नालंदा विवि: 5 देशों के विशेषज्ञों ने मंथन कर तलाशे ग्रामीण विकास के नए रास्ते

नालंदा विवि: 5 देशों के विशेषज्ञों ने मंथन कर तलाशे ग्रामीण विकास के नए रास्ते

संक्षेप:

नालंदा विश्वविद्यालय में भारत, जापान, इंडोनेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड के विशेषज्ञों ने ग्रामीण विकास पर चर्चा की। कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि ग्रामीण परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक बदलाव का भी हिस्सा है। कार्यशाला में जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और युवाओं के सशक्तिकरण पर विमर्श हुआ।

Dec 10, 2025 10:14 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, बिहारशरीफ
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नालंदा विवि: 5 देशों के विशेषज्ञों ने मंथन कर तलाशे ग्रामीण विकास के नए रास्ते भारत, जापान, इंडोनेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड के प्रतिनिधियों ने चुनौतियों और अवसरों पर की चर्चा कुलपति प्रो. सचिन बोले- ग्रामीण विकास सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक बदलाव की है प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और युवाओं के सशक्तिकरण पर हुआ विमर्श, किया ग्रामीण बिहार का भ्रमण ससाकावा पीस फाउंडेशन और एशियन कॉन्फ्लुएंस के सहयोग से आयोजित हुई क्षेत्रीय कार्यशाला फोटो: नालंदा कार्यशाला: राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते डॉ. नोबुको कयाशीमा, साथ में मंच पर कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी। राजगीर, निज संवाददाता।

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प्राचीन ज्ञान की धरती नालंदा विश्वविद्यालय में एक बार फिर एशिया के साझा भविष्य पर गंभीर मंथन हुआ। यहां एशियन डायलॉग ऑन रूरल डेवलपमेंट के तहत एशिया की साझी चुनौतियों और अवसरों पर एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय कार्यशाला संपन्न हुई। ससाकावा पीस फाउंडेशन (जापान), एशियन कॉन्फ्लुएंस (भारत) और मुसुबि-ते फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में भारत, इंडोनेशिया, जापान, फिलीपींस और थाईलैंड के नीति विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि ग्रामीण परिवर्तन को महज आर्थिक नजरिए से देखना काफी नहीं है, यह एक गहरे सांस्कृतिक बदलाव की प्रक्रिया भी है। औद्योगिकीकरण के दबाव में पारंपरिक ढांचे और कारीगर वर्ग हाशिए पर जा रहे हैं। ऐसे में आधुनिकीकरण को संवेदनशील तरीके से अपनाना होगा। आज जब ग्लोबल साउथ पुराने मॉडलों से आगे बढ़ रहा है, तब स्थानीय ज्ञान और जमीनी नवाचार ही विकास के नए रास्ते खोलेंगे। इन मुद्दों पर हुआ विचार-विमर्श: कार्यशाला के दौरान जनसांख्यिकीय परिवर्तन, जलवायु अनुकूलन, डिजिटल समावेशन, संस्थागत नवाचार और समावेशी आर्थिक विकास जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की गई। जापान रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. कोसुके मोतानी ने भारत और जापान की जनसांख्यिकीय स्थितियों की तुलना की। वहीं, इंटेलकैप के संतोष सिंह और अश्व फाइनेंस के आत्रेय रायाप्रोलु ने ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं पर बात रखी। ग्रामीण जीवन को करीब से जाना: प्रतिभागियों ने सिर्फ बंद कमरे में चर्चा नहीं की, बल्कि ग्रामीण बिहार का अध्ययन भ्रमण भी किया। उन्होंने बोधगया और नालंदा के ऐतिहासिक स्थलों के साथ-साथ गांवों का दौरा कर वहां की वास्तविक परिस्थितियों और समुदाय आधारित विकास मॉडलों को समझा। मौके पर ससाकावा पीस फाउंडेशन की डॉ. नोबुको कयाशीमा, एशियन कॉन्फ्लुएंस के सब्यसाची दत्ता, मेघालय के सांसद डॉ. रिकी ए. सिंगकॉन और पूर्व राजदूत संजय कुमार पांडा समेत कई गणमान्य लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए।