
Bihar Election: लालू-राबड़ी युग का अंत, नीतीश बने हीरो; तब राजद के 70 फीसदी नेता हार गए थे
नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और इस चुनाव परिणाम ने राज्य में लालू-राबड़ी युग का अंत कर दिया। तब राजद के 70 फीसदी नेता हार गए थे
Bihar Election 2025: फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद पूरे प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। त्रिशंकु विधानसभा के कारण किसी सरकार का गठन नहीं हो पाया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। लगभग 262 दिनों तक सूबे में राष्ट्रपति शासन रहा। इसके पहले राज्य में विधानसभा चुनाव की कसरत चलती रही। अक्टूबर में चुनाव हुए। चुनाव परिणाम में एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला और तमाम राजनीतिक कयासों पर विराम लग गया।

नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और इस चुनाव परिणाम ने राज्य में लालू-राबड़ी युग का अंत कर दिया। नीतीश कुमार ने 24 नवंबर 2005 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और 26 नवंबर 2010 तक इस पद पर बगैर किसी विरोध के बने रहे। राजद की राबड़ी देवी को विपक्ष का नेता बनाया गया। सरकार बनने के छह दिनों के बाद 30 नवंबर को वे विपक्ष की नेता बनीं।
जैसे 1990 में राज्य में कांग्रेस शासन का अंत हुआ और लालू प्रसाद का उदय हुआ। इसके ठीक 15 वर्षों के बाद राज्य में लालू-राबड़ी के शासन का अंत हुआ और बिहार के राजनीतिक फलक पर नीतीश कुमार का उदय हुआ। यही नहीं यहां से बिहार की राजनीति में नये युग की शुरुआत भी हुई। फरवरी की राजनीतिक अस्थिरता के बाद सभी राजनीतिक दलों ने फूंक-फूंक कर कदम रखना शुरू किया। खासकर एनडीए बेहद सतर्क था। राज्य के लोगों ने बदलाव का मन बना लिया था। लोग पुरानी शासन व्यवस्था से नाराज थे। लुंज-पुंज सरकारी सिस्टम, विधि व्यवस्था की लगातार खराब होती स्थिति, बेरोजगारी, पलायन और आंतक के कारण व्यावसायियों का बिहार छोड़कर जाना....इन सबके बीच लोगों में नीतीश कुमार को लेकर सहज आकर्षण पैदा हो रहा था। उनमें लोगों को भविष्य की उम्मीद दिखने लगी थी।
इसी बीच जुलाई में नीतीश कुमार ने आम लोगों के बीच जाने का फैसला किया और न्याय यात्रा पर निकल पड़े। जदयू-भाजपा नेताओं के साथ उन्होंने चंपारण से किशनगंज की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने जगह-जगह लोगों से संवाद किया। सभाएं कीं। रोड शो किये। आम लोगों की बातें सुनीं, उन्हें अपनी बात बतायी। इन यात्रा ने बिहार का राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल दिया। लोग नीतीश कुमार के रूप में अपना नया नेता देखने लगे। उनकी बातों से आम लोग प्रभावित हुए। इस रेस में राजद-कांग्रेस काफी पीछे छूट गए। यही नहीं पिछली बार सत्ता की चाबी लेकर घूमने वाले रामविलास पासवान भी चर्चा से बाहर हो गए। जनता का मन-मिजाज स्पष्ट होने लगा था। एक हवा धीरे-धीरे बहने लगी थी।
अक्टूबर में जब चुनाव हुआ तो लोगों की आकांक्षाएं परिणाम के रूप में सामने आई। एनडीए को एकतरफा जीत मिली। उसकी सीटों में भारी बढ़ोतरी हुई। इन्हें फरवरी की तुलना में 51 सीटें अधिक मिलीं। एनडीए को 143 सीट और 36 फीसदी वोट मिले। जदयू और भाजपा दोनों की सीटें बढ़ीं। 88 सीटें जीतने वाला जदयू पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा। उसके 63 फीसदी उम्मीदवार चुनाव जीते।
इस चुनाव में इन प्रमुख नेताओं ने दर्ज की जीत
चंद्रमोहन राय, खुर्शीद उर्फ फिरोज आलम, सतीश चंद्र दूबे, राजेश कुमार रौशन उर्फ बबलू देव, अमरेंद्र कुमार पांडेय, डॉ. अच्युतानंद, शिवचंद्र राम, विजय कुमार शुक्ला, राजू कुमार सिंह, वृशिण पटेल, अजीत कुमार, बिजेंद्र चौधरी, रमई राम, अर्जुन राय, डॉ. रामचंद्र पूर्वे, शाहिद अली खान, हरिभूषण ठाकुर, ललित कुमार यादव, अब्दुलबारी सिद्दीकी, नीतीश मिश्र, विनोद नारायण झा, देवनाथ यादव, संजय सरावगी, महेश्वर हजारी आदि।
किस दल ने कितनी सीटें जीतीं
दल सीटें वोट(%)
जदयू 88 20.46%
भाजपा 55 15.65%
राजद 54 23.45%
लोजपा 10 11.10%
कांग्रेस 9 6.09%
भाकपा माले 5 2.37%
बसपा 4 4.17%
भाकपा 3 2.09%
सपा 2 2.52%
माकपा 1 0.68%
एनसीपी 1 0.79%
एजेवीडी 1 0.21%
निर्दलीय 10 8.77%
कांग्रेस का खराब प्रदर्शन जारी रहा
कांग्रेस का लगातार खराब प्रदर्शन जारी रहा। फरवरी में उसे 10 सीटे मिली थीं। इस बार वह भी घटकर 9 पर आ गयी। सीटों की तालिक में वह पांचवें स्थान पर रही। वामपंथी दलों की स्थिति तो और खराब हो गयी। पिछली बार 29 सीट जीतकर सरकार बनाने में निर्णायक ताकत लेकर बैठी लोजपा को 19 सीटों का नुकसान हुआ। उसके केवल 10 विधायक जीत सके। उसके 95 प्रतिशत से अधिक उम्मीदवार चुनाव हार गए। जनता ने अपना फैसला अच्छी तरह से सुना दिया था।
एनडीए उम्मीदवारों को मिले थे बंपर वोट
बिहार में एक ही साल में सात महीने के अंतर पर अक्टूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए उम्मीदवारों को बंपर वोट मिले थे। जदयू 88 तो भाजपा 55 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। करीब 36 प्रतिशत वोट इन दोनों दलों ने बटोरे। इस चुनाव में 243 विधानसभा सीटों के लिए 2135 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें 93 प्रतिशत पुरुष और 7 प्रतिशत महिला उम्मीदवार थीं। 1997 पुरुष उम्मीदवारों में 218 ने चुनाव में सफलता पाई, जबकि 1480 की जमानत जब्त हो गई। वहीं, 138 महिला उम्मीदवारों में 25 चुनाव जीतने में सफल रहीं, जबकि 86 महिला उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाईं।
नीतीश कुमार में लोगों को नई उम्मीद दिखी : नंदकिशोर
उस समय सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव कहते हैं कि लालू प्रसाद के खिलाफ पूरे राज्य में माहौल बना हुआ था। इसके अलावा राष्ट्रपति शासन लगाने से लोगों के मन में आक्रोश और बढ़ गया। इधर, नीतीश कुमार की स्वच्छ छवि सबको लुभा रही थी। उनमें लोगों को नयी उम्मीद दिख रही थी। उनकी बातों में युवाओं को अपने उज्ज्वल भविष्य के संकेत दिखने लगे। इन सबका असर चुनाव पर पड़ा। परिणाम हमारे पक्ष में आए। लोगों ने एनडीए को पूर्ण बहुमत दिया।
राजद के 70 फीसदी उम्मीदवार हार गए
राजद व कांग्रेस समेत सारे दलों की सीटें घट गयीं। सत्ता की दौड़ में राजद काफी पीछे छूट गया और तीसरे स्थान पर पहुंच गया। उसे 21 सीटों का नुकसान हुआ। उसके 70 फीसदी उम्मीदवार चुनाव हार गए। उसे 54 सीटें मिलीं। भाजपा पहली बार राजद से आगे निकल गयी। उसे राजद के एक सीट अधिक मिली। उसके 54 फीसदी उम्मीदवार चुनाव जीते। वोटों की हिस्सेदारी में भी राजद को झटका लगा। उसका वोट प्रतिशत भी गिरा, लेकिन हिस्सेदारी में वह अब भी सबसे आगे था। उसे पिछली बार 25 फीसदी से अधिक वोट मिले थे। इस बार उसे 23 फीसदी वोट मिले। उधर, जदयू को पहले से छह फीसदी और भाजपा को लगभग पांच फीसदी अधिक मत मिले।



