
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी; दर्जनभर सीटों पर NDA और महागठबंधन में एक कॉमन टेंशन, बढ़ी धुकधुकी?
संक्षेप: कुल मिलाकर देखें तो 2020 के विधानसभा चुनाव में कुल 52 सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का मार्जिन 5000 वोटों से कम रहा था। यानी पिछले चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच बेहद नजदीकी मुकाबला रहा था। इस बार वही टेंशन का कारण है।
Bihar Vidhansabha Chunav: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन में अब एक दिन शेष रह गया है। हालांकि, पहले चरण की वोटिंग होने में अभी 20 दिन बचे हैं। इस बीच, गठबंधन की गांठ सुलझाने केंद्रीय मंत्री अमित शाह पटना पहुंचे हैं तो तेजस्वी ने संजय यादव को साथी दलों के बीच गठबंधन में फंसे पेच को दुरुस्त करने दिल्ली भेजा है। भाजपा ने अपने 40 स्टार प्रचारकों की लिस्ट भी जारी कर दी है।लगे हाथ दोनों गठबंधनों की तरफ से चुनावी प्रचार भी रफ्तार पकड़ने लगा है।

इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बृहस्पतिवार को पटना से सटे दानापुर में पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव के पक्ष में रैली की और महागठबंधन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और उनके अन्य सहयोगी दल मतदान केंद्रों पर बुर्का पहनी महिलाओं की पहचान करने से संबंधित निर्वाचन आयोग के निर्देशों का विरोध कर “विकास बनाम बुर्के’’ की नई शरारत कर रहे हैं।
कॉमन टेंशन के बीच गोलबंदी का खेल शुरू
दरअसल, विकास बनाम बुर्के की लड़ाई के जरिए दोनों ही गठबंधन मतदाताओं की गोलबंदी कर रहे हैं ताकि उनका वोट बैंक छिटक न जाए। इस गोलबंदी और ध्रुवीकरण के बीच दोनों ही गठबंधनों यानी सत्ताधारी NDA और विपक्षी महागठबंधन के लिए एक कॉमन टेंशन सामने आया है, जिसने दोनों ही तरफ धुकधुकी बढ़ा दी है। यह टेंशन पांच साल पुराना है। अगर उसमें थोड़ा भी फेरबदल हुआ तो जीती हुई बाजी खत्म हो सकती है।
उम्मीदवारों की धुकधुकी क्यों बढ़ी?
हम बात कर रहे हैं, उन विधानसभा सीटों की जहां 2020 के चुनाव में हार-जीत का अंतर 1000 से 1500 वोटों के बीच रहा था। ऐसी सीटों की संख्या दर्जनभर से ज्यादा हैं और दोनों ही खेमों के उम्मीदवारों ने बहुत ही कम मार्जिन के अंतर से चुनाव में जीत दर्ज की थी। लिहाजा, उन्हें डर है कि अगर वे सामाजिक ध्रुवीकरण या मतदाताओं की गोलबंदी करने में विफल रहे तो उनके हाथ से जीती हुई सीटें छिन सकती है। इसी डर ने उन दलों और उनके उम्मीदवारों की धुकधुकी बढ़ा दी है।
एक दर्जन सीटों पर हार-जीत का अंतर 1000 वोट से भी कम
2020 के चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो करीब एक दर्जन सीटें ऐसी हैं, हार-जीत का अंतर 1000 वोट से भी कम रहा है। इन सीटों में हिलसा, बरबीघा, रामगढ़, मटिहानी, डेहरी, भोरे, बछवाड़ा, चकाई, कुढ़नी, बखरी, परबत्ता शामिल है। नालंदा जिले की हिलसा सीट पर 2020 में जेडीयू के कृष्णमुरारी शरण ने जीत हासिल की थी लेकिन उनकी जीत का अंतर मात्र 12 वोट रहा था। लिहाजा, इस सीट पर जेडीयू की टेंशन बढ़ी हुई है। इसी तरह बरबीघा सीट पर भी जेडीयू ने मात्र 113 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
कम मार्जिन वाली सीटों पर किसने मारी बाजी?
दूसरी तरफ, राजद उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने भी रामगढ़ सीट पर मात्र 189 वोटों के अंतर जीत दर्ज की थी। इसी तरह महिटानी में लोजपा ने 333, भोरे में जेडीयू ने 462, डेहरी में राजद ने 464, बछबाड़ा में भाजपा ने 484, चकाई में निर्दलीय सुमित सिंह ने 581, कुढ़नी में राजद ने 712, बखरी में सीपीआई ने 777 और परबत्ता में जेडीयू ने 951 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। इसके अलावा 1000 से 1500 वोटों की मार्जिन वाली सीटों की बात करें तो कल्याणपुर में राजद ने 1193 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी, जबकि भागलपुर में कांग्रेस ने 1113, किशनगंज में भी कांग्रेस ने 1381, परिहार में भाजपा ने 1569 वोटों के अंतर से ही जीत दर्ज की थी।
2020 में दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला कड़ा था
कुल मिलाकर देखें तो पिछले चुनाव में कुल 52 सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का मार्जिन 5000 वोटों से कम रहा था। यानी 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच बेहद नजदीकी मुकाबला रहा था। महागठबंधन को 110 जबकि एनडीए को 125 सीटें मिली थीं, जबकि 243 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है।





