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पूर्णिया :

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संक्षेप: -बोले बिहार:- ----------------- -हेडिंग: सहूलियत से बन जाए वेंडिंग जोन तो फुटकर विक्रेताओं की चांदी

Wed, 22 Oct 2025 07:20 PMNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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-हेडिंग: सहूलियत से बन जाए वेंडिंग जोन तो फुटकर विक्रेताओं की चांदी : ----------------- पूर्णिया, हिंदुस्तान संवाददाता। पूर्णिया शहर में कम से कम 25 हजार फुटकर विक्रेता हैं जो शहर के विभिन्न स्थान पर रोड के किनारे अपनी दुकान लगाकर रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। हालांकि फुटकर विक्रेता के पास लगभग 10 हजार की संख्या में फुटकर विक्रेता हैं जो चिन्हित किए गए हैं। इन सभी फुटकर विक्रेताओं में वैसे लोग हैं जो पूर्णिया शहर से लेकर गुलाब बाग तक रोड के किनारे चट्टी बिछाकर अपना व्यवसाय करते हैं। एक अनुमान के आधार पर अभी भी 50 हजार के करीब ऐसे युवा हैं जो व्यवसाय के लिए जगत तलाश रहे हैं।

पूर्णिया में वेंडिंग जोन नहीं रहने के कारण सोच कर भी स्वरोजगार अपनाना मुश्किल है। हालांकि शहरी क्षेत्र में राजेंद्र बाल उद्यान के समीप वेंडिंग जोन के रूप में फूड प्लाजा खोलने की बात चल रही थी लेकिन वह भी बात अब दब गई है। नगर निगम ने हाल फिलहाल पंचमुखी मंदिर के पास वेंडिंग जोन बनाया है, लेकिन लोगों को जगह नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा और कहीं भी वेंडिंग जोन नहीं है जिसके कारण सोच कर भी लोग व्यवसाय नहीं कर पा रहे हैं। सरकार लगातार युवाओं के रोजगार की बात कर रही है और बैंकों से वित्तीय सहायता प्रदान करने की भी व्यवस्था है परंतु जगह नहीं रहने के कारण उनके सपने अधूरे हैं। इस मसले पर परिचर्चा के दौरान कई लोगों ने कहा कि नगर निगम को जगह खोजना मुश्किल हो रहा है तो उन्हें दूसरा रास्ता अख्तियार कर प्रत्येक वार्डों में एक-एक वेंडिंग जोन बना देना चाहिए ताकि व्यवसाय करने वाले को भी सुविधा हो और मोहल्ले के लोगों को भी मार्केटिंग के लिए कहीं दूर दराज जाने का चक्कर न लगाना पड़े। लोगों ने बताया कि एक जमाने में जिस प्रकार भट्ठा बाजार में सब्जी एवं फल के साथ-साथ मछली और मांस बेचने वाले को जगह दी गई उसी प्रकार इसका विस्तार होना चाहिए। -कोरोना काल के बाद नया ट्रेंड:- -कोरोना काल के बाद बड़ी संख्या में बाहर दूसरे जगह पर काम कर रहे युवा पूर्णिया आए और जहां-तहां अपनी चाय पानी एवं फास्ट फूड की दुकान लगाने लगे। उन लोगों ने भी अन्य शहरों की तरह वेंडिंग जोन का डिमांड किया है लेकिन उनकी भी परेशानी कम नहीं है। लोग बता रहे हैं कि नए पूर्णिया के निर्माण के लिए जब तक जगह-जगह वेंडिंग जोन नहीं होंगे तो नई पीढ़ी को रोजगार की नई उम्मीद नहीं जगेगी। -हमारी बात:- --------------- 1. शहर में नई पीढ़ी को नए-नए रोजगार के लिए हर हाल में वेंडिंग जोन होना चाहिए। वेंडिंग जोन नहीं होने की स्थिति में छोटे-छोटे व्यवसाय को रोड किनारे पसारना पड़ता है। केशव कुमार गिरी 2. वेंडिंग जोन नहीं रहने के कारण फुटकर विक्रेताओं को रोड पर रोजाना दुकान लगानी पड़ती है और हटानी पड़ती है। यह बड़ी समस्या है किंतु अब तो यह लगता है नियति बन गई है। ब्रजमोहन प्रसाद यादव 3. छोटे-छोटे व्यापारी भी इंसान हैं। उन्हें भी अच्छी जगह मिलनी चाहिए। वेंडिंग जोन के अभाव में कलेक्टरेट रोड में फुटपाथ पर वेंडर का बड़ी संख्या में जमावड़ा रहता है। कैलाश मंडल 4. वेंडिंग जोन इसलिए जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति का छोटा-छोटा व्यवसाय भी सुरक्षित रह सके और ग्राहकों को भी वहां आने में सुविधा हो तथा व्यवसाय अच्छी तरीके से हो। सुरेंद्र कुमार मंडल 5. पूर्णिया शहर में मधुबनी बाजार से लेकर लाइन बाजार होते हुए गुलाब बाग तक हजारों दुकानदार ऐसे हैं जो रोड के किनारे चट्टी बिछाकर व्यवसाय करते हैं। शंकर झा 6. वेंडिंग जोन के अभाव में बड़ी संख्या में लोग रोड के किनारे व्यवसाय तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें ज्यादा गर्मी और बरसात की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। कभी-कभी अतिक्रमण का डंडा भी चल जाता है। अजय कुमार सिंह 7. सीजनल खुदरा व्यापारी के लिए अलग और स्थाई खुदरा व्यापारी के लिए अलग-अलग वेंडिंग जोन होना चाहिए ताकि लोगों को भी अपना सामान खरीदने में सुविधा हो। दिनेश पूर्वे 8. पूर्णिया शहर अब 46 वार्डो का हो गया है और यहां की जनसंख्या 3 लाख से ऊपर हो गई है ऐसी स्थिति में कम से कम दो दर्जन जगहों पर 200-200 दुकान का वेंडिंग जोन बनना चाहिए। सतीश चंद्र श्रीवास्तव 9. भट्ठा बाजार के सब्जी मंडी में तो दुकान है मगर बाहर में जो सब्जी दुकान रोड पर लगती है उसके लिए भी वेंडिंग प्लेस होना चाहिए। वेडिंग प्लेस नहीं होने के कारण जहां-तहां दुकान लगती है। कुमार उत्तम सिंह 10. अभी राजेंद्र बाल उद्यान के चारों तरफ छोटे-छोटे फुटकर विक्रेता वेंडिंग जोन के अभाव में अपनी दुकान रोड के किनारे लगाते हैं और इसी कारण जाम की समस्या उत्पन्न होती है। प्रमोद यादव 11. सरकार स्वरोजगार की बात करती है। वित्तीय सहायता भी देती है, लेकिन जगह नहीं तो कुछ नहीं वाली बात यहां हो रही है। वेंडिंग जोन के अभाव में छोटे-छोटे फुटकर विक्रेता कुंठित रहते हैं। डॉ सत्येंद्र कुमार सिन्हा 12. पूर्णिया शहर के सभी वार्ड में वेंडिंग जोन होना चाहिए जहां सब्जी और फल उपलब्ध रहे तो बुजुर्गों को कहीं दूर दाना जाना नहीं पड़ेगा और शहर जैसी सुविधा घर के आसपास ही मिलेगी। नित्यानंद यादव ------------------------------ वादे हैं वादों का क्या: पूर्णिया में मॉडल बस अड्डा का वादा अधूरा : -प्रमंडल में सबसे अधिक बसों का आवागमन पूर्णिया से -रोजाना सैकड़ों बसों से हजारों यात्री करते हैं आवागमन -बिहार के सभी जिलों के साथ बंगाल, झारखंड तक की बसें ------------ पूर्णिया। पूर्णिया में मॉडल बस अड्डा बनाने का वादा अभी तक अधूरा ही है। प्रगति यात्रा के दौरान भी मुख्यमंत्री ने पूर्णिया को मॉडल बस अड्डा की सौगात का ऐलान किया था। बाद में खबर आयी कि नया इंटर स्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) भी बनेगा। मगर वादे अभी तक जमीं पर उतर नहीं पाये हैं। पूर्णिया प्रमंडल में पूर्णिया से सबसे अधिक बसों का आवागमन होता है। जिले में रोजाना सैकड़ों बसें चलती हैं। बिहार के अलावा झारखंड, बंगाल, यूपी, दिल्ली तक के लिए बस जाती है। लोकल पैसेंजर अलग है। रोजाना हजार यात्री बसों से सफर करते हैं। बावजूद शहर के अंदर बना बस अड्डा बेहाल है। जिला मुख्यालय में जिला परिषद का बस अड्डा काफी जीर्ण- शीर्ण है, जहां चारों ओर कचरे एवं दुर्गंध से नाक देना भी संभव नहीं है। ऐसे में वहां बस का इंतजार करना यात्रियों के लिए काफी मुश्किल भरा होता है। हाकिमों ने इस दिशा में काम को आगे बढ़ाने की बात कही थी। इस बस अड्डे में आधुनिकतक यात्री सुविधा की बातें सुनकर जिले वासियों का दिल बाग- बाग हो उठा था। खासकर बस यात्रियों को लगा था कि अब अपने जिले में भी उनका ख्याल रखा जाएगा। परन्तु इसके बाद यह योजना फाइलों में कहीं गुम हो गयी। यही नहीं जिले में हर प्रखंड में बस स्टॉप बनाने की योजना थी। कुछ प्रखंडों में इसकी शुरूआत भी हुई, परन्तु वह भी अब तक बेकाम की चीज बनी हुई है। लोकल स्तर पर बनमनखी और धमदाहा रूट पर अच्छी तादाद में बसों का परिचालन होता है। बनमनखी में रजिस्ट्री ऑफिस के पास बस स्टाप के लिए जमीन तो चिन्हित कर लिए गए, परन्तु सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। नतीजतन अब भी एनएच 107 के किनारे यात्री शेड के सामने बसें रूक रही हैं। कुछ यही हाल धमदाहा का भी है। वहां भी सड़क पर ही बस लगती है। बस अड्डे एवं बस स्टॉप की बदतर हालत पर जबावदेह के कोरे आश्वासन के कारण सलाना लाखों- करोड़ों का राजस्व देने वाले जिले के बस स्टॉप अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर हैं। -प्रस्तुति : रंजीत। मुझे कुछ कहना है : मेरा पूर्णिया मतदान में आये अव्वल -फोटो : हरिओम झा : पूर्णिया। बिहार विधानसभा आम चुनाव में खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों, अभिभावकों एवं शुभचिंतकों से विनम्र अनुरोध है कि मतदान कर अपने मताधिकार का दायित्व अवश्य निभाएं। ईस्ट जोन पूर्व चेयरमैन व बिहार अंडर 14-16 पूर्व चयन समिति सदस्य व क्रिकेट प्रशिक्षक हरिओम झा ने कहा कि लोकतंत्र के महापर्व में सभी मतदाताओं को पूरे उत्साह के साथ बढ़-चढ़ कर मतदान करना चाहिए। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हमें भी अपनी दायित्व का निर्वाहन करना चाहिए। अपने परिवार के साथ- साथ समाज के मतदाताओं को मताधिकार के प्रति भी जागरूक किया जाना चाहिए और प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए। खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों, अभिभावक एवं शुभचिंतकों से अनुरोध है कि मेरा पूर्णिया मतदान में अव्वल रहे। बेहतर जनप्रतिनिधि ही सुन्दर एवं विकसित समाज का सपना साकार कर सकते हैं। अपने परिवार एवं समाज के बड़े बुजुर्ग, माता-पिता एवं भाई-बहनों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में अवश्य मदद करने का प्रयास किया जाना चाहिए। ताकि सभी मताधिकार का दायित्व निभा सकें। मताधिकार का प्रयोग कर अच्छे जनप्रतिनिधियों का चयन किया जा सके। जो पहली दफा मताधिकार का दायित्व निभाने जा रहे हैं। उनको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। अच्छे जन-प्रतिनिधि ही बेहतर समाज के निमार्ण एवं विकास में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए हर मतदाता को वोट जरूर करना चाहिए। अतीत की यादें : सभी विरोधियों की जमानत हो गयी जब्त 1957 में बिहार में हुआ दूसरी बार आम चुनाव पूर्णिया। पूर्णिया के पहले विधायक कमलदेव नारायण सिन्हा ने अपनी पुस्तक मेरे संस्मरण में लिखा है कि बिहार में दूसरी बार आम चुनाव 1957 में हुआ। एक जनवरी को मैंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के कामाख्या स्थान में एक आम सभा का प्रबंध किया था। उस समय यहां एक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। कामाख्या स्थान भगवती देवी का एक जागृत स्थान माना जाता है। यहां कुष्ठ रोगी रहकर देवी की सेवा करते और चंगा हो जाते। इसके बाद वह घर चले जाते। उसी समय तय किया गया कि यहां एक आश्रम खोला जाये। जहां कुष्ठ रोगियों की सेवा और दवा का प्रबंध हो। 11 जनवरी को पूर्णिया में एक हरिजन सम्मेलन हुआ। 25 जनवरी को सदर एसडीओ पूर्णिया के यहां निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन का आवेदन पत्र दिया। 22 मार्च 1957 को मतगणना के बाद जीत की घोषणा हुई। प्रथम चुनाव से अधिक वोट इस बार प्राप्त हुआ। सभी विरोधियों की जमानत जब्त हो गयी। पूर्णिया का दूसरी बार विधायक चुना गया। नुक्कड़ पर चर्चा...तो क्या यहां न्यूटन चुनाव लड़ने आएगा? पॉलीटेक्निक चौक प्रस्तुति : धीरज पूर्णिया। अपनी धरती तो...आर्यभट्ट...चाणक्य...बुद्ध की धरती...है। पता नहीं चुनाव में क्या हो जाता है...इंटर पास ही मन को भा जाता है? अब प्लस टू वाले को चुनेंगे तो फिर ऊ अपने हिसाब से पढ़ाएगा...अब ई तो जानबे करते हैं कि हमलोग पढ़ते खूब हैं...अब बच्चे से ही आखिर पढ़ने की आदत जो रही है। घर में मां-बाप...स्कूल में गुरु जी...सब बस यही कहते हैं अरे मन लगाकर पढ़ो। अब दोष तो हमी लोगों का है। अरे कभी ग्रेजुएशन, पीजी, पीएचडी वालों को भी टेबते। मगर बंट जाते हैं जात-पात और धर्म के चक्कर में। न देखते हैं न सोचते हैं फिर दबा देते हैं बटनवा। पीं-पीं की आवाज आती है। खुश हो जाते हैं...चुन लिए नेता। काम खत्म...? फिर नेता से पांच साल बाद ही पड़ता है वास्ता। पॉलीटेक्निक चौक पर इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने पढ़े लिखे बाबा ई चर्चा कर ही रहे थे कि...बीरबल जैसा हाजिरजवाबी युवा बोल पड़ा...तो का न्यूटनवा यहां चुनाव में उतरेगा? अब ई नाम सुने हैं ना। यहो बताना पड़ेगा कि न्यूटन कौन है? वहीं जिसने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दिया था। अब गुरुत्वाकर्षण भी समझाना पड़ेगा। आजकल जानबै करते हैं कि गुरुत्व और आकर्षण किसमें होता है...? खींचे चले आते हैं...जैसे शहद के छत्ता में मधुमक्खी...। का कीजियेगा जमाने ऐसा ही हो गया है...। राजा से लेकर प्रजा तक सब इसके फेर में फंस जाता है। फिर न शिक्षा देखते हैं न दीक्षा। तभी बाबा बोले..अरे हम तो तुम्हरे उमर के युवाओं की भलाई के लिए ही न बोल रहे हैं? तभी युवा फिर अपने अंदाज में बोला... बाबा पलायन तो हमारी नियति है...? कुछ पढ़ने के लिए पलायन कर जाते हैं...फिर कुछ पढ़ने लिखने के बाद। कुछ तो ऐसे हैं जो गए तो फिर लौटे भी नहीं? फिर यहां जो बचता है...वहीं न मैदान में उतरेगा। अब जो लड़ेगा उसी को न वोट देंगे? अब ऐसे में गैलेलियो का टेलीस्कोप कहां से लाएं? जिससे दूर से ही बीन (छान) लें। अब जो आएगा उसमें से ही चुनना है। इसमें जो बढ़िया होता है, उसी को लोग चुन लेते हैं। फिर ऊ कितना पढ़ा लिखा है? ई कौन देखता है। तभी बाबा बोले फिर प्लस टू वाला सबको पांच साल तक पढ़ाते रहते हैं। अपने मन की चलाते रहते हैं। फिर युवा बोल पड़ा...इसमें भी गलती आर्यभट्ट का ही है ना...न सुन्ना बनाते...न इतना लोग सुन्ना के पीछे भागता...फिर सब शून्य ही रहता। सोशल मीडिया से : नाम वापसी का रेट क्या? पूर्णिया। चुनावी अखाड़ा सजने लगा है। नामांकन का दौर खत्म हो चुका है। स्क्रूटनी के बाद अब नाम वापसी की बारी है। हर बार की तरह चुनावी मैदान में कुछ लोग बस कूद-भाग करने के लिए होते हैं। कुछ तो नामांकन ही अपनी सामाजिक-राजनीतिक हैसियत को बताने के लिए करते हैं। कुछ दूसरे के समर्थन में बैठने के लिए भी कागज भरते हैं। पूर्णिया समेत सीमांचल में दूसरे चरण के तहत चुनाव होने वाला है। 23 अक्टूबर तक ही नाम वापसी है। एक महोदय ने सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी...नाम वापसी का रेट क्या चल रहा है? चर्चा छिड़ते ही लोगों की अलग-अलग राय सामने आने लगी। सबने अपने हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। एक ने कहा.. बस चाय-पानी के खर्चा की चर्चा है।