
प्रकृति की पूजा, रक्षा करने से ईश्वर होते हैं प्रसन्न : प्रेममूर्ति नीलमणि
सनोखर बाजार में कार्तिक मेले के अवसर पर हो रहा श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन
प्रकृति ही ईश्वर का रूप है और प्रकृति की पूजा-रक्षा करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। ईश्वर प्रकृति के कण-कण में मौजूद हैं और प्रकृति की सेवा ईश्वर की सेवा के समान है। उक्त बातें कार्तिक मेले के अवसर पर सनोखर बाजार में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को वृंदावन धाम से पधारी कथावाचक प्रेममूर्ति नीलमणि देवी ने कहीं। उन्होंने कहा कि हर रोज सुबह सूर्य उगता है और शाम को ढलता है। प्रकृति के नियम के मुताबिक सारी ऋतुएं बदलती रहती हैं। ईश्वर प्रकृति में ही है, इन सबकी अनुभूति इन कारणों से होती है। वहीं भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण के जन्म के बाद कंस उन्हें मौत के घाट उतारने के लिए सर्वाधिक बलवान राक्षसी पूतना, अघासुर, बकासुर जैसे कई राक्षसों को भेजता है।

लेकिन भगवान श्रीकृष्ण सभी को मौत के घाट उतार देते हैं। उसके बाद बृजवासी भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए पूजन की तैयारी करते हैं। भगवान कृष्ण उन्हें इंद्र की पूजा करने से मना करते हुए गोवर्धन महाराज की पूजा करने को कहते हैं। इंद्र भगवान यह बात सुनकर क्रोधित हो जाते हैं और क्रोधवश भारी वर्षा करते हैं। जिसे देखकर समस्त बृजवासी परेशान हो जाते हैं। भारी वर्षा को देख भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर पूरे बृजवासियों को उसके नीचे आश्रय देते हैं। हारकर इंद्र एक सप्ताह बाद वर्षा बंद कर देते हैं। जिसके बाद बृज में भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज के जयकारे लगने लगते हैं। मौके पर भगवान को छप्पन भोग लगाया गया। दिव्य कथा, झांकियों के मनमोहक दृश्य, मटकी फोड़ लीला और भरे भजनों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। मेला शांति समिति के सभी सदस्य, कार्यकर्ता, ग्रामीण युवा और बुजुर्ग सक्रिय रूप से कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग कर रहे हैं।

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