
बोले कटिहार : रोजगारपरक शिक्षा मिलने से चमकेगा युवाओं का भविष्य
बिहार के कटिहार में हजारों युवा हर साल प्लस-टू पास कर रोजगार की तलाश में हैं, लेकिन रोजगारपरक शिक्षा के अभाव में उन्हें मजबूरी में पलायन करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर तकनीकी शिक्षा और संसाधनों की कमी...
प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज/ मणिकांत रमण

गांवों की गलियों में हर साल हजारों सपने पंख लगाते हैं। प्लस-टू पास करते ही युवाओं की आंखों में नई दिशा की उम्मीद जगती है, लेकिन रोजगारपरक शिक्षा की कमी और आर्थिक अभाव उनके रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन जाते हैं। परिवार की गरीबी ढोते ये युवा आगे बढ़ने के बजाय मजबूरी में पलायन कर जाते हैं। महानगरों की भीड़ में गुम होकर ये सपने अपने ही राज्य से दूर हो जाते हैं। दरअसल, इनकी प्रतिभा और क्षमता यहीं रहकर बिहार का भविष्य संवार सकती है, लेकिन अवसरों के अभाव में वे बेबस होकर घर छोड़ देते हैं। यदि स्थानीय स्तर पर रोजगारपरक शिक्षा और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित हो तो कटिहार के ये युवा अपने सपनों को यहीं पंख दे सकते हैं और राज्य के विकास में अहम योगदान कर सकते हैं।
जिले के युवाओं के सपनों को पंख नहीं मिल पा रहे हैं। हर साल जिले के विभिन्न प्रखंडों से 10 से 15 हजार छात्र-छात्राएं साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स से प्लस-टू की परीक्षा पास कर आगे बढ़ने की उम्मीद रखते हैं। उनकी चाहत होती है कि पढ़ाई के साथ रोजगारपरक शिक्षा लेकर वे आर्थिक रूप से मजबूत बनें और परिवार की जिम्मेदारी संभाल सकें। मगर जिले के प्रखंडों में रोजगारपरक शिक्षा केन्द्रों का न होना उनके लिए सबसे बड़ी बाधा है। 12वीं पास करने के बाद युवाओं के सामने विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं। न तो किसी प्रखंड में तकनीकी या स्किल डेवलेपमेंट से जुड़ा संस्थान है और न ही कम खर्च में रोजगारपरक कोर्स कराने की कोई सरकारी व्यवस्था। ऐसे में अनेक छात्र पढ़ाई छोड़कर खेती-बाड़ी या छोटे-मोटे कामों में लग जाते हैं। कई मजबूरी में दिल्ली, पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का रुख करते हैं। कटिहार के जिला मुख्यालय में कुछ निजी संस्थान जरूर हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है और फीस इतनी ज्यादा है कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे वहां दाखिला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। ग्रामीण अभिभावक कहते हैं कि उनके सपने बच्चों को पढ़ाकर आत्मनिर्भर बनाने के हैं, लेकिन हजारों रुपये की फीस जुटाना संभव नहीं। बरारी के एक किसान पिता बताते हैं कि उनका सपना था बेटा पढ़-लिख कर गरीबी मिटाए, लेकिन रोजगारपरक पढ़ाई का साधन गांव में नहीं है और शहर भेजने का खर्च उठाना मुश्किल।
हर साल जिले के कई प्रखंडों से हजारों युवा रोजगार की तलाश में दूर-दराज के महानगरों का रुख करते हैं। वहां वे निर्माण कार्य, छोटे-मोटे कारखानों और असंगठित क्षेत्रों में काम कर अपने सपनों से समझौता करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकार प्रखंड स्तर पर रोजगारपरक शिक्षा केन्द्र खोल दे तो युवा बाहर जाने के बजाय अपने ही जिले व राज्य के विकास में भागीदार बन सकते हैं। युवाओं की यह पीड़ा कोढ़ा की छात्रा रानी कुमारी की बातों से भी झलकती है। वह बताती हैं कि यदि गांव के पास ही रोजगारपरक शिक्षा केंद्र हो तो पढ़ाई जारी रखने के साथ परिवार का सहारा भी बन सकते हैं। वहीं प्राणपुर के छात्र अजय कुमार कहते हैं कि वे कंप्यूटर और अकाउंटिंग सीखना चाहते थे, मगर संस्थान न होने से उनका सपना अधूरा रह गया। वहीं कोढ़ा की रानी कुमारी का कहना है कि अगर गांव में ही कोई प्रशिक्षण केंद्र होता तो वह कंप्यूटर सीखकर आगे बढ़ सकती थी, लेकिन अब शहर जाकर पढ़ाई करना संभव नहीं। यही स्थिति प्राणपुर, कदवा और आजमनगर प्रखंडों की कई लड़कियों की है। मजबूरी में वे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। बरारी प्रखंड के किसान रमेश महतो कहते हैं कि वे चाहते हैं बेटा तकनीकी शिक्षा लें और नौकरी करे, पर यहां कोई साधन नहीं है। शहर भेजने का खर्च संभव नहीं। यही स्थिति डंडखोरा, फलका और मनसाही जैसे प्रखंडों के हजारों अभिभावकों की भी है। मनिहारी के छात्र राहुल कुमार बताते हैं कि वे प्लस-टू के बाद तकनीकी कोर्स करना चाहते थे, मगर सुविधा नहीं होने से उन्हें नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ा।
सुनें हमारी बात
गांव से शहर जाने की मजबूरी हर साल हजारों सपनों को तोड़ देती है। अगर यहां तकनीकी शिक्षा और रोजगारपरक केन्द्र खुलें तो युवा अपनी धरती पर ही कुछ कर दिखा सकते हैं।
-जयंत राज
निजी संस्थानों की फीस इतनी ऊंची है कि मध्यमवर्गीय परिवार के लिए असंभव हो जाता है। सरकार ग्रामीण इलाकों में मुफ्त या सस्ते स्किल सेंटर खोले ।
-आदित्य कुमार
छात्र-छात्राओं में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है सिर्फ अवसरों की। गांव के युवा मेहनती और ईमानदार होते हैं, लेकिन सही प्रशिक्षण नहीं मिल पाने से वे आगे नहीं बढ़ पाते।
-राजदीप कुमार
मेरे कई दोस्त पढ़ाई छोड़कर दिल्ली और पंजाब कमाने चले गए। सोचिए, अगर वही बच्चे यहां किसी तकनीकी कोर्स में प्रशिक्षण पाते तो आज आत्मनिर्भर होते।
-अनुपम कुमार
पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगारपरक शिक्षा न मिलने से मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ती है। हर प्रखंड में एक ऐसा केन्द्र बने जो गरीब बच्चों के सपनों को पंख दे सके।
-दर्शन कुमार
गांव-गांव में छोटे-छोटे स्किल डेवलपमेंट सेंटर खुलें, ताकि स्थानीय युवा वहीं प्रशिक्षण लेकर स्वरोजगार शुरू कर सकें। तभी पलायन की समस्या हल होगी।
-अभिषेक कुमार
सबसे जरूरी है कि जिले के हर प्रखंड में कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिलाई-बुनाई और कृषि आधारित ट्रेनिंग सेंटर शुरू किए जाएं।
-संतोष कुमार
अगर सस्ती दरों पर डिजिटल शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण गांव में उपलब्ध हो तो यहां का युवा किसी से पीछे नहीं रहेगा। पलायन तभी रुकेगा जब अवसर यहीं मिलेंगे।
-निलेश कुमार
मैंने देखा है कि कई छात्राएं पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि पास में कोई रोजगारपरक संस्थान नहीं होता। यह सबसे दुखद पहलू है।
-नीरज कुमार
सरकार अगर छोटे पैमाने पर उद्योग और तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधा दे तो यहीं स्वरोजगार शुरू कर आत्मनिर्भरता की राह पर कदम रखा जा सकता है।
- अनमोल कुमार
रोजगारपरक शिक्षा अगर गांवों तक पहुंचे तो न सिर्फ पलायन रुकेगा, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। यह सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
-निलेश
हमारे गांव के कई लड़के मजदूरी के लिए गुजरात और महाराष्ट्र चले गए। उनका सपना कुछ और था, लेकिन अवसर न मिलने के कारण उन्हें मजबूरी में पलायन करना पड़ा।
- तुषार कुमार
कटिहार के युवा बड़े सपने देखते हैं, लेकिन उनके सपने अक्सर गरीबी और संसाधनों की कमी में टूट जाते हैं। मेरी नजर में स्किल डेवलपमेंट ही भविष्य की कुंजी है।
-सुधांशु कुमार
मेरे गांव में कई लड़के-लड़कियां पढ़ाई के बाद बेरोजगार घूम रहे हैं। वे पढ़ाई तो पूरी कर लेते हैं, लेकिन रोजगारपरक कौशल नहीं सीख पाते।
-पलटू कुमार
मेरे मन में हमेशा यह सवाल रहता है कि शिक्षा का असली मकसद क्या है। अगर पढ़ाई के बाद भी युवाओं को काम न मिले तो सारी मेहनत बेकार हो जाती है।
-राजा कुमार
जिले के बच्चे भी बाहर जाकर मजदूर न बनें बल्कि अपने गांव में ही कुछ नया करें। इसके लिए जरूरी है कि सरकारी स्तर पर रोजगारपरक शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान खोले जाएं।
-दिलखुश
बोले िजम्मेदार
युवाओं को रोजगारपरक शिक्षा और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता है। जिला उद्योग केंद्र विभिन्न योजनाओं के जरिए स्वरोजगार को बढ़ावा दे रहा है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम और मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत युवाओं को वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। कौशल विकास से जुड़े कार्यक्रमों को और गति दी जाएगी।
डॉ. सोनाली शीतल, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केन्द्र, कटिहार
शिकायत
1. अबतक प्रखंड स्तर पर एक भी रोजगारपरक शिक्षा केन्द्र नहीं है।
2. जिला मुख्यालय में उपलब्ध संस्थानों की फीस अत्यधिक है।
3. रोजगारपरक शिक्षा नहीं मिलने से छात्रों को राज्य से बाहर जाना पड़ता है।
4. प्रतिभा बाहर जाकर अन्य राज्यों की तरक्की में योगदान देती है, कटिहार व बिहार पिछड़ जाते हैं।
सुझाव
1. हर प्रखंड मुख्यालय में रोजगारपरक शिक्षा केन्द्र खोले जाएं। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए नाममात्र शुल्क तय हो।
2. सरकार निजी संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षण केन्द्र चला सकती है।
3. प्रशिक्षण को स्थानीय उद्योग, कृषि और छोटे कारोबार से जोड़ा जाए।
4. हर प्रखंड में मार्गदर्शन देने के लिए कॅरियर सलाह केन्द्र बने।

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