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बिहारशरीफछाछुबिगहा अस्पताल बना खंडहर, 20 साल से नहीं हो रहा इलाज

हिन्दुस्तान टीम,बिहारशरीफPublished By: Newswrap
Mon, 24 May 2021 08:00 PM
छाछुबिगहा अस्पताल बना खंडहर, 20 साल से नहीं हो रहा इलाज

छाछुबिगहा अस्पताल बना खंडहर, 20 साल से नहीं हो रहा इलाज

स्वास्थ्यकर्मी जहां-तहां बैठकर लोगों का करते हैं इलाज

50 साल पुराने भवन में कभी हजारों लोगों का होता था इलाज

चार गांवों के लोग इलाज के लिए कतरीसराय या गिरियक जाने को हैं विवश

फोटो:

छाछुबिगहा अस्पताल: कतरीसराय प्रखंड के छाछुबिगहा अस्पताल का खंडहर बना भवन।

कतरीसराय। निज संवाददाता

कोरोना संकट काल में स्वास्थ्यकर्मियों के लगन व उनके जज्बे को भूला नहीं जा सकता। जो आज भी गांव गांव जाकर लोगों के इलाज में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। लेकिन, कतरीसराय प्रखंड का छाछुबिगहा अस्पताल अब पूरी तरह खंडहर बन चुका है। गत 20 साल से अधिक समय से यहां न तो डॉक्टर या अन्य स्वास्थ्यकर्मी आते हैं। न ही किसी का इलाज किया जाता है। हालांकि, एएनएम व अन्य स्वास्थ्यकर्मी कभी कभार इन गांवों में जहां तहां बैठकर लोगों का इलाज करते हैं। नियमित टीकाकरण जैसे अभियान चलाते हैं। इस 50 साल पुराने भवन में कभी हजारों लोगों इलाज किया जाता था। छाछुबिगहा के अलावा सैदी, भैदी, गारैया बिगहा समेत अन्य गांव के चार हजार लोग आज इलाज के लिए कतरीसराय या गिरियक अस्पताल जाने को विवश हैं।

छाछुबिगहा निवासी 75 वर्षीय जनाद्रन सिंह, 70 वर्षीय मदन सिंह व अन्य ने बताया कि 30 साल पहले तक इस अस्पताल का भवन बहुत अच्छा था। यहां स्वास्थ्यकर्मी बैठकर लोगों का इलाज करते थे। आज सब खंडहर हो चुका है। गांव में टीकाकरण छोड़कर अन्य कोई इलाज नहीं होता है। सर्दी खांसी जैसे रोग के इलाज के लिए गांव के झोलाछाप डॉक्टर पर निर्भर हैं।

अस्पताल के कमरे से खिड़की तक गायब:

इस अस्पताल के एक भी कमरे में खिड़की नहीं है। दरवाजे भी जिर्णशिर्ण हो चुके हैं। तीन कमरे पूरी तरह से खंडहर बन चुके हैं। छतों व छज्जों पर घास फूस भरा हुआ है। इससे यह अंतिम सांसें ले रहा है। यह भवन कभी भी गिर सकता है। लगभग 50 डिसमिल जमीन में इसे लोगों के इलाज के लिए बनाया गया था। आज यह पूरी तरह बेकार हो चुका है। जबकि, इसका जिर्णोद्धार कर इस कोविड संकट काल में इसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। क्योंकि, यह गांव के बाहर यह एकांत में बना है। समाजसेवी गुपेश कुमार, 68 वर्षीय इंद्रदेव सिंह, 70 वर्षीय रामनंदन सिंह, 55 वर्षीय प्रमोद सिंह ने बताया कि इस अस्पताल के पास ट्रांफॉर्मर भी लगा हुआ है। लेकिन, अस्पताल में न पानी की व्यवस्था है न बिजली की। एक शौचालय तक नहीं है। कोरोना संकट काल में अस्पताल गांवों की आवश्यकता बन चुकी है। यहां तो पहले से अस्पताल बने थे। जो, कालांतर में खंडहर बन गए।

22 साल पहले तक यहां बैठते थे स्वास्थ्यकर्मी:

यह अस्पताल कभी इन ग्रामीणों के लिए इलाज का केंद्र हुआ करता था। बहुत उम्मीद से गांववालों ने इसके लिए जमीन की व्यवस्था की थी। 85 वर्षीय रामकिशोर सिंह ने बताया कि 30 साल तक यह लोगों की सेवा के लिए उपलब्ध था। 22 साल पहले तक यहां स्वास्थ्यकर्मी बैठकर लोगों का इलाज करते थे। इसके बाद धीरे धीरे यह उपेक्षित होने लगा। अब यह बिल्कुल ही खंडहर बन चुका है। इसके लिए ग्रामीण सीएस समेत स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक से गुहार लगा चुके हैं। बावजूद, अब तक कोई पहल शुरू नहीं हो सकी।

कहते हैं अधिकारी:

छाछुबीघा उप स्वास्थ्य केंद्र में दो नर्स पदस्थापित हैं। कोविड के चलते एक की प्रतिनियुक्ति सदर अस्पताल तो दूसरे की कतरीसराय अस्पताल में की गयी है। नियमित टीकाकरण के लिए कतरपुर उप स्वास्थ्य केंद्र की एक नर्स को वहां प्रतिनियुक्त किया गया है। वर्तमान में यहां नियुक्त सभी स्वास्थ्यकर्मी कोविड जांच एवं टीकाकरण में कार्यरत हैं। 23 एएनएम में से 13 ही कार्यरत हैं। इससे काम में काफी कठिनाई हो रही है। लेकिन, उपलब्ध संसाधनों से बेहतर सेवा देने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। भवन के लिए कई बार विभाग को लिखा गया है। वहां से आदेश आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जा सकेगी।

अच्युतानंद, स्वास्थ्य प्रबंधक, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कतरीसराय

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