
सुपौल: सीमापार नेपाल में हिंसा और आगजनी थमने पर राहत, स्थिति अब भी अराजक
सुपौल में बुधवार को सीमापार हिंसा और प्रदर्शन की घटनाएँ घटित नहीं हुई। नेपाल की सेना ने स्थिति को नियंत्रित कर लिया है। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ था, जिसमें युवाओं ने भाग...
सुपौल। सीमापार बुधवार को हिंसा, आगजनी, प्रदर्शन और तोड़फोड़ की घटनाएं घटित नहीं हुई है। भारत से सटे भंटाबाड़ी, इनरवा, भारदह, इटहरी, विराटनगर, जनकपुर इलाकों में कफ्र्यू की वजह से काफी कम लोग सड़कों पर निकले। यही वजह है कि इक्का-दुक्का जगहों कहीं-कहीं प्रदर्शन की बात सामने आई है। इसकी वजह यह है कि मंगलवार की रात से ही नेपाली सेना ने वहां की स्थिति पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है और स्पष्ट शब्दों में नेपाल के सेनाध्यक्ष जनरल सिग्देल ने कहा है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सेनाध्यक्ष जनरल सिग्देल ने कहा है कि सरकारी संपति की रक्षा करना सबों की जिम्मेदारी है।
इसके बाद विराटनगर, दुहबी, इटहरी, इनरवा, भंटाबाड़ी, भारदह सहित अन्य इलाकों की सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। भारतीय कारोबार पर नहीं सिर्फ क्रप्ट नेता है टार्गेट सीमा पार भारतीय के कारोबार, उद्योग और घरों को निशाना बनाने की बात कहीं से सामने नहीं आई है। दरअसल यह आंदोलन किसी जाति या समूह विशेष के खिलाफ नहीं था। बल्कि स्थानीय राजनेताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ था। इसमें सबों ने खासकर युवाओं ने क्रप्ट राजेनता और क्रप्शन के खिलाफ नेपाल में उबाल हुआ। सरकारी दफ्तर और बड़े-बड़े कॉमर्शियल ठिकानों को निशाना बना गया। सीमा पर स्थित भारतीय बाजारों में लगभग सन्नाटे की स्थिति है। निश्चित तौर पर कारोबार पर व्यापक असर पड़ा है। कारोबारी सटीक आकलन बहरहाल मुश्किल है। लेकिन जानकारों का कहना है कि 25 से 30 फीसदी कारोबार प्रभावित हुआ है। सोशल मीडिया के जरिए संपर्क कर जान रहे कुशल क्षेम वैसे परिवार जिनके पारिवारिक रिश्ते नेपाल में हैं या फिर बहन बेटी ब्याही गई हैं। उनलोगों में निश्चत तौर पर आशंका व्याप्त है। लेकिन बुधवार को स्थिति सामान्य होने के बाद काफी हद तक ऐसे परिवारों की चिंता कम हुई है। सोशल मीडिया के जरिए अपने लोगों से बातचीत भी हो पा रही है। लेकिन नेटवर्क में व्यावधान की वजह से हमेशा ऐसा नहीं हो पा रहा है। जनप्रतिनिधि घर छोड़कर भागे, गुस्साई भीड़ के शिकार होने का अंदेशा इस आंदोलन में सबसे अधिक निशाना राजनेताओं और उनके परिवार को बनाया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख बहादुर देउबा की जमकर पिटाई हुई जबकि पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी व यही हाल प्रदेश और नगर पालिका स्तर के जनप्रतिनिधियों का भी रहा जो गुस्साए लोगों को शिकार बने। जगह-जगह उनकी पिटाई हुई और स्थिति यह रही कि उन्हें घर छोड़कर भागना पड़ा है। दरअसल आम लोग यह मानते हैं कि नेपाल की बदहाली का कारण यहां के राजनेता हैं और सत्ता में शामिल लोगों ने संपति अर्जित कर नेपाल को खोखला बनाने का काम किया है। इस प्रकार यह आंदोलन मूलत: राजनेताओं के खिलाफ ही थी। जिसका परिणाम हुआ यह हुआ कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक को इस्तीफा देना पड़ा।

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