
Bihar Election: 2020 से अलग होगा 2025 का चुनाव, पारी और बारी का संघर्ष रीजनल पार्टियों की बड़ी चुनौती
जदयू में दर्जनों ऐसे नेता हैं, जो पिछले कई चुनावों से टिकट की आस लगाए बैठे हैं। राजद में ऐसे नेताओं की अच्छी संख्या है जिनके लिए यह अंतिम चुनाव साबित हो सकता है। लोजपा के कई नेताओं की इस बार आखिरी उम्मीद है।
बिहार विधानसभा का चुनाव इस बार कई मायनों में पिछले चुनावों से अलग है। यह चुनाव अगली कतार के कई राजनेताओं के लिए अंतिम साबित हो सकता है। बिहार की सियासत बीते चार दशकों से इन्हीं के इर्द- गिर्द सिमटी रही है। आज इनके नेतृत्व में आस्था रखने वाले वैसे नेताओं में बेचैनी है, जिन्हें अब तक आश्वासन ही मिला। उनके लिए यह पारी और बारी का चुनाव भी है। खासकर क्षेत्रीय दलों में नए नेतृत्व के कमान संभालने से इनका धैर्य अब जवाब देने लगा है।
सन् 74 के आंदोलन से उपजे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, लोजपा के संस्थापक स्व. रामविलास पासवान और बिहार में भाजपा संगठन को मजबूती देने वाले स्व. सुशील कुमार मोदी के करीबियों तथा इस पीढ़ी के लिए यह अंतिम चुनाव माना जा रहा है। रामविलास पासवान और सुशील मोदी का निधन हो चुका है। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार अभी अपने- अपने दलों की कमान संभाले हैं, लेकिन अगले चुनाव में पार्टी की कमान संभाले रहेंगे, इसको लेकर अनिश्चितता है। ऐसे में इनके करीबी रहे नेताओं को अब यह भय सताने लगा है कि विधानसभा पहुंचने के इनके अरमान धरे न रह जाएं। सियासी यात्रा में अपनी पारी और बारी को लेकर चिंतित और बेचैनी में हैं। खासकर राजद, लोजपा और जदयू के अनेक नेता चुनाव लड़ने की मुराद पूरी करने के लिए इधर-उधर भी संभावनाएं तलाश रहे हैं।
अकेले जदयू में दर्जनों ऐसे नेता हैं, जो पिछले कई चुनावों से टिकट की आस लगाए बैठे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की भी है, जिन्हें कई बार आश्वासन भी मिला, लेकिन टिकट नहीं। उन्हें चिंता है कि अगले चुनाव में नीतीश कुमार गठबंधन का चेहरा होंगे या नहीं। इस बार मौका नहीं मिला तो उनका राजनीतिक कॅरियर समाप्त हो सकता है। जदयू में दिनेश चन्द्र प्रसाद, हरिकृपाल, विश्वनाथ सिंह, युगेश कुशवाहा, किरण रंजन, प्रो. सत्य नारायण सिंह, मुनेश्वर सिंह, मनोज कुमार, विभूति गोस्वामी, शंभु शरण, नागेन्द्र शरण, सुबोध सिंह, नवीन आर्या कब से सदन जाने की उम्मीद पाले बैठे हैं।
राजद सुप्रीमो के नजदीक रहे नेता भी सशंकित
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के नजदीकी रहे नेता भी अब पार्टी में युवा नेतृत्व के आने से अपनी स्थिति को लेकर सशंकित हैं। राजद में ऐसे कई नेता हैं जो पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद के करीबी रहे। उनके साथ दल को आगे बढ़ाने में उनकी बड़ी भूमिका भी रही, पर बदकिस्मती से उन्हें आश्वासनों से आगे कुछ नहीं मिला। ऐसे नेताओं के लिए यह अंतिम चुनाव साबित हो सकता है। प्रदेश राजद प्रवक्ता चितरंजन गगन हर मंच-फोरम पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं लेकिन वे कभी चुनावी राजनीति में नहीं आ सके। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अलख निरंजन उर्फ बीनू यादव, प्रदेश महासचिव भाई अरुण कुमार, इंजीनियर अशोक यादव, अतिपिछड़ा समुदाय के प्रदेश महासचिव देवकिशुन ठाकुर, प्रदेश महासचिव केडी यादव, प्रदेश महासचिव फैयाज आलम कमाल, खुर्शीद आलम सिद्दीकी, मदन शर्मा, बल्ली यादव, राजेश पाल, मो. तारिक सरीखे दर्जनों नेता हैं जो अपनी बारी के इंतजार में है।
अनेक नेताओं की उम्मीद अब टूटने लगी है
इसी तरह स्व. रामविलास पासवान के हर फैसले के साथ रहे अनेक नेताओं की उम्मीद अब टूटने लगी है। सत्यानंद शर्मा रामविलास जी के समय से ही पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी तरफ, जदयू, भाजपा, राजद आदि पार्टियों में ऐसे नेता भी हैं जो 5 से 9 बार तक के विधायक हैं। इनकी बारी खत्म ही नहीं हो रही। बहरहाल, दोनों प्रमुख गठबंधनों में सीटों तथा प्रत्याशियों का एलान अंतिम दौर में करने की रणनीति इस वजह से भी अपनाई जा रही है। खासकर दलों को डर वैसे नेताओं से है, जिनके लिए यह अंतिम बारी है और टिकट नहीं मिला तो वह दूसरे दलों से पारी की बारी नहीं छोड़ेंगे। इसीलिए उम्मीदवारों का ऐलान ऐसे समय में करने की रणनीति अपनाई जा रही है ताकि दूसरे दलों से संपर्क साधने और टिकट हासिल करने का समय ही न मिले। बहरहाल, पारी और बारी का संघर्ष इस चुनाव में बड़ा गुल खिला सकता है।





