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अतीत के झरोखे से: प्रचार के दौरान जिस गांव में होती थी रात, वहीं रुक जाते थे उम्मीदवार  

पूर्व विधायक बहादुर उरांव आज के बेतहाशा चुनावी खर्च से अचंभित हैं। वे अपने जमाने में मात्र आठ हजार रुपये में ही चुनाव जीतकर विधायक बन गये थे।  झारखंड आंदोलनकारी सह झारखंड मुक्ति मोर्चा...

अतीत के झरोखे से: प्रचार के दौरान जिस गांव में होती थी रात, वहीं रुक जाते थे उम्मीदवार  
चक्रधरपुर, जय कुमारMon, 25 Nov 2019 03:44 PM
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पूर्व विधायक बहादुर उरांव आज के बेतहाशा चुनावी खर्च से अचंभित हैं। वे अपने जमाने में मात्र आठ हजार रुपये में ही चुनाव जीतकर विधायक बन गये थे।

 झारखंड आंदोलनकारी सह झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के पूर्व विधायक बहादुर उरांव को यह बात बहुत सताती है कि आज के राजनीति का रंग और ढंग बहुत बदल गया है। नेताओं और वोटरों की पसंद बदल गयी है। अपने बीते दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि 1990 में विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पांच-पांच हजार रुपये उन्हें शैलेन्द्र महतो और उनके मित्र सह एलआईसी एजेंट सीता राम शास्त्री ने दिये थे।
इसमें आठ हजार रुपये खर्च हुए थे और दो हजार रुपये बच भी गये थे। गांवों में चुनाव प्रचार करने जाते थे तो रात होने पर वहीं रुक जाते थे। वहां के स्थानीय लोग ही हमारे लिए और समर्थकों के लिए खाने-रहने का इंतजाम कर देते थे।

 बहादुर उरांव बताते हैं कि उस समय करीब 180 बूथ थे। कुछ बूथ पर करीब 50-50 रुपये खर्च के लिए कार्यकर्ताओं को दिया था। शुरू से ही मजदूरों के हक, अलग झारखंड राज्य और रेलवे में सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन कर आवाज बुलंद की थी। इस कारण लोग मुझे पसंद करने लगे। तब बाहर से चुनाव के दौरान प्रचार करने के लिए कोई नहीं आता था। मेरे मित्र सीता राम शास्त्री, प्रेम कच्छप सहित कई लोगों के साथ मिल कर ही गांव-गांव जाकर चुनाव प्रचार करते थे। साथ ही पार्टी से जुड़े कायकर्ता प्रचार में जुटे रहते थे।

1988 में ब्रिज के लिए किया आंदोलन
पूर्व विधायक बहादुर उरांव ने वर्ष 1988 में चक्रधरपुर रेलवे ओवर क्रॉसिंग पर ब्रिज बनाने के लिए आंदोलन किया था। इसके बाद 1993 में ब्रिज के लिए एक करोड़ 56 लाख रुपये मिले थे। तब काम अधूरा रह गया था, आज वही ब्रिज करीब 33 करोड़ रुपये में बन कर पूरा हुआ है।