
बिहार चुनाव: नीतीश के मंत्री सुमित कुमार सिंह की महागठबंधन के सामने होगी कड़ी परीक्षा, जमुई का चकाई विस है खास
बिहार चुनाव: सुमित कुमार सिंह को तीसरी बार जीत के लिए परीक्षा देनी है तो महागठबंधन के सामने इतिहास दोहराने की चुनौती है। शुरुआती चुनाव में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। 1967 में यह समान्य सीट घोषित हुई।
बिहार चुनाव: जमुई जिले का चकाई विधानसभा क्षेत्र कई मायने में अलहदा है। 1962 में गठित इस निर्वाचन क्षेत्र में चुनावी घमासान मुख्य रूप से दो राजनीतिक परिवारों के बीच केंद्रित रहा है। किसी तीसरे के पांव यहां ज्यादा दिन तक नहीं जमे। पिछले चुनाव में यहां से राजद प्रत्याशी सावित्री देवी को पराजित कर निर्दलीय जीते सुमित कुमार सिंह विज्ञान एवं प्रावैधिकी एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में वह इकलौते निर्दलीय विधायक हैं। इसके पहले वह 2010 के चुनाव में झामुमो के टिकट पर जीते थे।

सुमित कुमार सिंह को तीसरी बार जीत के लिए परीक्षा देनी है तो महागठबंधन के सामने इतिहास दोहराने की चुनौती है। शुरुआती चुनाव में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। 1967 में यह समान्य सीट घोषित हुई। शुरू के तीन चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने जीत हासिल की। भाजपा को तीन बार मौका मिला। कांग्रेस ने दो बार और जनता दल, लोजपा राजद व झामुमो ने एक-एक बार जीत दर्ज की है। 1967 के बाद से यहां से या तो श्रीकृष्ण सिंह और उनके परिवार के लोग जीतते रहे या फिर फाल्गुनी प्रसाद यादव और उनकी पत्नी को जीत मिली।
सिर्फ 1972 में ये सिलसिला टूटा जब यहां से कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह जीते थे। यानी 13 चुनावों में दो परिवारों के छह लोग विधायक बन चुके हैं। वर्तमान विधायक सुमित कुमार सिंह के दादा श्रीकृष्ण सिंह दो बार (1967, 1969 में) और पिता नरेंद्र सिंह तीन बार (1985, 1990 और 2000 में) विधायक रहे। सुमित सिंह के भाई अभय सिंह ने फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी।
दूसरी तरफ फाल्गुनी प्रसाद यादव ने इस सीट से चार बार (1977, 1980, 1995 और 2005 में) जीत दर्ज की, जबकि उनकी पत्नी सावित्री देवी एक बार (2015 में) विधायक रहीं। इस बार सुमित सिंह के एनडीए की ओर से मैदान में उतरने की संभावना है। दूसरी तरफ, राजद की ओर से सावित्री देवी ने भी पूरा जोर लगाया है। पिछले कुछ महीने से क्षेत्र में जनसुराज पार्टी की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। जनसुराज से एनडीए और महागठबंधन दोनों खेमे से लोग जुड़ रहे हैं।
चंद्रशेखर सिंह मुख्यमंत्री रहे
चकाई सीट से 1972 में जीते चंद्रशेखर सिंह अगस्त 1983 से मार्च 1985 तक बिहार के 16वें मुख्यमंत्री रहे। चकाई जमुई का सबसे बड़ा प्रखंड है। इसका क्षेत्रफल खगड़िया जिले के क्षेत्रफल के बराबर है। देवघर से सटे चकाई के माधोपुर में स्थापित महावीर वाटिका करीब 100 एकड़ में फैली है। यहां रूबी, मायका, कोयला, मैगनीज, स्फटिक जैसे बेशकीमती रत्न भी हैं।
समीकरण और सियासत पर झारखंड का भी असर
झारखंड की सीमा से सटे होने की वजह से यहां की सियासत और समीकरण पर पड़ोसी राज्य का भी असर दिखता है। चकाई में अनुसूचित जनजाति के मतदाता करीब 10.56% है। इसी आधार पर झारखंड की सत्ताधारी पार्टी झामुमो का इस क्षेत्र में कुछ प्रभाव रहा है। 2010 में सुमित सिंह ने झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 188 मतों के अंतर से जीत हासिल की। 2015 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 2020 में उन्होंने फिर से निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए 481 मतों से जीत दर्ज की।
क्या बोले विधायक….
पूर्व विधायक और राजद की नेता सावित्री देवी ने कहा कि चकाई को चंडीगढ़ बनाने की घोषणा की गई थी, लेकिन बाजार की सड़क पर जलभराव के कारण चलना मुश्किल होता है। विकास के नाम पर झूठ का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। जो पुल-पुलिया बने हैं, उसकी स्वीकृति पहले ही मिल चुकी थी।
चकाई के विधायक सह मंत्री सुमित सिंह ने कहा कि 50 वर्षों से लंबित बरनार जलाशय योजना के निर्माण के लिए राशि आवंटित हो गई। इसके अलावा इथेनॉल फैक्ट्री लग रही है। सभी ग्रामीण इलाके में जरूरी पुल-पुलिया का निर्माण कराया गया है।





