
बोले मुंगेर : फूलों की खेती से ग्रामीण रोजगार की बड़ी संभावना
मुंगेर में फूलों के उत्पादन की संभावनाएं हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी और सरकारी उपेक्षा ने इस क्षेत्र को संकट में डाल दिया है। स्थानीय किसान मानते हैं कि यदि उन्हें सही सहायता मिले, तो फूलों की खेती से उनकी आय बढ़ सकती है और जिले की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है।
- प्रस्तुति: गौरव कुमार मिश्रा मुंगेर में फूल उत्पादन की संभावनाएं बेहद विस्तृत हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी और सरकारी तंत्र की उपेक्षा ने इस क्षेत्र को सीमित कर दिया है। स्थानीय किसानों व माली समाज का मानना है कि आवश्यक सहारा मिलने पर फूलों की खेती न केवल उनकी आय बढ़ा सकती है, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकती है। फूलों की खेती को संगठित उद्योग का दर्जा दिया जाए और सरकार सही दिशा में पहल करे, तो यह ग्रामीणों के लिए स्थायी रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकता है। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि जिले की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा।
मुंगेर की पहचान केवल अपने ऐतिहासिक और प्राकृतिक वैभव से नहीं, बल्कि पारंपरिक फूलों की खुशबू से भी रही है। यहां की उपजाऊ मिट्टी और अनुकूल मौसम दशकों तक फूल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। मगर अब वह खुशबू धीरे‑धीरे मिटती जा रही है। जो समुदाय कभी इस पेशे को अपनी जीविका और पहचान मानता था, वह आज संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। मुंगेर जिले के करीब 10,000 की आबादी वाला माली समुदाय पारंपरिक रूप से फूल उगाकर जीवन यापन करता था। शादी‑-विवाह, धार्मिक आयोजन और बाजारों में सजावट के लिए स्थानीय स्तर पर बड़ी मांग रहती थी। लेकिन अब न तो पुराने पैमाने पर उत्पादन बचा है और न ही आर्थिक स्थिरता। जिन खेतों में कभी फूलों की कतारें लहराती थीं, वहां अब अनाज या सब्जियों की खेती दिखाई देती है। फूलों की खेती का रकबा लगातार घटता गया है। वर्तमान में मुंगेर में कुल लगभग 15 एकड़ भूमि पर ही फूलों की खेती बची है। जमालपुर प्रखंड के पूर्वी पाटम पंचायत स्थित मालाकार टोला कभी इसका केंद्र हुआ करता था। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, एक समय यहां 5 से 7 एकड़ में फूलों की खेती होती थी और करीब 30 किसान इससे जुड़े थे। आज यह घटकर 2 से 3 एकड़ रह गया है, जिन पर मुश्किल से 7 से 8 किसान ही सक्रिय हैं। फूल उत्पादक बताते हैं कि लगातार नुकसान और बढ़ती लागत ने कई किसानों को यह पेशा छोड़ने पर मजबूर कर दिया। खर्चों में वृद्धि के बावजूद बाजार में उचित दाम नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ी है। कटाई के बाद फूलों को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। जिले में कोल्ड स्टोरेज की कोई व्यवस्था नहीं है। फूल अत्यधिक नाजुक उत्पाद होते हैं और कटाई के बाद सिर्फ एक या दो दिन तक ताजे रह पाते हैं। अधिकांश फूल हो जाते हैं खराब तापमान नियंत्रित न होने पर अधिकांश फूल खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों को सीधा घाटा होता है। कई बार पूरी फसल बर्बाद हो जाती है क्योंकि बाजार तक पहुंचने से पहले ही फूल मुरझा जाते हैं। फूल उत्पादक महेश माली बताते हैं, “अगर कोल्ड स्टोरेज होता तो हमारी मेहनत सुरक्षित रहती। उत्पादन के बाद बेचने तक काफी नुकसान उठाना पड़ता है।” ऐसी स्थिति में किसान उत्पादन बढ़ाने से कतराते हैं क्योंकि फसल का बड़ा हिस्सा बिकने से पहले ही खराब हो जाता है। मुंगेर में फूलों के लिए कोई संगठित मंडी नहीं है। छोटे पैमाने पर किसान स्थानीय हाट या व्यक्तिगत संपर्कों के जरिये फूल बेचते हैं। मांग स्थिर न होने के कारण कीमतों में भी भारी उतार‑चढ़ाव रहता है। अधिक उत्पादन होने पर बिक्री की गारंटी नहीं रहती, जबकि कम उत्पादन पर पश्चिम बंगाल से आने वाले फूलों पर निर्भरता बढ़ जाती है। किसानों का कहना है कि कृषि विभाग के अधिकारी कभी‑कभार ही गांवों में आते हैं। सब्सिडी की नहीं मिलती जानकारी सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सब्सिडी की जानकारी तक उन्हें नहीं मिलती। नतीजतन, वे खुले बाजार की अस्थिरता पर निर्भर रहते हैं। फूल उत्पादक सुनीता देवी कहती हैं, “सरकारी कागजों में हमारे लिए योजनाएं हैं, पर जमीन पर कोई असर नहीं दिखता। अगर विभाग हमें तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार सहायता दे तो यह पेशा फिर से मजबूत हो सकता है।” स्थानीय स्तर पर फूलों की नर्सरी न होने के कारण किसानों को पौधे पश्चिम बंगाल से मंगाने पड़ते हैं। इससे लागत दोगुनी हो जाती है। उदाहरण के तौर पर, गेंदा फूल के पौधे की कीमत बंगाल में 1000 रुपये प्रति हजार होती है, लेकिन परिवहन और श्रम लागत जोड़कर यह लगभग 2000 रुपये तक पहुंचती है। इसके अलावा परिवहन के दौरान पौधों के खराब होने का खतरा भी बना रहता है। हमारी भी सुनें यहां नर्सरी एवं कोल्ड स्टोरेज के नहीं होने से फूलों की काफी बर्बादी होती है। इससे आय काम हो जाती है। फूलों की खेती में काफी संभावनाएं हैं। -महेश तांती फूलों की खेती के लिए आवश्यक सुविधाओं का नितांत अभाव है। सुविधा मिले तो फूलों की खेती रोजगार परक हो सकती है। जिससे आर्थिक विकास होगा। -बिट्टू कुमार फूलों की खेती के लिए सुविधाओं का होना आवश्यक है संबंधित विभाग एवं उसके अधिकारी की उदासीन बने हुए हैं। - विनोद फूलों की खेती एवं बिक्री में आने वाला समस्याओं के कारण और बहुत कम लोग इसकी खेती कर रहे हैं। सरकार को इन लोगों को मदद करनी चाहिए। - हरीश यादव फूलों की खेती कभी हमारा मुख्य पैसा एवं आजीविका का मुख्य साधन हुआ करता था। लेकिन, अभी यह बहुत अधिक लाभदायक नहीं रह गया है। - फुलेशर यादव यहां नर्सरी एवं कोल्ड स्टोरेज स्थापित किया जाए। फूलों की बर्बादी काफी कम होगी। अधिक खर्च दूसरे राज्यों में जाकर पौधे या फूल खरीदने पड़ते हैं। - राकेश कुमार फूलों की खेती एवं बिक्री में आने वाली समस्याओं के कारण अब बहुत कम लोग इसकी खेती कर रहे हैं। सरकार को इन लोगों को मदद करनी चाहिए। - आशीष मुंगेर में फूलों की नर्सरी नहीं है। इसकी खेती में लागत काफी बढ़ जाती है। फूलों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है। - रोहित मुंगेर में फूलों की नर्सरी होनी चाहिए। नर्सरी नहीं होने की वजह से बाहर से पौधे लाने पर रहे हैं। जिस कारण खर्च अधिक गिर जाती है। - अजय कुमार बंगाल के तरह मुंगेर में भी फूलों की खेती होनी चाहिए। खेती होने से खर्च भी यहां काम आएगा और मुनाफे भी अधिक होंगे। - रवीन कुमार मुंगेर में एक भी कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है। इस करण कटाई के बाद फूलों को सुरक्षित रखना लगभग असंभव हो जाता है। - रंजीत किसानों के बढ़ते खर्च के बावजूद उचित दाम न मिलने से किसान उत्पादन बढ़ने से कतराते हैं। जिले में संगठित फूल मंडी का अभाव भी बड़ी समस्या है। - अनिल कुमार स्थानीय स्तर पर फूलों की नर्सरी ना होने के कारण किसानों को बंगाल से ही पौधे मंगवाने पड़ते हैं। गेंदा फूल के पौधे मंगाने पर परिवहन और अन्य खर्च जोड़कर लागत 2000 हो जाता है। - राजीव सरकार की योजनाओं की जानकारी ना मिलना और कृषि विभाग के अधिकारियों का उन तक न पहुंचना उनकी परेशानी और बढ़ता है। - सुरेश प्रसाद सिंह स्थानीय स्तर पर फूलों की नर्सरी न होने के कारण किसानों को पश्चिम बंगाल से ही पौधा मंगवाना पड़ता है। खासकर पर्व के समय बाहर से गेंदा फूल मंगाकर बेचना पड़ता है। - नरेश महतो गेंदा फूल फूल के पौधों की कीमत लगभग 1000 प्रति हजार है, लेकिन खर्च अधिक बढ़ जाने के कारण यह लागत 2000 रुपये पहुंच जाती है। -उमेश मंडल बोले जिम्मेदार विभाग की ओर से मुंगेर जिले में 50 एकड़ जमीन पर फूलों की खेती के लिए बढ़ावा देने की योजना चलाई जा रही है। इसके तहत फूलों की खेती करने वालों को फूलों के नि:शुल्क पौधे दिए जाते हैं। इच्छुक मालाकार या किसान विभाग से संपर्क कर फूलों के पौधों के लिए आवेदन दे सकते हैं। आवेदन करने के बाद आसानी से उन्हें पौधे दिए जाएंगे। - डॉ सुपर्णा सिन्हा, सहायक निदेशक, उद्यान, मुंगेर शिकायत 1. स्थानीय स्तर पर नर्सरी का अभाव और फूलों के पौधों की अनुपलब्धता। 2. फूल उत्पादक किसानों में रोग और कीट प्रबंधन की जानकारी का अभाव। 3. फूलों की खेती के लिए सिंचाई की आधुनिक तकनीकों का अभाव। 4. उत्पादित फूलों के सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की जिले में व्यवस्था नहीं। 5. फूल किसानों को उचित बाजार नहीं मिलने के साथ-साथ फूलों के मूल्य निर्धारण की भी है समस्या। सुझाव 1. स्थानीय स्तर पर फूलों के पौधों की नर्सरी स्थापित किया जाए। 2. फूलों की खेती करने वालों को सिंचाई के उन्नत साधन उपलब्ध कराया जाए। 3. उत्पादित फूलों के लंबे समय तक संरक्षण के लिए जिले में कोल्ड स्टोरेज की स्थापना हो। 4. किसानों के लिए मंडी की व्यवस्था की जाए। जिले में उत्पादित फूलों को बिक्री के लिए सरकारी संरक्षण मिले। 5. स्थानीय स्तर पर मंडी की व्यवस्था हो ताकि किसानों को उचित दाम मिल सके।

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