बोले कटिहार : रोजगार सेवकों का मानदेय बढ़ाए बिना विकास अधूरा
कटिहार जिले के पंचायत रोजगार सेवकों की जिंदगी संघर्षों से भरी है। 18 वर्षों की सेवा के बावजूद उन्हें स्थायी दर्जा और उचित वेतन नहीं मिल पाया है। महंगाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे आर्थिक...

प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज
गांव की सुबह से शाम तक विकास की हर धड़कन पंचायत रोजगार सेवकों की मेहनत से जुड़ी है। कोई खेतों में तालाब खुदवाता है, कोई सड़क बनवाता है तो कुछ बेरोजगारों को काम देकर उनकी रोटी साझा करते हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि जिन लोगों ने गांव के जीवन को बेहतर बनाने में दिन-रात मेहनत की, वे खुद असुरक्षा और तंगी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। 18 वर्षों से सेवाएं देने के बावजूद उन्हें न तो स्थायी दर्जा मिला है, न ही वेतन का उचित सम्मान। उनकी स्थिति आज भी अनिश्चित और मुश्किल बनी हुई है। वेतनहीनता और उपेक्षा के बीच उनकी आंखों में उम्मीद की नमी फिर भी बाकी है, जो सरकार से न्याय और उचित दर्जा मिलने की आस लिए बैठी है।
कटिहार जिले के 16 प्रखंडों की 231 पंचायतों में कार्यरत पंचायत रोजगार सेवकों की जिंदगी संघर्षों से भरी है। 2007 से लगातार मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं की रीढ़ बने इन सेवकों को आज भी स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है। 18 वर्षों की सेवा के बावजूद वेतन कम होने के कारण अपने परिवार का खर्च मुश्किल से चला पाते हैं। शुरू में उनका मानदेय 5-6 हजार रुपये था, जो अब बढ़ कर 17,338 रुपये तक पहुंचा है, लेकिन महंगाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते यह राशि उनकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही। पंचायत रोजगार सेवक गांवों में रोजगार मांग दर्ज करने से लेकर, काम की गुणवत्ता की निगरानी, रिपोर्टिंग, चुनावी ड्यूटी और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाते हैं। उनकी सक्रियता से ही मनरेगा जैसी योजनाएं सफल हो पाती हैं। बावजूद इसके, वे अपनी आर्थिक कठिनाइयों की बात करते हुए भावुक हो जाते हैं।
वे कहते हैं कि वे दूसरों को रोजगार दिलाते हैं, लेकिन खुद को स्थायी रोजगार सुरक्षा नहीं मिल पा रही। बिहार राज्य पंचायत रोजगार सेवक संघ, कटिहार के जिलाध्यक्ष अरुण कुमार के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व उपमुख्यमंत्री और विधायक तारकिशोर प्रसाद, बरारी विधायक विजय सिंह निषाद और प्राणपुर विधायक निशा सिंह से मुलाकात कर अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा। इस प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि ग्रामीण विकास विभाग की समिति ने पंचायत रोजगार सेवकों का मानदेय 28 से 32 हजार रुपये करने की सिफारिश की है, परंतु अबतक यह लागू नहीं हुआ। संघ का कहना है कि उनका भुगतान आकस्मिक मद से नहीं, बल्कि राज्य कोष से होना चाहिए ताकि स्थायी कर्मचारियों जैसी सुरक्षा और सम्मान उन्हें मिल सके। जिला महामंत्री निरंजन कुमार सहित अन्य पंचायत रोजगार सेवक बताते हैं कि यदि वे हतोत्साहित होंगे तो योजनाओं का असर सीधे ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाएगा। उनकी सबसे बड़ी व्यथा यह है कि वे गांव के गरीबों को सशक्त तो कर रहे हैं, परंतु अपने परिवार गरीबी और अभाव में जी रहा है। एक पंचायत रोजगार सेवक ने कहा कि उन्होंने गांव में सड़क बनाई, तालाब खुदवाए, पौधे लगाए, पर अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अभी भी कर्ज लेना पड़ता है। बरारी प्रखंड के रोजगार सेवक प्रवीण चौधरी कहते हैं कि गांव की विकास संबंधी सभी कार्य उनकी देखरेख में हुए हैं, फिर भी उनकी पहचान अस्थायी कर्मचारी के रूप में है। वे अपने वेतन को कम बताते हुए इस स्थिति पर दुख जताते हैं।
सरकार रोजगार सेवकों की पीड़ा को समझे
मनरेगा मजदूर रामेश्वर महतो का कहना है कि यदि रोजगार सेवक ईमानदारी से काम न करें तो कोई भी योजना सही तरीके से नहीं चल पाएगी। उन्हें चाहिए कि सरकार रोजगार सेवकों की पीड़ा को समझे और तत्काल समाधान करे। कटिहार के दूरदराज इलाकों में पंचायत रोजगार सेवक दिन-रात दफ्तर और गांव की पगडंडियों में दौड़ लगाते हैं। उनके पास गांव के हर परिवार का रिकॉर्ड होता है, लेकिन उनका परिवार आर्थिक असुरक्षा में जी रहा है। गांव की चौपालों में यह विषय चर्चा का केन्द्र बना हुआ है कि जो लोग गांव की रीढ़ हैं, उन्हें ही आर्थिक रूप से मजबूर क्यों रखा जा रहा है?
पत्नियां भी झेल रही महंगाई की मार
मनिहारी प्रखंड के संजीव कुमार कहते हैं कि 17,338 रुपये में परिवार चलाना किसी जंग से कम नहीं। किराया, बच्चों की पढ़ाई, बूढ़ी मां की दवाई- सब अधूरा रह जाता है। उनकी आंखें हजारों परिवारों की पीड़ा बयान करती हैं। उनकी पत्नियां भी महंगाई की मार झेल रही हैं। एक रोजगार सेवक की पत्नी कहती हैं कि बच्चे जब ट्यूशन या नई किताब मांगते हैं तो दिल टूट जाता है कि पैसे कहां से लाएं। पंचायत रोजगार सेवक मेहनत करते हैं, लेकिन उनका परिवार अभाव का सामना करता है। यह स्थिति उस सामाजिक वर्ग के लिए चुनौतीपूर्ण है, जो न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे गांव की जिम्मेदारी उठाता है।
सिर्फ वादे नहीं, बल्कि निर्णायक कदम चाहिए
बुधवार का दिन पंचायत रोजगार सेवकों के लिए खास था। जिला इकाई के नेतृत्व में सैकड़ों रोजगार सेवक जनप्रतिनिधियों से मिले। पूर्व उपमुख्यमंत्री और विधायक तारकिशोर प्रसाद से मुलाकात में कई रोजगार सेवकों की आंखें नम हो गईं। एक सेवक ने कहा कि मनरेगा से लेकर चुनाव तक में सरकार का बोझ उठाया, लेकिन स्थायी मान्यता नहीं मिली। बरारी विधायक विजय सिंह निषाद और प्राणपुर विधायक निशा सिंह को ज्ञापन सौंपते हुए सेवक भावुक हो गए। उन्होंने खुलकर कहा कि वादे नहीं, बल्कि निर्णायक कदम चाहिए। कटिहार के जनप्रतिनिधियों ने उनकी बातों को गंभीरता से लेते हुए आश्वासन दिया कि उनकी आवाज सरकार तक पहुंचेगी।
सुनें हमारी बात
हम गांव में गरीब मजदूरों के हाथों में काम और रोटी देने का काम करते हैं, लेकिन खुद की रोटी-पानी चलाना मुश्किल हो गया है। स्थायी दर्जा और उचित वेतन मिले।
-प्रकाश यादव
पंचायत रोजगार सेवकों ने ही मनरेगा को धरातल पर उतारा है। गांव-गांव में रोजगार, सड़क और तालाब हम ही लाए हैं। लेकिन हमारे साथ नाइंसाफी हो रही है।
-राहुल पासवान
आदिवासी समुदाय को रोजगार देने में पंचायत रोजगार सेवकों ने बड़ी भूमिका निभाई है। मैं खुद गवाह हूं कि हमने कैसे लोगों को खेत-खलिहानों में काम दिलाया।
- बुद्धन एस किस्कू
कई परिवार मनरेगा से जुड़कर आज अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। यह संभव हुआ पंचायत रोजगार सेवकों की सक्रियता से। लेकिन हमें खुद बच्चों की फीस भरने में दिक्कत आती है।
-राजेश कुमार
हमारे ऊपर जिम्मेदारी बहुत है। रोजगार दिलाना, योजनाओं की रिपोर्टिंग, निगरानी करना। लेकिन जब मानदेय मिलता है तो दिल टूट जाता है।
-पवन कुमार
हमने दिन-रात गांव के लिए काम किया है। सड़क, पौधरोपण और तालाब खुदाई जैसे काम हमने पूरे कराए। लेकिन सम्मानजनक जीवन नहीं मिल रहा। -रामदेव कुमार
मेरे ख्याल से पंचायत रोजगार सेवक सबसे ज्यादा जिम्मेदारियों वाला काम करते हैं, लेकिन इनका दर्जा अनुबंधित कर्मी से ज्यादा नहीं। यह बेहद निराशाजनक है।
-अजय चौधरी
हमारी नौकरी आज भी अस्थायी है, जबकि हम वर्षों से सरकार की योजनाओं की रीढ़ बने हुए हैं। यह कैसा न्याय है? हर बार हम सुनते हैं कि मानदेय बढ़ेगा, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं होता।
-बरुण कुमार
महंगाई इतनी बढ़ गई है कि 17 हजार रुपये में परिवार पालना असंभव है। बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ना चाहते हैं, लेकिन फीस भरना कठिन हो गया है।
-संजीव कुमार
गांव-गांव में मनरेगा की पहचान पंचायत रोजगार सेवकों से है। हम ही मजदूरों तक काम पहुंचाते हैं। फिर भी हम खुद असुरक्षा में जीते हैं। हमारी मेहनत का कोई मोल नहीं समझा जाता।
-गिरधारी कुमार
हमारे पास इतना काम होता है कि कभी परिवार को समय नहीं दे पाते। गांव की हर योजना हमारी निगरानी में चलती है। लेकिन हमारी तनख्वाह देखकर मन टूट जाता है।
-दीनबंधु कुमार
सबसे बड़ी समस्या यह है कि हर साल उम्मीद जगती है, लेकिन कुछ ठोस नहीं होता। हम थक चुके हैं बार-बार अपनी बात कहकर। अब सरकार को गंभीरता दिखानी होगी।
-चंदन पांडेय
आज भी कई पंचायतों में रोजगार योजनाएं हमारी मेहनत से चल रही हैं। लेकिन हम खुद असुरक्षित हैं। पंचायत रोजगार सेवकों को स्थायी सेवा का दर्जा मिले।
-राजकुमार
हमने सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि गांव में आत्मनिर्भरता की नींव रखी। लोग आज मनरेगा के सहारे जी रहे हैं। लेकिन हम अपनी रोजी-रोटी के लिए परेशान हैं।
- प्रवीण चौधरी
लंबे समय से सम्मानजनक मानदेय और स्थायीकरण की मांग कर रहे हैं। सरकार समिति की सिफारिश को लागू कर वेतन बढ़ाए और स्थायी दर्जा दे।
-अरुण कुमार, जिलाध्यक्ष
मानदेय बेहद कम है और नौकरी असुरक्षित। हम चाहते हैं कि सरकार तुरंत हमारी मांगें मानकर हमें नियमित सेवा और उचित वेतन दे। यही न्याय होगा। -निरंजन कुमार, महामंत्री
बोले िजम्मेदार
कटिहार के विकास और जनहित के मुद्दों पर मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना। पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास जारी हैं। सड़क, बिजली और जलापूर्ति जैसी प्राथमिक सुविधाओं को विशेष महत्व दिया जा रहा है। मैं जनता को भरोसा दिलाता हूं कि उनकी शिकायतों का त्वरित समाधान किया जाएगा।
तार किशोर प्रसाद, पूर्व डिप्टी सीएम सह सदर विधायक, कटिहार
शिकायत
1. 18 वर्षों की सेवा के बाद भी स्थायीकरण नहीं हुआ।
2. वर्तमान मानदेय परिवार और बच्चों के लिए अपर्याप्त है।
3. अन्य विभागों में बाद में नियुक्त कर्मियों को भी अधिक वेतन मिल रहा है।
4. काम का बोझ बढ़ता जा रहा है, लेकिन मानदेय और सुविधाओं में वृद्धि नहीं।
5. सरकार से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
सुझाव
1. पंचायत रोजगार सेवकों का मानदेय न्यूनतम ₹30,000 प्रतिमाह किया जाए।
2. स्थायी कर्मचारी का दर्जा देकर नियमित सेवा शर्तें लागू की जाएं।
3. भुगतान राज्य कोष (वित्त विभाग) से सुनिश्चित हो।
4. वार्षिक वेतन वृद्धि और पेंशन की व्यवस्था हो।
5. प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधन और कार्य की सुगमता के लिए आधुनिक साधन उपलब्ध कराए जाएं।
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