खेल-खेल में बच्चे के घुटने में सूजन और जोड़ों में दर्द तो करा लें हीमोफीलिया की जांच

हिन्दुस्तान, भागलपुर
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विश्व हीमोफीलिया दिवस (17 अप्रैल) पर विशेष प्रतिरोधक फैक्टर के जरिये इस बीमारी को

खेल-खेल में बच्चे के घुटने में सूजन और जोड़ों में दर्द तो करा लें हीमोफीलिया की जांच

भागलपुर, वरीय संवाददाता। अगर आपके घर-आंगन में खेल रहे बच्चे के घुटने में सूजन, चोट लगने पर खून न रुक रहा या फिर जोड़ों में दर्द हो रहा है तो आप जरा सतर्क हो जाएं। हो सकता है कि इस लक्षण से ग्रसित आपका बच्चा हीमोफिलिया का शिकार हो। ये लक्षण दिखे तो आप शिशु रोग विशेषज्ञ से मिल लें। दरअसल, जिले में हाल के सालों में हीमोफीलिया के मामले दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन इस बीमारी का इलाज जिंदगी भर चलता है। ऐसे में जरूरत है कि जागरूक व सतर्क रहने की।छह

साल में ढाई गुने हो गये हीमोफिलिया के मरीजजवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (मायागंज अस्पताल) में इलाज के लिए आने वाले हीमोफीलिया के मरीजों की बात करें तो आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि बीते छह साल में करीब दोगुने हुए हैं। साल 2019 में मायागंज अस्पताल में हीमोफीलिया के 23 नए मरीज मिले थे तो साल 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 58 पर पहुंच गया था। मायागंज अस्पताल के थैलेसीमिया डे केयर सेंटर के प्रभारी डॉ. राकेश कुमार बताते हैं कि इस साल हर माह औसतन चार से पांच बच्चे हीमोफीलिया का शिकार होकर इलाज के लिए आ रहे हैं। इनके आने के साथ ही उसी दिन फैक्टर चढ़ाने के बाद उसी दिन इलाज करके भेज दिया जाता है।प्रतिरोधक फैक्टर के जरिए हीमोफीलिया का इलाज, फिजियोथेरेपी भी जरूरीनेशनल हेल्थ पोर्टल के अनुसार, करीब 10 हजार में से किसी एक बच्चे को हीमोफीलिया होने की आशंका होती है। मायागंज अस्पताल के थैलेसीमिया डे केयर सेंटर पर ही हीमोफिलिया के बीमार बच्चों का इलाज किया जाता है। मायागंज अस्पताल के शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. अंकुर प्रियदर्शी ने बताया कि प्रतिरोधक फैक्टर के जरिये इस हीमोफीलिया की बीमारी को नियंत्रित किया जाता है। इस बीमारी में आंत या दिमाग के हिस्से में होने वाले रक्तस्राव से जान भी जा सकती है। जोड़ों में सूजन के साथ जब इस बीमारी में अक्सर दर्द होता है तो यह आंतरिक रक्तस्राव के कारण होता है। जो आगे चलकर दिव्यांगता में परिवर्तित हो सकता है। ये बीमारी आनुवांशिक होती है और विशेषकर ननिहाल पक्ष में कोई अगर हीमोफीलिया से ग्रसित हो तो इससे संबंधित बच्चे को हीमोफीलिया होने का खतरा ज्यादा होता है। रक्तस्राव के कारण जोड़ों में खून का थक्का जम जाता है। इससे जोड़ पूरी तरह से काम नहीं करते। इसके इलाज के लिए दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी की दरकार होती है। मायागंज अस्पताल में यह सुविधा नि:शुल्क में उपलब्ध है।हीमोफिलिया के बीमारों को चढ़ता है तीन प्रकार के फैक्टर वाला खूनयह बीमारी तीन प्रकार की होती है। जिन लोगों में रक्त का थक्का जमाने वाले फैक्टर आठ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया ए होता है और जिनमें फैक्टर नौ की कमी होती है, उन्हें बी होता है। इसके अलावा कुछ मरीजों में फैक्टर सात भी चढ़ाया जाता है। मरीज में जिस फैक्टर की कमी होती है, उसे इंजेक्शन के जरिये नस में दिया जाता है। सेंटर पर आने वाले ज्यादातर मरीज में से 80 से 85 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर आठ लगाया जाता है। जबकि, 15 से 20 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर नौ लगाया जाता है। जबकि फैक्टर सात के मरीज जिले में न के बराबर हैं।ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सतर्क- मांसपेशियों एवं जोड़ों में रक्तस्राव या दर्द होना।- नाक से लगातार खून निकलना।- त्वचा का आसानी से छिल जाना- शरीर पर लाल, नीले व काले रंग के गांठदार चकत्ते पड़ना।- सूजन, दर्द व त्वचा का गरम हो जाना।- चिड़चिड़ापन, उल्टी, दस्त, ऐंठन, चक्कर व घबराहट।- मूत्र या शौच करते समय तकलीफ होना- सांस लेने में समस्या होना।- खून या काला गाढ़े घोल जैसे पदार्थ की उल्टी होना।

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