
सुल्तानगंज के गंगाजल से सुधरेगी बांका और मुंगेर में पानी की उपलब्धता
विशेषज्ञों की रिपोर्ट बदुआ और खड़गपुर जलाशय की एसआईए रिपोर्ट पर विशेषज्ञों की राय
भागलपुर, मुख्य संवाददाता। सुल्तानगंज के गंगाजल से बांका और मुंगेर में पानी की उपलब्धता सुधरेगी। बांका बदुआ और मुंगेर के खड़गपुर जलाशय की आद्री द्वारा समर्पित सामाजिक आकलन प्रतिवेदन (एसआईए रिपोर्ट) पर विशेषज्ञों ने अपनी राय से जिला प्रशासन को अवगत कराया है। विशेषज्ञों ने मूल्यांकन रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट को खेती, आबादी के हिसाब से यातायात नियंत्रण व जलवायु के लिए सही बताया है। विशेषज्ञों ने मुआवजे के लिए गांवों में शिविर लगाने का सुझाव दिया है। इस प्रोजेक्ट के लिए कमरगंज में 19.07 और गनगनिया में 0.14 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। बता दें कि इस परियोजना का उद्देश्य बाढ़ अवधि में गंगा नदी के अधिशेष जल को पाइपलाइन के जरिए दोनों जलाशयों में पहुंचाना है।

मूल्यांकन रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने बताया कि प्रस्तावित परियोजना में भूमि अधिग्रहण से प्रत्यक्ष प्रभावित सर्वेक्षित रैयतों की संख्या 17 है। इस परियोजना से सार्वजनिक संसाधन जैसे- शिक्षण संस्थान, धार्मिक स्थल, श्मशान, कब्रगाह, चारागाह और खेल का मैदान के लिए आवश्यक भूमि अधिग्रहण से प्रत्यक्ष रूप से कुप्रभावित नहीं हो रहा है। अधिग्रहण योग्य जमीन किसी प्रकार से राज्य और केंद्र सरकार के द्वारा आवंटित भूमि नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया कि सभी रैयतों एवं खेतिहर मजदूरों ने इस बात पर सहमति जताई है कि जल पंप हाऊस और पाइप लाइन के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण से यातायात की भीड़ कम होने से उनका उत्पादक समय बचेगा एवं बुनियादी ढांचा का विकास सुगम होगा। प्रभावित इलाके में जल अवसंरचना में सुधार होगा और प्रभावित बाढ़ जोखिम प्रबंधन से स्थानीय आबादी के लिए आवागमन और सम्पर्क काफी आसान एवं व्यापक होगा तथा इससे आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच संभव हो जायेगा। विशेष रूप से रबी फसल एवं ग्रीष्म ऋतु में सिंचाई जल की उपलब्धता सुनिश्चित होगी, जिससे फसल सघनता और कृषि उत्पादकता में सुधार होगा। परती या वर्षा आधारित भूमि को खेती के अन्तर्गत लाने की क्षमता में वृद्धि होगी। पारंपरिक एकल फसल प्रणाली से फलों एवं दालों जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों में विविधीकरण संभव होगा। जल संकट ग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता में होगा सुधार रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण और अर्द्धशहरी विशेषकर जल संकट ग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार होगा। बेहतर सिंचाई सुविधाओं के साथ इस परियोजना से कृषि अर्थव्यवस्था को बदलने, वर्षा आधारित कृषि निर्भरता कम करने और वर्ष भर खेती को बढ़ावा देने की क्षमता में विस्तार होगा। पुनर्भरण संरचनाओं और तालाबों को एकीकृत किए जाने से स्थानीय भू-जल पुनर्भरण में वृद्धि होगी। गंगा बेसिन का एक भाग बदुआ जलाशय से बाढ़ के पानी को पोषित करने में महत्वपूर्ण अवधियों के दौरान सतत प्रवाह सुनिश्चित करेगा, जिससे सिंचाई और पारिस्थितिकी संतुलन दोनों को सहायता मिलेगी। जलाशय के बफर क्षेत्र के किनारे पौधरोपण से हरित आवरण में वृद्धि होगा, परागणों और छोटे-छोटे जीवों के लिए आश्रय स्थल के रूप में इस परियोजना को काम में लाया जा सकता है। इससे सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों में सुधार होगा, धूल-कणों को कम किया जा सकता है एवं मानसून परिवर्तनशीलता और सूखे के प्रति लचीलापन को मजबूत किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने बिचौलियों से बचने की दी सलाह विशेषज्ञ समूह दल ने सुझाव दिया कि इस परियोजना के क्रियान्वयन में संवेदनशील अबादी (बुजुर्ग, शारीरिक रूप से विकलांग, विधवा या नाबालिक आश्रित) की उपस्थिति को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है, जो मामूली व्यवधानों के प्रति भी अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। मुआवजे के लिए गांवों में शिविर लगाया जाए एवं बिचौलिये को हटाया जाय। अधिकारियों द्वारा आयोजित शिविर में भू-अभिलेखों का सत्यापन कर चेक और बैंक हस्तान्तरण के माध्यम से विधिवत भुगतान किया जाय और गरीब व सीमांत भूमि धारकों को प्राथमिकता देने में मदद की जाय। रैयतों की अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि पर भू-अधिग्रहण अधिनियम 2013 में निहित प्रावधानों के आलोक में ससमय एवं उचित मुआवजा राशि का भुगतान किया जाना चाहिए।

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