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बोले जमुई: मंच के अभाव में सीखने से वंचित हो रहे हैं कलाकार

बोले जमुई: मंच के अभाव में सीखने से वंचित हो रहे हैं कलाकार

संक्षेप:

जमुई में युवा प्रतिभाओं को गीत, संगीत और नृत्य के क्षेत्र में तराशने की आवश्यकता है। कलाकारों को उचित संसाधनों के साथ प्रशिक्षित करने के लिए सरकारी सहायता की मांग की जा रही है। स्थानीय कलाकारों का...

Aug 24, 2025 10:34 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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जमुई में गीत, संगीत व नृत्य क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को तराशने की दरकार है। साधन-संसाधनों से लैस कर कला साधकों की प्रतिभा को उड़ान देकर जमुई के पुराने गौरव को लौटाने की जरूरत है। इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को कहना है कि सरकारी स्तर पर प्रयास से इन कलाओं को फिर से नया आयाम मिल सकता है। वहीं, नयी प्रतिभाओं को मंच देकर उन्हें रोजगार भी मुहैया कराया जा सकता है। उन्होंने राज्य सरकार व प्रशासन से उनकी मुश्किलें सुलझाने की दिशा में पहल की अपील की।

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5 से अधिक निजी संस्थान सिखाते हैं गीत संगीत

1 हजार से अधिक युवा ले रहे हैं नृत्य का प्रशिक्षण

01 सरकारी कला मंच की जिले में है दरकार

प्रस्तुति : संतोष कुमार सिंह

नृत्य-संगीत जमुई की संस्कृति में समाहित रही है। कुछ कलाकार देशभर में जमुई का नाम भी रोशन कर चुके हैं। फिर भी स्थानीय नृत्य-संगीत कलाकारों में मायूसी है। उनका कहना है कि यहां कला को बढ़ावा देने के लिए स्थायी प्रशिक्षण संस्थान नहीं है। कभी-कभार कला और संस्कृति विभाग की ओर से प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन होता है, जिसमें भाग लेने से अधिकतर कलाकार वंचित रह जाते हैं। निजी संस्थानों में नृत्य-संगीत, अभिनय आदि सीखने वाले कलाकार भी मंचन से वंचित रहते हैं। सिर्फ संस्थान में सीखने का मौका मिलता है। कलाकार बताते हैं कि जिले में एक भी रंगमंच भी नहीं है। महोत्सव आदि कार्यक्रम होते हैं तो बाहर से कलाकारों को बुलाया जाता है। स्थानीय चंद कलाकार ही मौका पाते हैं। रंगमंच पर प्रदर्शन का अवसर नहीं मिलने से कलाकारों की प्रतिभा कुम्हला रही है। जिले के जाने माने कलाकार भवानी पांडेय बताते हैं कि जमुई के कलाकार पटना, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई आदि जगहों पर प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं। इसके बावजूद जिले में माहौल नहीं बन रहा है। सिर्फ सरकारी महोत्सवों के सहारे कलाकार क्या करेंगे। उन्होंने बताया कि अधिकतर कलाकारों की प्रतिभा बीच में ही दम तोड़ देती है। रोजी-रोटी और परिवार की जिम्मेवारी में फंसने से कलाकारों का सफर बीच रास्ते में ही समाप्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि कला साधना है। छह-सात वर्ष तपस्या करने के बाद कलाकार का दर्जा मिलता है। ऐसे में संसाधन का अभाव प्रतिभा के दबने की वजह बन रहा है। उन्होंने बताया कि कलाकारों को मुक्ताकाश (ओपेन थियेटर) की कमी खल रही है। इसे बनाने की सरकारी पहल हो तो माहौल बदलेगा। कला और कलाकार दोनों को बढ़ावा मिलेगा।

टूटी बंदिशें, बढ़ रहे कलाकार, पर असुविधाएं बरकरार :

गांव-समाज में नाचने-गाने के लोग कद्रदान रहे हैं। इसके बावजूद कलाकार बनने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। आधुनिक दौर में यह समाप्त हो चुका है। नृत्य-संगीत में करियर बनाने पर लगी सामाजिक बंदिशें टूट चुकी हैं। अभिभावक स्वयं बच्चों को नृत्य-कला, अभिनय संस्थान पहुंचाने जा रहे हैं। नृत्य-संगीत सीखने के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। कला संस्कृति विभाग के राज्य परामर्शी व सामाजिक कार्यकर्ता रंजीत सिंह बताते हैं कि नृत्य-संगीत का कल्चर तेजी से बढ़ा है। इसे बिहार सरकार भी बढ़ावा दे रही है। स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक आयोजनों आदि में कलाकार प्रदर्शन कर आमदनी भी प्राप्त कर रहे हैं। इसके बावजूद व्यापक पहल की दरकार है। जिले के कलाकार बिखरे हुए हैं। इनके उठने-बैठने, रिहर्सल करने आदि के लिए जगह नहीं है। इससे कलाकारों को दिक्कत हो रही है। कलाकार मुक्ताकाश बनाने की डिमांड कर रहे हैं, जहां आधुनिक सुविधाओं से युक्त रिहर्सल स्टेज, बाहरी कलाकारों के रुकने की जगह आदि मौजूद हो। इससे शहर में कला का माहौल बनेगा। उन्होंने बताया, नृत्य-संगीत सीखकर करियर बनाने के इच्छुक युवाओं को भी दिक्कत हो रही है। चंद निजी संस्थान हैं, जिनके बूते युवा सफलता की इबारत लिख रहे हैं। सरकारी प्रोत्साहन मिलेगा तो यह ग्राफ और बढ़ सकता है।

गांव-गांव में मौजूद था रंगमंच व नाट्य मंडली :

जमुई में पहले नृत्य-संगीत को खूब बढ़ावा मिला। पहले लोग वसंती पंचमी, होली, दुर्गापूजा, छठ, दीपावली आदि अवसरों पर गांवों में नगाड़े का स्वर गूंजने लगता था। रंगमंच सज जाता था और नाट्य-मंचन की धूम मच जाती थी। श्रोता के तौर पर बच्चे, बूढ़े, महिलाओं व युवाओं की भीड़ लगती थी। पहले के लोग बताते हैं कि सब खत्म हो चुका है। अब ना रंगमंच है और ना ही कलाकार बचे हैं। नई पीढ़ी के बच्चे शहरों में पढ़ते हैं। जो गांव में हैं भी उन्हें बढ़ाने वाले कलाकार परदेस में जीवन यापन करते हैं। उन्होंने बताया कि जिले के सभी गांवों में नाट्य समिति थी, पर पक्का रंगमंच गिनती के गांव में रहे हैं। उन्होंने बताया कि नए कलाकारों को तैयार करने की परंपरा गांव में समाप्त हो गई है। एकाध गांव बचे हैं जहां के जिद्दी कलाकार आयोजन कर रहे हैं।

जिले में नृत्य-संगीत सीखने की ललक युवाओं में बढ़ी है। इससे रोजगार सृजन बढ़ा है। नृत्य-संगीत सीखने वाले कलाकार सरकारी कोटे का लाभ उठाकर नौकरी प्राप्त कर रहे हैं। कला संस्कृति व युवा विभाग के राज्य परामर्शी सदस्य बताते हैं कि शिक्षक, रेलकर्मी आदि के रूप में नृत्य-संगीत कलाकार कोटे से दर्जनों लोगों को नौकरी मिल चुकी है। कलाकार नौकरी के साथ कला भी प्रदर्शित कर रहे हैं। इसके बावजूद नृत्य-संगीत के क्षेत्र में करियर निर्माण चुनौती बनी है। जमुई शहर में इसे पूर्णरूपेण विकसित करने के लिए सरकारी संस्थान की आवश्यकता है। इसके अभाव में नृत्य-संगीत सीखने के इच्छुक गरीब बच्चों के अभिभावकों की परेशानी बढ़ी हुई है। निजी संस्थानों पर ऊंची दर पर सिखाने की व्यवस्था है।

शिकायतें :

1. अधिकतर कलाकार आर्थिक तंगी झेल रहे हैं जिससे उनकी कला प्रभावित हो रही है। इस पर प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है।

2. कलाकार प्रायोजकों की कमी से जूझते हैं। सरकारी स्तर पर होने वाले आयोजनों में स्थानीय कलाकारों को कम मौका मिलता है।

3. सरकारी विद्यालयों एवं अधिकतर निजी संस्थानों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में बच्चों को वीडियो दिखाकर डांस सिखाया जाता है। इससे वे कला की बारीकी नहीं सीख पाते हैं।

4. ग्रामीण कलाकार आर्थिक बदहाली से पलायन कर चुके हैं। गांव में कला की अखल जगाने वाली नाट्य मंडली समाप्त हो रही है।

सुझाव

1. कलाकारों को एक निश्चित समयावधि तक बेरोजगारी भत्ता मिले। साथ ही नाट्य, संगीत, नृत्य आदि का वृहत आयोजन किया जाए।

2. ग्रामीण स्तर के कलाकारों को जिला स्तर पर प्रदर्शन का अवसर मिले। इसकी व्यवस्था होने ग्रामीण क्षेत्रों में मृतप्राय नाट्य मंडलियों को संजीवनी मिल जाएगी।

3. प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर नृत्य-संगीत प्रशिक्षण खोलने की जरूरत है जहां योग्य गुरु की तैनाती हो। इससे गरीब बच्चों को मौका मिलेगा।

4. डिजिटल प्लेटफॉर्मों से युवाओं को अवसर उपलब्ध है। इसलिए शिक्षा से नृत्य-संगीत को जोड़ पढ़ाई करने से रोजगार सृजन के साथ कला को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

हमारी भी सुनें :

कलाकारों को आर्थिक बदहाली से गुजरना पड़ रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि से इतनी कमाई नहीं हो पाती है कि कलाकार परिवार का भरण-पोषण कर पाएं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए और कलाकारों को मानदेय देने की व्यवस्था हो।

- शौरभ पांडेय

सिखाने के लिए योग्य संस्थानों की कमी है। सिखाने वाले प्रशिक्षक नहीं हैं। इसके कारण प्रशिक्षुओं को दिक्कत हो रही है। सरकारी स्तर पर ऐसा संस्थान रहता जहां नृत्य-संगीत का प्राथमिक व माध्यमिक प्रशिक्षण मिलता तो बेहतर होता।

-बसंत जी

कलाकारों को कला प्रदर्शन का अवसर कम मिल रहा है, जिस वजह से उनकी प्रतिभा खुलकर सामने नहीं आ रही है। शहर में ऐसी जगह या संस्थान हो, जहां नियमित तौर पर सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाए।

-भवानी पांडेय

महिलाओं के लिए कला का क्षेत्र बेहतर अवसर है। प्राथमिक स्तर पर नृत्य-संगीत के लिए संस्थान खुल जाए तो जमुई के युवाओं को रोजगार का अवसर मिलेगा।

- सुमन मिश्रा

निजी संस्थानों में अधिकतर कलाकार पैसे के अभाव में नृत्य-संगीत सीखने नहीं आते। इससे सैकड़ों युवाओं की प्रतिभा दम तोड़ रही है। इस स्थिति में बदलाव के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। तभी कलाकारों का उत्थान होगा।

- अभिषेक पांडेय

अधिकतर स्कूलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होता है जिसमें बच्चे भाग लेते हैं, पर उन्हें सही से प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। यू ट्यूब दिखाकर नृत्य का अभ्यास कराया जाता है। इससे बच्चे कला की बारीकी नहीं सीख रहे।

-ब्रजेश सिंह राजपूत

संगीत अभ्यास के लिए निजी संस्थानों में वाद्य यंत्र उन्नत कोटि के नहीं हैं। इससे संगीत के रियाज में दिक्कत होती है। छोटे स्तर पर चलने वाले निजी संस्थानों के संसाधन सीमित हैं। सरकारी पहल होती तो कलाकार की सुविधा बढ़ती।

-लड्डू मिश्रा

शहर में रंगमंचीय माहौल है जिसके कारण प्रदर्शन का मौका कलाकारों को नहीं मिलता है। एक ओपेन थियेटर बनाने की जरूरत है जहां रिहर्सल से लेकर रंगमंच पर प्रदर्शन करने तक की व्यवस्था हो। इससे कलाकारों को मौका मिलेगा और प्रतिभा निखरेगी।

- अमित कुमार

अधिकतर कलाकार आर्थिक तंगी झेल रहे हैं जिससे उनकी कला प्रभावित हो रही है। इस पर प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है। ताकि कलाकार अपनी प्रतिभा निखार सकें।

-चंदन कुमार

प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर नृत्य-संगीत प्रशिक्षण खोलने की जरूरत है जहां योग्य गुरु की तैनाती हो। इससे गरीब बच्चों को मौका मिलेगा और वे लोग आगे चलकर अच्छे कलाकार बन सकते है।

- रोहित कुमार सिंह

ग्रामीण स्तर के कलाकारों को जिला स्तर पर प्रदर्शन का अवसर नहीं मिले पाता है। अगर ग्रामीण स्तर पर भी इस तरह की व्यवस्था हो जाएगी तो ग्रामीण स्तर के के कलाकार भी आगे बढ़ेंगे और अपने जिले का नाम रौशन कर सकते है।

- अनिल दीक्षित

डिजिटल प्लेटफॉर्मों से युवाओं को अवसर उपलब्ध है। इसलिए शिक्षा से नृत्य-संगीत को जोड़ पढ़ाई करने से रोजगार सृजन के साथ कला को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

- रंजीत सिंह

कलाकारों को एक निश्चित समयावधि तक बेरोजगारी भत्ता मिले। साथ ही नाट्य, संगीत, नृत्य आदि का वृहत आयोजन किया जाए ताकि हमलोग भी अपनी प्रतिभा को निखार सकें।

- अरुणेश्वर मिश्रा

कलाकार प्रायोजकों की कमी से जूझते हैं। सरकारी स्तर पर होने वाले आयोजनों में स्थानीय कलाकारों को कम मौका मिलता है। सरकार को चाहिए कि इस तरह के आयोजन में स्थानीय कलाकार को मौका देने का कार्य करें।

- इन्द्रदेव साव

सरकारी विद्यालयों एवं अधिकतर निजी संस्थानों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में बच्चों को वीडियो दिखाकर डांस सिखाया जाता है। इससे वे कला की बारीकी नहीं सीख पाते हैं।

-चंदन कुमार

ग्रामीण कलाकार आर्थिक बदहाली से पलायन कर चुके हैं। गांव में कला की अखल जगाने वाली नाट्य मंडली समाप्त हो रही है। स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि इस ओर ध्यान दें।

- संदीप सरगम

बोले जिम्मेदार :

गायकों के लिए सरकार द्वारा योजना चलाई गई है। साथ ही उन्हें हाल ही में सुविधा देने के लिए एक पोर्टल लॉन्च किया गया है जिसमें वह अपना क्षेत्र और विधा के साथ नाम इंटर कर सकते हैं इससे उन्हें सहायता मिलेगी।

बिकेश कुमार, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी