
एआई और तकनीकी एकीकरण से ही हिंदी बनेगी वैश्विक भाषा
नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी के संवर्धन और वैश्विक संवाद पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए एआई और डिजिटल तकनीकी का उपयोग जरूरी है। संगोष्ठी में हिंदी को तकनीक से जोड़ने के लिए नए शब्दावली के विकास पर जोर दिया गया।
एआई और तकनीकी एकीकरण से ही हिंदी बनेगी वैश्विक भाषा नालंदा विश्वविद्यालय के सुषमा स्वराज सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू कुलपति ने कहा-एआई और डिजिटल माध्यम बनेंगे भाषाओं को जोड़ने का जरिया तरुण विजय ने पूर्वी एशिया में संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रभाव को गिनाया अंजनी सिंह ने कहा-बिहार म्यूजियम आने वाले 98 फीसदी दर्शक हिंदी भाषी अजरबैजान के राजदूत अभय कुमार और डीन वेंकट राव की मौजूदगी में सभ्यतागत चेतना पर हुआ मंथन फोटो: संगोष्टी 01: नालंदा विश्वविद्यालय के सुषमा स्वराज सभागार में शुक्रवार को राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी, राजदूर अभय कुमार व देश-विदेश से आए विद्वान।
संगोष्टी 02: नालंदा विश्वविद्यालय में शुक्रवार को संबोधित करते कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी। राजगीर, निज प्रतिनिधि। नालंदा विश्वविद्यालय के सुषमा स्वराज सभागार में शुक्रवार को हिंदी के संवर्धन और वैश्विक संवाद पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत हुई। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को अगर विश्व पटल पर स्थापित करना है, तो उसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डिजिटल तकनीकी से हाथ मिलाना होगा। ‘भाषा और नालंदा परम्परा’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों ने हिंदी को अतीत के गौरव और भविष्य की तकनीक से जोड़ने का रोडमैप पेश किया। कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम भाषाओं को जोड़ने का सशक्त जरिया बन सकते हैं। हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए नई शब्दावली का विकास और तकनीकी एकीकरण बेहद जरूरी है। उन्होंने अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अकादमिक संस्थानों और हिंदी सेवी संस्थाओं को अब साथ मिलकर समन्वित प्रयास करने होंगे। नालंदा विश्वविद्यालय इस भाषाई संवाद का प्रमुख केंद्र बनेगा। नालंदा के पुनरोदय की चर्चा : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और पूर्व सांसद तरुण विजय ने भारत की वैचारिक स्वतंत्रता और बौद्धिक पुनरुत्थान पर बात रखी। उन्होंने कहा कि वैश्विक आक्रमणों के बावजूद भारतीय आत्मा का पुनरोदय हुआ है। सोमनाथ और नालंदा का फिर से खड़ा होना शक्ति और ज्ञान की वापसी का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि थाईलैंड, म्यांमार और पूर्वी एशिया में संस्कृत व भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव है। उन्होंने चीन में भारतीय ज्ञान का प्रचार करने वाले भिक्षु कुमारजीव का भी जिक्र किया। हिंदी जन-जीवन की भाषा: बिहार संग्रहालय के महानिदेशक और पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने हिंदी की व्यावहारिक ताकत बताई। उन्होंने कहा कि बिहार संग्रहालय में आने वाले 98 प्रतिशत दर्शक बिहार और आसपास के राज्यों के होते हैं। जो हिंदी बोलते और समझते हैं। इससे साबित होता है कि हिंदी केवल किताबों की नहीं, बल्कि जन-जीवन और संवाद की सबसे सशक्त भाषा है। इन विषयों पर हुई चर्चा: पहले दिन भाषायी नवाचार, संपादकीय दृष्टि और एआई के अनुप्रयोग जैसे सत्रों का आयोजन हुआ। इसमें निष्कर्ष निकला कि नालंदा जैसे विरासत स्थल से हिंदी को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर पर जोड़ना एक ऐतिहासिक पहल है। उद्घाटन सत्र में अजरबैजान में भारत के राजदूत अभय कुमार और डीन प्रोफेसर डी. वेंकट राव भी मौजूद रहे।

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