
विश्व मृदा दिवस पर किसानों ने ली मृदा संरक्षण की शपथ
जलालगढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा विश्व मृदा दिवस पर भठेली गांव में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। 75 किसानों ने मृदा जांच के आधार पर उर्वरक उपयोग करने की शपथ ली। वैज्ञानिक डॉ. के.एम. सिंह ने मृदा की गुणवत्ता और फसल उत्पादन के बीच संबंध बताया तथा अत्यधिक यूरिया के उपयोग से बचने की सलाह दी।
जलालगढ़, एक संवाददाता। कृषि विज्ञान केंद्र जलालगढ़ की ओर से विश्व मृदा दिवस के अवसर पर जलालगढ़ प्रखंड अंतर्गत भठेली गांव में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में करीब 75 महिला और पुरुष किसानों ने भाग लिया और मृदा जांच के आधार पर ही उर्वरक उपयोग करने की शपथ ली। इस मौके पर केंद्र के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. के.एम. सिंह ने किसानों को बताया कि फसलों की बढ़वार और उपज पूरी तरह मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। पौधों के विकास के लिए कुल 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर के साथ सात सूक्ष्म पोषक तत्व शामिल हैं।

इन सूक्ष्म तत्वों की कम मात्रा ही फसलों में फूल, फल और उपज को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है। डॉ. के.एम. सिंह ने कहा कि मृदा को जननी के समान माना जाता है। यदि मृदा स्वस्थ रहेगी तो फसल भी स्वस्थ होगी और उत्पादन भी बेहतर होगा। उन्होंने किसानों को अत्यधिक यूरिया के प्रयोग से बचने की सख्त सलाह दी। उदाहरण देते हुए बताया कि वर्तमान में मक्का फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 150 किलो नाइट्रोजन, 75 किलो फास्फेट और 50 किलो पोटाश की जरूरत होती है। फास्फोरस और पोटाश बुआई के समय देना चाहिए जबकि नाइट्रोजन को दो बराबर किस्तों में देना उचित रहता है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रत्येक दो फसलों के बाद 10 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर खाद खेत में मिलानी चाहिए। साथ ही वर्मी कम्पोस्ट 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय और खड़ी फसल में सिंचाई के दौरान देने से मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ती है। उन्होंने बताया कि इससे जल, वायु और भूमि प्रदूषण बढ़ता है, जिससे मानव और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। त्वचा रोग, सूजन, आंखों की समस्याएं, यहां तक कि गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। कार्यक्रम के अंत में किसानों को समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने का संदेश दिया गया ताकि रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक और कार्बनिक खाद का भी संतुलित उपयोग हो सके। इस अवसर पर केंद्र की अन्य वैज्ञानिक डॉ. संगीता मेहता, डॉ. गोविंद कुमार, यशवंत कुमार, संजय कुमार, अजीत कुमार सहित कई किसान मौजूद थे।

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