नुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं

नुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं

संक्षेप:

नुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहींनुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहींनुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट,...

Oct 12, 2025 09:49 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, बिहारशरीफ
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नुक्कड़ पर चुनाव : सरमेरा बाजार नुक्कड़ पर चुनाव : नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं नेताजी को चाहिए वोट, आमलोगों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं चुनाव आते ही बन जाते हैं लोगों का हितैषी, मतदान होते ही उनके दर्शन दुर्लभ अपना चेहरा चमकाने में लगे रहते हैं नेताजी टिकट के लिए भाग-दौड़, नहीं मिलने पर अपने आका को भी नहीं छोड़ते हैं वे सरमेरा, निज संवाददाता। स्थानीय बाजार के चौराहे पर इस समय चुनावी माहौल की गर्मी और चाय की भाप दोनों साथ-साथ उठ रही है। चौक पर लगे पोस्टर, बैनर और माइक से बजते गीतों के बीच हर किसी की जुबान पर एक ही बात है-नेताजी फिर आ गए, वोट मांगने।

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हर बार की तरह इस बार भी वही दृश्य है। वही वादे, वही भाषण, वही चमकते चेहरे और वही अनसुनी समस्याएं। फर्क सिर्फ इतना है कि जनता अब पहले से ज्यादा जागरूक और नाराज दिख रही है। सरमेरा बाजार में चाय की दुकानें इन दिनों राजनीतिक मंच बनी हुई है। वहां दिनभर बस चुनावी चर्चा ही चलती रहती है। चाय की दुकान के आगे लगी बेंच पर बैठते हुए समाजसेवी शरत कुमार गौतम अपने दोस्तों के साथ कप के इंतजार में बैठे हैं। इसी बीच वे कहते हैं कि नेताजी को बस वोट चाहिए। उन्हें आमलोगों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। चुनाव आते ही वे हमारे हितैषी बन जाते हैं। लेकिन, वही नेता मतदान के बाद गायब हो जाते हैं। उनके दर्शन तक दुर्लभ हो जाते हैं। बस नेता जी अपना चेहरा चमकाने में लगे रहते हैं। उद्घाटन और शिलान्यास के लिए झोली में कैंची लेकर चलते हैं। उन्हें उन योजनाओं की गुणवत्ता या किसी अन्य पहलुओं से कोई मतलब नहीं होता है। हद तो यह कि कई नेताजी पार्टिंयों से टिकट के लिए भाग-दौड़ करते हैं। लेकिन, जव उन्हें टिकट नहीं मिलता है, तो वे अपने ही आका को भी नहीं छोड़ते हैं। उनकी बातों को सुन रहे उनके साथ आए बाल्मीकि प्रसाद ने कहा कि नए युवाओं को मौका ही कहां मिलता है। वे तो सालों से बस अपने दलों का बैनर पोस्टर व झंडा टांग रहे हैं। वहां टीवी पर चल रही खबरों को देखते हुए विपीन राउत कहते हैं नेता तो जनता के सेवक होते हैं। लेकिन, जीतने के बाद वहीं नेता अपने ही लोगों को भूल जाते हैं। उनके वादा हवा हवाई ही सिद्ध होते हैं। उनकी बातों को सुन रहे शरत कुमार गौतम व्यंग्य से कहते हैं नेताजी जब भी कहते हैं कि वो जनता के सेवक हैं, तभी हमें सबसे ज्यादा डर लगता है। क्योंकि, सेवा के नाम पर अब तक बस अपने घर-परिवार को ही मजबूत किया गया है। उनकी बातों को आगे बढ़ाते हुए बाल्मीकि प्रसाद कहते हैं चुनाव आते ही सब याद आने लगता है। किसानों की, मजदूरों की, युवाओं की, महिलाओं की याद आने लगती है। लेकिन, वोटिंग खत्म होते ही उनका खेल भी खत्म हो जाता है। जनता के बीच आने की बात तो दूर, उनके दर्शन तक दुर्लभ हो जाते हैं। फिर कोई सड़क टूटी रहे या अस्पताल बंद हो, उनकी गाड़ी कभी नहीं रुकती। कई बार तो कहने पर भी कोई सुधार नहीं होता है। तब मन काफी कचोटता है। विधायक व जनप्रतिनिधि जब लोगों के बीच से चुने जाएंगे, तभी मतदाताओं का भला होगा। नेताओं की ‘जनसेवा सिर्फ चुनावी एजेंडा : इतना सुनते ही समाजसेवी मुनारिक प्रसाद कहते हैं कि पांच साल तक नेताजी किसी गरीब की झोपड़ी नहीं देखते, लेकिन चुनाव आते ही सबको बहन-भाई कहकर हाथ जोड़ने लगते हैं। हमारे बच्चों की पढ़ाई रुकी है, अस्पताल में दवा नहीं है, पर उन्हें सिर्फ वोट चाहिए। उनकी बातों का समर्थन करते हुए युवा मतदाता प्रेमचंद कुमार कहते हैं नेताजी को सिर्फ अपना चेहरा चमकाने का फिक्र रहता है। उन्हें बस मंच, माइक और मीडिया चाहिए। आमलोगों की समस्या उनके भाषण की पंक्तियों तक सीमित रहती है। विकास का मतलब भी अब उनके लिए बस फोटो सेशन हो गया है। इस पर आलोचनात्मक स्वर में बुजुर्ग विपीन राउत कहते हैं असलियत ये है कि नेताजी की राजनीति अब सेवा नहीं, व्यवसाय बन गई है। टिकट के लिए पैरवी, दल-बदल और सियासी समीकरण - यही उनका असली एजेंडा है। जनता तो सिर्फ एक संख्या बनकर रह गई है। चाय की दुकान पर बैठे डब्ल्यू सिंह मुस्कराते हुए कहते हैं टिकट का खेल तो देखिए-जब पार्टी में टिकट नहीं मिलता, तो नेताजी उसी पार्टी को कोसने लगते हैं, जिसे कल तक अपना आदर्श कहते थे। अगर दूसरी पार्टी में टिकट मिल गया, तो वही पुरानी पार्टी अचानक भ्रष्ट लगने लगती है। क्या यही राजनीति है? इस परिचर्चा में शरत कुमार बड़ी दुखी मन से कहते हैं नेताओं की सियासत अब वैचारिक नहीं, व्यक्तिगत हो गई है। वे जनता की नहीं, अपनी कुर्सी की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई अपने आका को छोड़ने में देर नहीं करता, अगर दूसरी तरफ से पद की उम्मीद हो। यह सब टिकट यानि हार जीत का खेल है। इसकी बानगी राजनीति में कभी भी देखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि हमारे इलाके में कई बार देखा गया है, नेता एक दिन पार्टी बदलते हैं और दूसरे दिन उसी पार्टी की विचारधारा का गुणगान करने लगते हैं। जनता अब इसे समझने लगी है। शायद यही वजह है कि अब लोग नेताजी को भी कई बार गंभीरता से नहीं लेते हैं। बदलाव के लिए युवाओं को आना चाहिए आगे : चर्चा का रुख युवाओं की ओर करते हुए विपीन राउत कहते हैं आज के युवा राजनीति से मोहभंग हो कर रहे हैं। वे निर्दलीय छवि बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे, क्योंकि उन्हें पता है कि बिना पैसे और प्रभाव के कोई सुनता ही नहीं। अगर कोई ईमानदार युवा राजनीति में आता भी है, तो सिस्टम उसे दबा देता है। इसी बीच उनकी बातों को काटते हुए प्रेमचंद कुमार कहते हैं राजनीति अब विचार का मंच नहीं, अपनी कमाई बढ़ाने और निवेश करने का माध्यम बन चुकी है। टिकट खरीदना, प्रचार में पैसा लगाना, फिर जीतने के बाद उस पैसे की भरपाई करना, यही नया समीकरण है। ऐसे माहौल में विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है। इसका खामियाजा हम जैसे मतदाताओं को भुगतना पड़ता है। यही कारण है कि गांव के पढ़े-लिखे युवा लड़के राजनीति में नहीं जाना चाह रहे हैं। कोई भी साफ-सुथरी राजनीति करना नहीं चाहता, क्योंकि उसे समर्थन नहीं मिलता है। इसी बीच शरत कुमार गौतम के हाथों की प्याली का चाय खत्म हो जाता है और वे अपने काम पर निकल जाते हैं। इसी के साथ नुक्कड़ पर चल रहे चुनावी चौपाल पर भी ब्रेक लग जाता है। लेकिन, यह चौपाल अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ जाता है। सरमेरा बाजार के नुक्कड़ पर अब माहौल गंभीर हो चुका है। हर कोई एक-दूसरे से सवाल पूछ रहा है क्या नेताजी जनता के लिए हैं, या सिर्फ सत्ता के लिए? हालांकि इस बार आम मतदाता भी अपने जनप्रतिनिधियों व नेताओं को लेकर खुलकर बातें नहीं कर रहे हैं। लेकिन, नेताओं के प्रति उनका आक्रोश स्पष्ट झलक रहा है। जनता अब सिर्फ नेताओं की सुनने वाली नहीं है। अब लोग सवाल पूछ रहे हैं क्या वादा पूरा हुआ, क्या योजना बनी, क्या विकास दिखा? नेता अब पुराने अंदाज में लोगों को बरगलाकर नहीं जीत सकते। नेताओं को अब यह समझना होगा कि जनता सिर्फ मुफ्त की घोषणा से नहीं, ईमानदार काम से खुश होती है। सड़क बने, स्कूल चले, अस्पताल में दवा मिले यही असली विकास है, न कि मंच पर ताली।