
जमुई: ध्यान एकाग्रता का विज्ञान और आत्म अन्वेषण की कुंजी
जमुई में विश्व ध्यान दिवस पर 'ध्यान: आंतरिक शांति और वैश्विक सामंजस्य' विषय पर परिचर्चा हुई। प्रो. गौरी शंकर पासवान ने कहा कि ध्यान केवल क्रिया नहीं, बल्कि शांति और चेतना का मार्ग है। ध्यान से आंतरिक संतुलन और सामाजिक स्थिरता संभव है। उन्होंने ध्यान को मानव और राष्ट्र के लिए आवश्यक बताया।
जमुई। विश्व ध्यान दिवस के अवसर पर नगर परिषद स्थित आनंद विहार कॉलोनी सिरचंद नवादा में "ध्यान: आंतरिक शांति और वैश्विक सामंजस्य" विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता प्रो.गौरी शंकर पासवान ने की। अपने अध्यक्षीय प्रबोधन में डॉ. गौरी शंकर पासवान ने कहा कि 2024 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व ध्यान दिवस की घोषणा की थी। ध्यान दिवस का थीम आंतरिक शांति और वैश्विक सामंजस्य है। उन्होंने कहा कि ध्यान केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में शांति और चेतना का मार्ग है। ध्यान एकाग्रता का विज्ञान और आत्मा अन्वेषण की कुंजी है। क्योंकि यह मन की चंचलता को नियंत्रित करने की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है।
वैज्ञानिक रूप से ध्यान स्मरण शक्ति, निर्णय क्षमता और न्यूरल संतुलन को सुदृढ़ करता है। अतः ध्यान एकाग्रता का विज्ञान है। ध्यानआत्म अन्वेषण की कुंजी इसलिए है, क्योंकि यह मन की शोर को शांत कर भीतर झांकने की शक्ति प्रदान करता है। प्रो.पासवान ने आगे कहा कि आंतरिक शांति और वैश्विक सामंजस्य एक ही सत्य के दो आयम है। जैसे एक दीपक की लौ स्वयं को प्रकाशित कर आसपास के अंधकार को मिटा देती है, वैसे ही आंतरिक शांति समाज तथा विश्व में सामंजस्य का प्रकाश फैलाती है। आज पूरा विश्व युद्ध, आतंकवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, पर्यावरणीय संकट आर्थिक असमानता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। इसका एक ही कारण है आंतरिक संतुलन। कहते हैं कि आंतरिक शक्ति जड़ है, तो वैश्विक सामंजस्य उसका वृक्ष। यदि जड़ स्वस्थ और सशक्त होगी तो वृक्ष स्वत: फलदाई होगा. उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक और तेज जीवन चक्र में ध्यान का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। ध्यान से आंतरिक शांति मिलती है। आंतरिक शांति से ही बाहरी संतुलन संभव है और यही ध्यान की वास्तविक उपादेयता है। मानव और राष्ट्र के लिए ध्यान काफी प्रासंगिक है। ध्यान मनुष्य के लिए आत्म कल्याण का मार्ग है, और देश के लिए सतत विकास की शक्ति है। आंतरिक शांति से ही सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति संभव है। ध्यान आज के भारत और विश्व दोनों के लिए अत्यंत प्रासंगिक, उपयोगी और अनिवार्य है।

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