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लोकसभा चुनाव 2019 : बिहार में कांग्रेस का सफर आजादी के बाद से अब तक

तिरंगा झंडा के दो बैलों की जोड़ी, चरखा, गाय- बछड़ा और सबसे अंत में हाथ (पंजा) छाप। स्थापना के बाद से अबतक कांग्रेस ने चुनाव चिह्न को लेकर कई प्रयोग किए। अगर कांग्रेस के इन प्रयोगों को चुनावी नजर से देखें तो पहले दो चुनाव के बाद बिहार की जनता ने कभी हाथ को मजबूती से नहीं पकड़ा। हालात ऐसे रहे कि 1984 के बाद से अबतक कांग्रेस बिहार में दहाई का आंकड़ा भी हासिल नहीं कर पायी है।

 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ छाप हुआ। इस चुनाव के बाद 1984 तक बिहार की लगभग शत प्रतिशत सीटें पंजे में समा गईं, लेकिन 1989 के बाद से अबतक किसी लोकसभा चुनाव में अधिकतम पांच सीटें ही कांग्रेस को मिली हैं। वह भी 1998 में। इसके बाद संख्या दो या तीन से ऊपर नहीं हो पायी। कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता व पूर्व विधायक तालिब अंसारी बताते हैं कि चुनाव चिह्न हाथ छाप होने के बाद 1980 में उसी सिम्बल से वह विधानसभा का चुनाव भी जीते थे। इसके बाद भी पार्टी का परफॉरमेंस ठीक रहा। 1989 से बिहार में सीटें कम होने लगीं। 

कब कौन सा चुनाव चिह्न हुआ कांग्रेस का
1885 कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई 
1931  तिरंगा को पहली बार कांग्रेस ने अपना झंडा बनाया 
1952     देश आजाद हुआ तो कांग्रेस का चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी    
1969  एक धड़े को तिरंगे में चरखा तो दूसरे को गाय-बछड़ा सिम्बल मिला 
1977  में हाथ के पंजे को चुनाव चिह्न बनाया

किस साल कांग्रेस के कितने सांसद बिहार में
1952        45
1957        41
1967        34
1971        39
1977        00
1980        30
1984        48
1989        04
1991        01
1996        02
1998        05
1999        04
2004        03
2009        02
2014        02

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  • Web Title:Lok sabha election 2019: know condition of Congress in Bihar till now from independence