13 हजार सरकारी अस्पतालों ये 5 माह से ये दवाएं नहीं, निशांत के स्वास्थ्य विभाग का ये कैसा हाल?

पटना, हिन्दुस्तान ब्यूरो
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स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण करीब 13098 अस्पतालों में इन दवाओं की खरीद नहीं की जा सकी है। पांच महीने से सरकारी अस्पतालों के लिएइन दवाओं की खरीद का मामला अटका हुआ है।

13 हजार सरकारी अस्पतालों ये 5 माह  से ये दवाएं नहीं, निशांत के स्वास्थ्य विभाग का ये कैसा हाल?

Bihar Health News: बिहार के जिला अस्पताल से लेकर अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (एपीएचसी) में पांच महीने से आयुर्वेद, होमियोपैथी और यूनानी दवाएं नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण करीब 13098 अस्पतालों में इन दवाओं की खरीद नहीं की जा सकी है। पांच महीने से सरकारी अस्पतालों के लिएइन दवाओं की खरीद का मामला अटका हुआ है। इस कारण मरीजों को काफी दिक्कत हो रही है। राज्य की सरकार बिहार की जनता को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त और संपूर्ण इलाज का दावा सरकार करती है। लेकिन, दावों की पोल खुलती नजर आ रही है।नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं।

विभागीय स्तर पर आयुष चिकित्सा पद्धति की सभी दवाओं की खरीद बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीएमएसआईसीएल) के माध्यम से करने का निर्णय पिछले साल ही लिया गया था। बीएमएसआईसीएल को इस संबंध में दिसंबर, 2025 में ही पत्र लिखकर दवाओं की खरीद करने को कहा गया था। मगर अब तक इन दवाओं की खरीद को लेकर निविदा तक जारी नहीं की जा सकी है। इससे दवाओं की आपूर्ति सरकारी अस्पतालों में बाधित है। मालूम हो कि पहले तो आवश्यक दवाओं की सूची (ईडीएल) उपलब्ध कराने को लेकर देरी हुई। बाद में बीएमएसआईसीएल में इसके लिए निविदा किए जाने को लेकर निर्णय नहीं होने के कारण आयुष दवाओं की खरीद नहीं हो सकी है। विभाग की लापरवाही का खामियाजा राज्य की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

मरीज हो रहे निराश

राज्य में पिछले साल मार्च में 2901 आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति की गई थी। फिलहाल 4365 आयुष चिकित्सक इन अस्पतालों में तैनात है। इनके वेतन पर करीब ढाई करोड़ रुपये मासिक खर्च किये जा रहे हैं। इनकी तैनाती सदर अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और एपीएचसी तक की गई है। ये डॉक्टर नियमित रूप से मरीजों के स्वास्थ्य की जांच और इलाज कर रहे हैं। मगर आयुष की दवाओं की जगह अंग्रेजी दवाएं लिख रहे हैं। इससे इलाज कराने आए मरीज असुरक्षित महसूस करते हैं।

बताया जा रहा है कि कुछ चिकित्सक आयुष की दवाएं लिखते भी हैं तो वह अस्पताल में उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को निराशा होती है और बाजार से खरीदनी पड़ती है। कैमूर के सदर अस्पताल में तैनात आयुष के एक चिकित्सक ने मरीजों के लिए अंग्रेजी दवाएं लिखना अपनी मजबूरी बताया। कहा कि आयुष की दवाओं पर मरीज काफी भरोसा करते हैं लेकिन, इन्हें बाजार से खरीद नहीं पाते हैं। कई मरीज हंगामा करने पर उतारु हो जाते हैं।

Sudhir Kumar

लेखक के बारे में

Sudhir Kumar

टीवी, प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में लगभग 18 साल का अनुभव रखने वाले सुधीर कुमार लाइव हिन्दुस्तान में अगस्त 2021 से बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर/को-ऑर्डिनेटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दुस्तान दैनिक से इंटर्न के रूप में करियर की शुरुआत की। सुधीर ने लंबे समय तक ईटीवी/न्यूज18 में रिपोर्टर के रूप में बिहार और झारखंड में काम किया। दोनों राज्यों की राजनीति के साथ क्राइम, भूगोल और कल्चर की समझ रखते हैं। झारखंड में नक्सली वारदातों की कवरेज के साथ बिहार के चर्चित बालिकागृह कांड की पहली टीवी रिपोर्टिग कर गुनाहगारों का चेहरा उजागर किया। सुधीर ने स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के मुद्दों को कवर किया है और ह्यूमैन रिलेशन्स पर भी लिखते हैं। साइंस बैकग्राउंड के विद्यार्थी सुधीर कुमार ने इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी से पीजी डिप्लोमा किया है। डिजिटल कंटेंट क्रिएशन में खास रूचि रखते।

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