
बिहार में पहले चरण में बंपर वोटिंग क्या SIR का है नतीजा? क्या है पूरी कहानी
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लोगों ने जमकर अपने मत का प्रयोग किया। पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए इस बार 64.66 फीसदी लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया। इस चरण के समाप्त होने के साथ ही 1213 उम्मीदवारों की किस्मत भी ईवीएम में कैद हो गई है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है। चुनाव आयोग के अपडेटेड आंकड़ों के मुताबिक पहले चरण में करीब 64.66 फीसदी वोटिंग हुई है। बिहार की जनता ने इस बार इतनी बड़ी संख्या में मतदान किया कि पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं। चुनाव आयोग की पुख्ता इंतजाम और कड़ी सुरक्षा के बीच राज्य के करीब पौने चार करोड़ वोटर्स ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। बिहार की जनता की राजनीतिक समझ को लेकर पहले भी किसी को संदेह नहीं था, लेकिन इस चुनाव में बढ़े हुए वोटिंग प्रतिशत पर सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। राजनीतिक विश्लेषक इस बढ़े हुए मतदान के पीछे कई कारणों की ओर इशारा कर रहे हैं, जिनमें एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का योगदान भी शामिल है।
वोटिंग परसेंट पर SIR का क्या इफैक्ट?
बिहार चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने जून से मतदाता पुनरीक्षण के काम की शुरुआत की थी। आयोग ने इस काम में करीब 65 लाख मतदाताओं की छंटनी की थी। इसमें से 22 लाख मृत मतदाता और 35 लाख विस्थापित थे। करीब सात लाख ऐसे लोग थे, जिनके नाम दो जगह पर दर्ज थे। आयोग के इस काम से बिहार की मतदाता सूची और भी ज्यादा सटीक और निष्पक्ष नजर आ रही थी। आयोग के निरीक्षण के पहले बिहार मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या 7 करोड़ 89 लाख थी। एसआईआर के बाद यह घटकर 7 करोड़ 24 लाख 5 हजार रह गई।
इसके बाद 30 सिंतबर को जब आयोग ने अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया, तो उसमें नए यानि 18 से 19 साल के 14 लाख नए मतदाताओं का नाम शामिल किया गया। इसके मुताबिक मतदाताओं की फाइनल सूची 7 करोड़ 41 लाख 92 हजार की रही। यानि कि पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 48 लाख मतदाता कम रहे। पहले चरण की कुल 121 सीटों के लिए हुए मतदान के लिए 3 करोड़ 75 लाख 13 हजार मतदाता पात्र थे। इनमें से करीब 64.66 फीसदी ने अपने मत का प्रयोग किया।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव का बढ़े हुए वोटिंग परसेंट का पूरा श्रेय एसआईआर को देना सही नहीं है। बिहार चुनाव के पहले भी राज्य में राजनीतिक रूप से भी सरगर्मी बढ़ी हुई थी। पिछले चुनाव की जीत और फिर सत्ता में परिवर्तन की वजह से आरजेडी के तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन ने इस बार अपना पूरा जोर लगाया। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पीएम मोदी के नेतृत्व में पूरी एनडीए भी अपना दमखम दिखाती नजर आई। प्रशांत किशोर ने इस बार अपने आप को एक विकल्प के रूप में उभारा, जिससे कई युवा भी वोट करने के लिए खिंचे चले आए। बाकी बिहार की जनता की राजनैतिक सूझबूझ किसी से छिपी नहीं है।





