बिहार को 3.5 हजार करोड़ का नुकसान, 2.5 लाख एकड़ जमीन तबाह; 14 नदियों के कहर से मुक्ति कैसे?
लगभग 2.57 लाख एकड़ क्षेत्रफल में जल जमाव की समस्या है और इसके कारण वहां किसान चाहकर भी गन्ने की खेती नहीं कर पा रहे। हर साल लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है।

बिहार के जो इलाके सोना पैदा कर सकते हैं, वहां से किसानों को एक ढेला नहीं मिल पा रहा। सूबे की 14 नदियों के साथ-साथ 50 नालों की धारों ने ढाई लाख एकड़ भूमि को पूरी तरह डूबो दिया है। इस कारण यहां गन्ने की खेती नहीं हो रही। इस डूब क्षेत्र के कारण किसानों को हर साल लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है।
इनमें वे नदियां शामिल हैं जो सीधे नेपाल से बिहार में प्रवेश करती हैं। लगभग 300 स्थानों से जलस्रोत उत्तर बिहार में प्रवेश करता है, जो आगे छोटी-छोटी नदियों का रूप ले लेते हैं। इनमें से कई सोता और पईन के रूप में भी बड़े इलाके में पानी फैला रहे हैं। इसके अलावा चंवरों, साइफनों, पुलों के नीचे का इलाका, स्लुईस गेट, जलनिकासी मार्ग के अवरुद्ध होने से भी कई क्षेत्र में पानी का फैलाव हो रहा है।
गन्ना किसान दोहरी मार झेल रहे
पिछले दिनों राज्य सरकार ने इस समस्या की समीक्षा की तो यह बात सामने आई कि लगभग 42 फीसदी गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में फिलहाल खेती नहीं हो रही। लगभग 2.57 लाख एकड़ क्षेत्रफल में जल जमाव की समस्या है और इसके कारण वहां किसान चाहकर भी गन्ने की खेती नहीं कर पा रहे। इस प्रकार गन्ना किसान दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर वे गन्ना की खेती नहीं कर पा रहे, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है। दूसरी ओर उनका खेत बेकार होता जा रहा है।
कार्ययोजना बनायी जाएगी
जब यह समस्या राज्य सरकार के संज्ञान में आई तो जल संसाधन विभाग और गन्ना उद्योग विभाग के स्तर पर इसकी व्यापक समीक्षा की गयी। जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव संतोष कुमार मल्ल की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस क्षेत्र को जलजमाव मुक्त करने का निर्णय हुआ है। समीक्षा में यह बात भी सामने आई कि इस 42 फीसदी डूबे इलाके को यदि पूरी तरह जलजमाव से मुक्त कर दिया जाए। सरकार ने ऐसी नदियों, नालों की नये सिरे से पहचान करने का निर्णय लिया है जो गन्ना क्षेत्र को डूबो रहे हैं। इसके बाद उन्हें बचाने की कार्ययोजना बनायी जाएगी।
डूब क्षेत्र कैसे बने
कई नदियों में तटबंध नहीं होने से बाढ़ के समय उनका पानी फैलने से चौरों में जलजमाव हो गया है। इसके अलावा चौरों से निकलने वाले नालों, धारों और छोटी नदियों में गाद जमा होने, उनका अतिक्रमण होने, नहरों पर निर्मित संरचनाओं से सुगमतापूर्वक जल निकासी नहीं होने के कारण बड़े इलाके में जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो गयी है। जैसे चंपारण में मसान नदी व सिकरहना नदी पर तटबंध नहीं है। इसी तरह कई और छोटी-छोटी नदियां हैं जो बगैर तटबंध की हैं। गोपालगंज, समस्तीपुर, बेगूसराय जिले में नाले, धार व छोटी नदियां गाद के कारण अपने आस-पास बड़े इलाके में पानी फैला रही हैं।
● नदियां: उत्तरवाहिनी, मसान, कोहरा, अकडाहा, सिकरहना, गंडक, घोघरी, बागमती, बागमती धार, पंडई, मंझर, धमई, छाड़ी, मनोर
● नाला: हरहा, मुरहवा, मतौरा, गरकटी, टीकरी, पचरुखा, नरईपुर माईनर, रोहुआ, शिवलाहा, मनोर, मदनपुर, भुरवा, कटहा, सौराहा, टेंगराहा, सिरहा, नटकहिया, सिकरहनास, सरेही, पकडियहवा, मंढरिया, पिपरिया टोला, भप्सा, कचहरिया, दहवा, राजबहा, जमुआ, सिंहपुरवा, हंसी, कठवां, पोखरिया तोमलिया, तुरकी, गजरिया, पचफेरवा, मलहनी, धनखर, हीरापाकर, बनियापुर, धमईया, छाड़ी, भूतही, केसरिया, कोटवा, कल्याणपुर, पिपराकोठी, हैहिया
● नहर: त्रिवेणी, दोन, सिकरहना
● सोता: कठैया, सेमरा-नवादा
● चौर:लाखर चौर, मनिहार, महेश्वर
इन जिलों में अधिक परेशानी
पश्चमी व पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, बेगूसराय और समस्तीपुर
लेखक के बारे में
Sudhir Kumarटीवी, प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में लगभग 18 साल का अनुभव रखने वाले सुधीर कुमार लाइव हिन्दुस्तान में अगस्त 2021 से बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर/को-ऑर्डिनेटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दुस्तान दैनिक से इंटर्न के रूप में करियर की शुरुआत की। सुधीर ने लंबे समय तक ईटीवी/न्यूज18 में रिपोर्टर के रूप में बिहार और झारखंड में काम किया। दोनों राज्यों की राजनीति के साथ क्राइम, भूगोल और कल्चर की समझ रखते हैं। झारखंड में नक्सली वारदातों की कवरेज के साथ बिहार के चर्चित बालिकागृह कांड की पहली टीवी रिपोर्टिग कर गुनाहगारों का चेहरा उजागर किया। सुधीर ने स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मुद्दों को कवर किया है और ह्यूमैन रिलेशन्स पर भी लिखते हैं। साइंस बैकग्राउंड के विद्यार्थी सुधीर कुमार ने इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी से पीजी डिप्लोमा किया है। डिजिटल कंटेंट क्रिएशन में खास रूचि रखते।
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