बिहार में सााइबर फ्रॉड का चीन से कनेक्शन, देश की आंतरिक सुरक्षा को भी खतरा
जांच में पता चला है कि मंदीप का काठमांडु के जॉय नामक व्यक्ति से अक्टूबर 2025 में संपर्क हुआ था। इसके बाद उसने नेपाल नंबर की गाड़ी से उसी माह मधुबनी स्थित घर पर ट्रॉली बॉक्स में सिम बॉक्स की डिलेवरी दी।

बिहार के मधुबनी में बरामद सात सिम बॉक्स मामले में सुरक्षा व जांच एजेंसियों को बड़ी जानकारी हाथ लगी है। जांच में पता लगा है कि बिहार में इन सिम बॉक्स को चीन में बैठे साइबर अपराधी नियंत्रित कर रहे थे। इनको गिरफ्तार मंदीप के बरामद लैपटॉप से कंट्रोल किया जा रहा था। बिहार पुलिस ने देश की आंतरिक सुरक्षा के खतरे से जुड़े इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को कांड की जानकारी दी है।
मधुबनी साइबर थाने में दर्ज इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस के साथ ही साइबर सुरक्षा इकाई भी कर रही है। जांच में पता चला है कि मंदीप का काठमांडु के जॉय नामक व्यक्ति से अक्टूबर 2025 में संपर्क हुआ था। इसके बाद उसने नेपाल नंबर की गाड़ी से उसी माह मधुबनी स्थित घर पर ट्रॉली बॉक्स में सिम बॉक्स की डिलेवरी दी। मंदीप ने पूछताछ में बताया कि सिम बॉक्स का यह गिरोह नेपाल और चीन दोनों जगह से संचालित होता है।
पूछताछ में पता चला है कि सिम बॉक्स की देखरेख, मेंटेनेंस व सिम आदि के लिए मंदीप को हर महीने करीब सवा लाख रुपये मिलते थे। यह रकम यूएस डॉलर में बिनांस वॉलेट के माध्यम से दी जाती थी। यह रुपये नेपाली करेंसी में मिलते थे, जिसे बाद में भारतीय रुपये में बदलकर घर लाता था।
200 रुपये में पहचान पत्र लेकर निर्गत कराए सिम
जांच एजेंसियों के मुताबिक सिम बॉक्स में लगाने के लिए सिम की व्यवस्था प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) के माध्यम से की जाती थी। इसके लिए पीओएस एजेंट को 800 रुपये प्रति सिम का भुगतान किया जाता था। अधिकतर सिम गांव के गरीब लोगों को 200-200 रुपये का लालच देकर उनके पहचान पत्र पर निर्गत कराये गये थे।
ऐसे काम करता है सिम बॉक्स
सिम बॉक्स एक आयताकार इलेक्ट्रिक उपकरण है, जो समानांतर अवैध टेलीकॉम एक्सचेंज के रूप में काम करता है। आकार के हिसाब से प्रत्येक सिम बॉक्स में 11 से लेकर 72 सिम लगाये जा सकते हैं। इसके द्वारा अंतरराष्ट्रीय वीओआईपी (वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल) कॉल को लोकल वॉइस कॉल में परिवर्तित कर दिया जाता है। सिम बॉक्स के उपयोग से वीओआईपी कॉल करने वाले व्यक्ति की पहचान छिपी रहती है और उसे ट्रेस कर पाना काफी कठिन हो जाता है।



