हो जाते हैं। बाजार का अभाव, बिचौलियों की मनमानी : गिरियक के किसान मुकेश कुमार,नूरसराय के संजय कुमार कहते हैं कि जिले में नियंत्रित बाजार का अभाव है। इसकी फायदा बिचौलिये उठाते हैं। अन्नदाताओं की लाचारी यह कि भंडारण की क्षमता न रहने के कारण हार्वेस्टिंग (दौनी) के बाद उपज बेचनी मजबूरी हो जाती है। ऐसे में किसानों का मुनाफा घटता और बिचौलिये चांदी काटते हैं। खेती में हर साल लागत कुछ न कुछ बढ़ जाती है। परंतु, कीमत में असमानता उम्मीदों पर पानी फेर देता है। समस्या यह भी कि जिले में अधिकांश छोटे व मध्यम किसान हैं। इस वजह से यांत्रिकरण का लाभ लेने में दिक्कत है। अधिक खर्च पर मजदूरों से काम कराना पड़ता है। मशीनों ने दी संजीवनी तो मिली थोड़ी राहत: घोर निराशा के बीच आधुनिक कृषि यंत्र ही किसानों के लिए एकमात्र संजीवनी साबित हुए हैं। हरनौत के किसान संतोष कुमार, कतरीसराय के नीतीश कुमार कहते हैं कि अगर आज ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और रोटावेटर जैसी मशीनें न हों, तो खेती करना बूते के बाहर हो जाएगा। पारंपरिक और आधुनिक खेती के खर्च का अंतर इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर एक एकड़ गेहूं या धान की फसल मजदूरों से कटवाकर उसकी दौनी (थ्रेसिंग) कराई जाए, तो मजदूरी के रूप में करीब नौ हजार रुपये का खर्च आता है। वहीं, हार्वेस्टर से यह काम महज 25 सौ रुपये में चंद घंटों के भीतर आसानी से सिमट जाता है। मशीनों की उपलब्धता ने न केवल किसानों के समय और भारी खर्च की बचत की है, बल्कि मजदूरों की भारी किल्लत से भी उन्हें निजात दिलाई है। क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती हो गयी है। बीज, खाद, कीटनाशक व सिंचाई में अधिक खर्च के कारण खेती की लागत बढ़ रही है। नियंत्रित बाजार का अभाव के कारण किसानों का मुनाफा घट रहा है। जिले में ज्यादातर छोटे किसान हैं। उनके पास भंडारण की व्यवस्था नहीं है। उपज बेचनी लाचारी हो जाती है। दाम कम मिलता है। उमेश नारायण उमेश, कृषि वैज्ञानिक, हरनौत कृषि विज्ञान केंद्र कहां हार रहा है किसान : 1. नहरी सिंचाई प्रणाली ध्वस्त होने से किसान पानी का खरीददार बन गया है किसान । 2. भंडारण का इंतजाम न होने से कटनी के तुरंत बाद फसल बेचनी पड़ती है। 3. छोटे जोत के कारण बड़ी कृषि यंत्रों का इस्तेमाल करना संभव नहीं होता। 4. कीटनाशक और खाद-बीज का दाम चढ़ने से बढ़ रही खेती की लागत।
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