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ऐतिहासिक धरोहर : गिरियक का प्राचीन स्तूप इतिहास, पुराण और बौद्ध संस्कृति का जीवंत प्रतीक

ऐतिहासिक धरोहर : गिरियक का प्राचीन स्तूप इतिहास, पुराण और बौद्ध संस्कृति का जीवंत प्रतीक

संक्षेप: गिरियक का प्राचीन स्तूप ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह बौद्ध युगीन स्थापत्य का अनूठा उदाहरण है और भगवान विष्णु की तपोभूमि भी मानी जाती है। स्थानीय लोग इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग कर रहे हैं, जिससे पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ सकें।

Sat, 8 Nov 2025 09:46 PMNewswrap हिन्दुस्तान, बिहारशरीफ
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ऐतिहासिक धरोहर : गिरियक का प्राचीन स्तूप इतिहास, पुराण और बौद्ध संस्कृति का जीवंत प्रतीक यह स्तूप बौद्ध युगीन स्थापत्य कला का बेमिसाल नमूना भगवान विष्णु और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है यह भूमि फोटो : गिरियक स्तूप : गिरियक के पहाड़ पर स्थित बौद्ध युगीन प्राचीन स्तूप। पावापुरी, निज संवाददाता/अनिल उपाध्याय। नालंदा जिले का गिरियक प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यहां स्थित प्राचीन स्तूप इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। यह स्तूप न केवल बौद्ध युगीन स्थापत्य कला का बेमिसाल नमूना है, बल्कि यह स्थान भगवान विष्णु और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि के रूप में भी जाना जाता है।

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इस स्तूप को दर्शन के लिए आज भी सैकड़ों लोग रोजाना पहुंचते हैं। इसे रांची रोड से भी देखा जा सकता है। यह स्तूप अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। गिरियक पर्वत के आस-पास फैले क्षेत्र में आज भी कई प्राचीन ईंटों की संरचनाएं, मूर्ति खंड और शिलालेखों के अवशेष मिलते हैं। ये अवशेष बताते हैं कि यहां कभी भव्य मठ, ध्यानगृह और मंदिर हुआ करते थे। इतिहास में दर्ज है गिरियक स्तूप का वैभव : गिरियक का यह प्राचीन स्तूप मौर्य या गुप्त काल का अवशेष माना जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह महात्मा बुद्ध के समय का भी हो सकता है। सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के दौरान जिस प्रकार अनेक स्तूपों का निर्माण कराया गया, गिरियक स्तूप भी उन्हीं में से एक बताया जाता है। स्थानीय बुजर्ग अरविंद कुमार ने बताया कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की रिपोर्टों में यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में दर्ज है। यहां की मिट्टी में खुदाई के दौरान प्राप्त ईंटें, मूर्तियां और अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह स्थान प्राचीन काल में एक बड़े धार्मिक-शैक्षणिक केंद्र का हिस्सा रहा है। पौराणिक दृष्टि से भी है यह स्थल पवित्र : पंडित नीरज झा ने बताया कि गिरियक का उल्लेख विष्णु पुराण, स्कंद पुराण और बौद्ध जातक कथाओं में भी मिलता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार यह वही पर्वत क्षेत्र है, जहां भगवान विष्णु ने तप किया था और बाद में बौद्ध भिक्षुओं ने इसे ध्यान साधना के केंद्र के रूप में अपनाया। इसी कारण यह स्थान सनातन और बौद्ध दोनों परंपराओं के बीच एक आध्यात्मिक सेतु की तरह माना जाता है, जहां आस्था और ध्यान, दोनों का संगम होता है। आज भी जीवंत हैं यहां के प्राचीन अवशेष : स्थानीय ग्रामीणों ने इस क्षेत्र को सदियों से पूजा और आदर के भाव से संजोकर रखा है। कार्तिक पूर्णिमा और बैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर यहां काफी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। पुरातत्व और पर्यटन की दृष्टि से अपार संभावनाएं : विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिरियक स्तूप स्थल का व्यवस्थित पुरातात्विवक उत्खनन और संरक्षण किया जाए, तो यह नालंदा-राजगीर बौद्ध सर्किट का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यहां के प्राकृतिक दृश्य, पर्वतीय पथ और प्राचीन अवशेष मिलकर इसे एक विश्वस्तरीय धार्मिक पर्यटन स्थल में बदलने की क्षमता रखते हैं। स्थानीय लोगों की मांग इसे मिले राष्ट्रीय पहचान : स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन लगातार सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि गिरियक स्तूप को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए और यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क, प्रकाश व्यवस्था और सुविधाएं विकसित की जाएं। उनका मानना है कि इससे न केवल क्षेत्र का ऐतिहासिक गौरव पुनर्जीवित होगा, बल्कि रोजगार और पर्यटन के अवसर भी बढ़ेंगे। गिरियक का प्राचीन स्तूप केवल ईंटों का ढांचा नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता का सजीव प्रतीक है। यह स्थान इस बात का साक्षी है कि बौद्ध और वैदिक परंपराओं का संगम सदियों से इस धरती पर एक साथ प्रवाहित होता रहा है।