
शिक्षित जनप्रतिनिधि ही ला सकते हैं राजनीति में नूतन बदलाव
संक्षेप: हरनौत किचनी शिव मंदिर में आयोजित चाय चौपाल में उपस्थित लोगों ने राजनीति में शिक्षित जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राजनीति में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता का होना जरूरी है ताकि नेता जनता की समस्याओं को समझ सकें और प्रभावी नीतियां बना सकें। शिक्षा को जनप्रतिनिधित्व की अनिवार्य शर्त बनाने की मांग की गई।
चाय चौपाल : हरनौत किचनी शिव मंदिर शिक्षित जनप्रतिनिधि ही ला सकते हैं राजनीति में नूतन बदलाव जनप्रतिनिधियों के लिए भी तय होना चाहिए शिक्षा का एक मापदंड क्लर्क को भी गुजरना पड़ता है परीक्षा के दायरे से, फिर नेताओं पर यह लागू क्यों नहीं फोटो : चाय चौपाल : हरनौत किचनी शिव मंदिर में चाय चौपाल संवाद में शामिल लोग। लोगों की तस्वीरें उनके नाम से। बिहारशरीफ, निज संवाददाता। हरनौत के किचनी शिव मंदिर में पास चाय चौपाल संवाद में लोगों के बीच राजनीति की दिशा और दशा पर खास चर्चा हुई। इसमें चाय की गर्म भाप के साथ लोगों ने इस सवाल पर गंभीर मंथन किया कि क्या अब समय आ गया है जब जनप्रतिनिधियों के लिए भी शिक्षा की न्यूनतम योग्यता तय की जाए।

चर्चा का विषय था शिक्षित जनप्रतिनिधि ही ला सकते हैं राजनीति में नूतन बदलाव। चर्चा में बड़े ही अनमने भाव से सूरज कुमार सूरत ने कहा आज जब हर नौकरी के लिए न्यूनतम योग्यता जरूरी है, तो राजनीति जैसे गंभीर क्षेत्र में क्यों नहीं? जो लोग कानून बनाते हैं, उन्हें कम से कम कानून पढ़ने की समझ तो होनी चाहिए। उनकी बात पर वहां मौजूद शिक्षक अनिल कुमार ने समर्थन जताते हुए कहा जनप्रतिनिधि वही होना चाहिए जो पढ़ा-लिखा हो और जनता के हित में नीतियों को समझ सके। बिना शिक्षा के राजनीति सिर्फ जुमलों और नारों का खेल बनकर रह जाएगी। तभी कारोबारी कारू सिंह ने कहा अब जनता का नजरिया भी बदलना चाहिए। हम अक्सर जाति, धर्म या इलाके के आधार पर वोट देते हैं, जबकि देखना यह चाहिए कि उम्मीदवार कितना शिक्षित और जागरूक है। अगर हमारे प्रतिनिधि पढ़े-लिखे होंगे, तो वे प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझकर हमारे मुद्दों को बेहतर ढंग से उठा सकेंगे। उसका समाधान निकाल सकेंगे। निजी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक मुरारी प्रसाद ने उदाहरण देते हुए कहा एक क्लर्क बनने के लिए इंटर पास होना जरूरी है और अधिकारी बनने के लिए स्नातक की डिग्री चाहिए। लेकिन, विधायक या सांसद बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं मांगी जाती। क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं है? शिक्षा से व्यक्ति में सोचने और तर्क करने की क्षमता आती है। आज की राजनीति में वही आगे बढ़ रहे हैं, जो लोगों को भावनाओं में बहाकर वोट लेते हैं। अगर नेता पढ़े-लिखे होंगे, तो समाज को भी आगे बढ़ाने की सोच रखेंगे। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को भी तब ही गंभीरता से लिया जाएगा। युवा मतदाता अनुराग सिंह ने कहा कि आज राजनीति में पढ़े-लिखे युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। अगर राजनीति में शिक्षित वर्ग आगे नहीं आया, तो देश नारेबाजी में ही उलझा रहेगा। अब राजनीति को विचार और ज्ञान का मंच बनना चाहिए, न कि केवल प्रचार और प्रदर्शन का। नेताओं की शिक्षा का स्तर उनके कार्यकाल की गुणवत्ता को तय करता है। जो व्यक्ति खुद पढ़ा-लिखा नहीं है, वह शिक्षा व्यवस्था को कैसे सुधार सकता है? पंचायत से लेकर संसद तक अगर शिक्षित प्रतिनिधि होंगे, तो नीतियां भी जमीन से जुड़ी और सार्थक होंगी। बातचीत के दौरान एक दिलचस्प विचार भी सामने आया। किसान ब्रजेश कुमार ने कहा नेता का केवल पढ़ा-लिखा होना ही काफी नहीं, उसे ईमानदार और संवेदनशील भी होना चाहिए। कुछ पढ़े-लिखे लोग भी राजनीति में आकर जनता को भूल जाते हैं। इसलिए शिक्षा के साथ-साथ सेवा भाव भी जरूरी है। शिक्षा राजनीति में शुचिता और जिम्मेदारी लाने का प्रमुख आधार है। प्रतिनिधि अगर शिक्षित होंगे, तो वे जनता की समस्याओं को बेहतर समझेंगे, सरकारी योजनाओं की बारीकियों को जानेंगे और संसाधनों का सही इस्तेमाल कर पाएंगे। चाय की आखिरी घूंट के साथ अनिल कुमार ने कहा अब वक्त आ गया है कि जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय की जाए। जैसे क्लर्क, शिक्षक या अफसर को परीक्षा देनी पड़ती है, वैसे ही नेताओं को भी जनता की कसौटी पर खरा उतरने के लिए शिक्षा के दायरे में आना चाहिए। इस चाय चौपाल ने यह साफ कर दिया कि जनता अब जागरूक हो रही है। लोग केवल भाषणों से नहीं, बल्कि समझदारी और जिम्मेदारी से नेतृत्व देखना चाहते हैं। राजनीति में बदलाव तभी संभव है, जब शिक्षा को जनप्रतिनिधित्व की अनिवार्य शर्त बनाया जाए, क्योंकि पढ़ा-लिखा नेता ही समाज की सही दिशा तय कर सकता है। नेता अगर पढ़े-लिखे होंगे, तो जनता के बीच झूठे वादे नहीं, ठोस नीतियों की बात करेंगे। हर क्षेत्र में योग्यता का मापदंड तय है, तो राजनीति इससे अलग क्यों? जो देश चलाते हैं, उन्हें समझ होनी चाहिए कि निर्णयों का असर जनता पर कैसे पड़ता है। शिक्षित जनप्रतिनिधि ही समाज की असली जरूरत हैं। धर्मवीर कुमार आज राजनीति में बहस कम और बहकावे ज्यादा हैं। अगर हमारे नेता शिक्षित होंगे, तो संसद और विधानसभा में नारेबाजी नहीं, नीतिगत चर्चा होगी। जब एक क्लर्क को नौकरी के लिए परीक्षा देनी पड़ती है, तो नेताओं की जिम्मेदारी उससे कहीं बड़ी है - उनके लिए भी शैक्षणिक योग्यता जरूरी होनी चाहिए। राजीव कुमार शिक्षा इंसान में तर्क, संवेदना और जिम्मेदारी पैदा करती है। जनप्रतिनिधियों को यह समझना चाहिए कि वे केवल वोट लेकर नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का काम करते हैं। राजनीति को सेवा का माध्यम बनाने के लिए पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की भागीदारी जरूरी है। रविशंकर कुमार कई बार देखने में आता है कि बिना पढ़े-लिखे नेता विकास योजनाओं की बारीकियां ही नहीं समझ पाते। नतीजा यह होता है कि जनता को लाभ नहीं मिलता। इसलिए जनप्रतिनिधियों की शिक्षा न केवल जरूरी, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। रामाश्रय सिंह जनता अब केवल भाषण नहीं, विवेकशील निर्णय चाहती है। अगर विधायक और सांसद शिक्षित होंगे, तो वे जनता की समस्याओं को समझने के साथ-साथ उनके समाधान के लिए भी व्यवहारिक नीतियां बना सकेंगे। राजनीति में ज्ञान और नैतिकता का संगम जरूरी है। राजेश कुमार राजनीति अब परंपरा नहीं, पेशेवर जिम्मेदारी बन चुकी है। जैसे डॉक्टर, इंजीनियर या शिक्षक बनने के लिए पढ़ाई जरूरी है, वैसे ही जनसेवक बनने के लिए भी शिक्षा का मापदंड तय होना चाहिए। इससे राजनीति में गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों आएंगे। सुरेंद्र सिंह शिक्षा के बिना राजनीति दिशा हीन हो जाती है। आज जरूरत है कि नेता भावनाओं की राजनीति छोड़कर तथ्यों और नीतियों पर बात करें। शिक्षित नेता जनता की आवाज को सही मंच तक पहुंचा सकते हैं और योजनाओं के सही क्रियान्वयन को सुनिश्चित कर सकते हैं। विनय सिंह नेताओं के लिए शिक्षा इसलिए जरूरी है, ताकि वे जनता की भावनाओं को समझने के साथ-साथ योजनाओं की तकनीकी बारीकियों को भी जान सकें। अनपढ़ नेता कभी-कभी गलत फैसले ले लेते हैं, जिससे नुकसान जनता का होता है। अब इस सोच को बदलना होगा। फुन्नू सिंह जनप्रतिनिधि अगर शिक्षित होंगे, तो वे बहसों में अपनी बात मजबूती से रख पाएंगे और जनता के अधिकारों की रक्षा भी कर सकेंगे। शिक्षा व्यक्ति को अनुशासित और जिम्मेदार बनाती है। राजनीति को भी इसी अनुशासन की सख्त जरूरत है। सुरेश चौहान राजनीति में शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता और समाज की समझ से है। अगर हमारे प्रतिनिधि शिक्षित होंगे, तो वे हर वर्ग की समस्याओं को गहराई से जानेंगे। इससे लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी। अरुण सिंह

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




