
बोले सहरसा : अतिक्रमण से घट रही बांध की चौड़ाई, बढ़ रहा खतरा
गोपाल कृष्ण सलखुआ प्रखंड क्षेत्र में मुख्य कोसी बांध के पास अवैध निर्माण तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है। बांध की जमीन पर कई स्थायी दुकानें बन गई हैं, जिससे सड़क संकरी हो गई है और हादसों की संख्या बढ़ रही है। प्रशासन की लापरवाही से ये निर्माण जारी हैं।
प्रस्तुति : गोपाल कृष्ण

सलखुआ प्रखंड क्षेत्र में मुख्य कोसी बांध की सड़क किनारे तेजी से फैलते अवैध निर्माण स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता का कारण बन गए हैं। उटेशरा कोसी बांध से भेलवा तक बांध की भूमि पर सैकड़ों स्थायी दुकानें खड़ी हो चुकी हैं, जिससे सड़क संकरी होकर आए दिन हादसों का कारण बन रही है। सरकारी नियमों के अनुसार बांध की संरचना के 50 मीटर दायरे में किसी भी स्थायी निर्माण पर प्रतिबंध है, पर यह प्रावधान केवल कागजों में सिमट गया है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक उदासीनता और निरीक्षण की कमी से अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं। कई प्रभावशाली लोगों ने बांध भूमि पर कब्जा कर दुकानें बनाकर किराये पर दे दी हैं। इससे बाढ़ के दौरान विस्थापितों के लिए शरण स्थल समाप्त हो रहे हैं और बांध की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।
सहरसा जिले के सलखुआ प्रखंड क्षेत्र में मुख्य कोसी बांध की सड़क किनारे तेजी से फैलते अवैध निर्माणों ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। उटेशरा से लेकर भेलवा तक बांध की जमीन पर सैकड़ों स्थायी भवननुमा दुकानें खड़ी हो चुकी हैं। इन निर्माणों के चलते बांध किनारे की सड़क अब इतनी संकरी हो गई है कि दो वाहन साथ-साथ नहीं गुजर पाते। हादसों की घटनाएं बढ़ रही हैं, फिर भी प्रशासन की चुप्पी बरकरार है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में अतिक्रमण की रफ्तार काफी बढ़ी है। कई दुकानदारों और प्रभावशाली लोगों ने बांध की जमीन पर कब्जा कर दुकानों का निर्माण कर लिया है। कुछ ने इन दुकानों को ऊंचे किराए पर देकर इसे कमाई का जरिया बना लिया है। वहीं, सड़क पर लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है, जिससे एंबुलेंस और राहत वाहनों की आवाजाही तक बाधित हो जाती है। दुर्घटनाओं का खतरा इतना बढ़ गया है कि कई राहगीर और बाइक सवार पहले ही इन निर्माणों की वजह से चोटिल हो चुके हैं। बावजूद इसके, विभागीय अधिकारी और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बने हुए हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक, किसी भी बांध की संरचना के 50 मीटर दायरे में स्थायी निर्माण प्रतिबंधित है। इसका उद्देश्य है कि बांध को संरचनात्मक क्षति से बचाया जा सके और बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में राहत कार्यों में बाधा न आए। लेकिन सलखुआ क्षेत्र में यह नियम अब केवल कागजों में ही सीमित रह गया है। बांध किनारे कई स्थायी भवन खड़े हो जाने से न केवल संरचनागत खतरा बढ़ गया है, बल्कि बाढ़ की स्थिति में विस्थापित परिवारों के लिए सुरक्षित शरणस्थल भी धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता और निरीक्षण की कमी ने अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। कई बार स्थानीय लोगों ने लिखित शिकायतें और आवेदन देकर निर्माण हटाने की मांग की, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। बांध की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले विभागीय कर्मी भी निरीक्षण के नाम पर मौन हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रभावित इलाकों में न तो सर्वे कराया गया और न ही अतिक्रमण हटाने की ठोस पहल शुरू हुई। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ प्रभावशाली लोग सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाकर बांध की भूमि पर कब्जा कर रहे हैं। इस कारण बांध की मजबूती पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। अगर समय रहते इन अतिक्रमणों को नहीं रोका गया तो कोसी परियोजना की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा और किसी बड़े हादसे से इन्कार नहीं किया जा सकता। बाढ़ के समय जब कोसी नदी उफान पर होती है तो यही बांध लाखों परिवारों के जीवन की सुरक्षा करता है। लेकिन अब उसी बांध की नींव पर खतरा मंडराने लगा है।
प्रशासन की लचर नीतियों के कारण अतिक्रमण
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बांध की जमीन पर अवैध निर्माण केवल प्रशासन की लचर नीतियों के कारण बढ़े हैं। अगर पहले ही सख्त कदम उठाए जाते तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। क्षेत्र के कई हिस्सों में दुकानों और मकानों की इतनी लंबी कतारें बन गई हैं कि सड़क का असली रूप पहचानना मुश्किल हो गया है। जनप्रतिनिधियों पर भी लोगों ने सवाल उठाए हैं कि वे क्षेत्र की इस गंभीर समस्या पर चुप क्यों हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन ने अब भी ध्यान नहीं दिया तो बांध की सुरक्षा संरचना कमजोर पड़ सकती है। इससे न केवल राहत कार्य बाधित होंगे, बल्कि बाढ़ की स्थिति में भारी जनहानि तक की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
हमारी भी सुनें
हर साल बाढ़ के समय कोसी बांध ही हम सबका सबसे सुरक्षित सहारा रहा है। लेकिन अब पक्की दुकानों और भवनों के कारण वह जगह लगातार कम होती जा रही है।
- शिव
सड़क संकरी होने से बच्चों को साथ लेकर निकलना बेहद मुश्किल हो गया है। कई बार शिकायत करने के बावजूद प्रोजेक्ट अधिकारी कोई कदम नहीं उठाते।
- दिलीप
बांध की जमीन पर दुकानें बनाकर लोग खुलेआम किराया वसूल रहे हैं। इससे विस्थापित परिवारों की रहने की पारंपरिक जगह पूरी तरह खत्म हो रही है।
- रामप्रवेश सादा
कोसी बांध ने वर्षों तक बाढ़ में हजारों लोगों की जान बचाई है। आज उसी पर पक्के भवन बनाकर कई लोगों ने कब्जा जमा लिया है।
- अरविन्द बढ़ई
अवैध दुकानों के कारण स्कूल और बाजार जाने का रास्ता बेहद खतरनाक हो गया है। जहां पहले बाढ़ पीड़ित रहते थे, वहां अब किराये की दुकानें चल रही हैं।
- सुजीत यादव
पहले बाढ़ के दौरान पूरा गांव इसी बांध पर सुरक्षित रहता था। अब पक्के भवनों ने उस सुरक्षा स्थल को खत्म कर दिया है। सड़क घुटनभरी हो चुकी है।
- धर्मेन्द्र सादा
संकरी सड़क के कारण जाम लगना और हादसे होना आम बात बन गई है। अवैध दुकानों की कतार बढ़ती जा रही है और कोई रोकने वाला नहीं है।
- अमरजीत सादा
बाढ़ आने पर हमारा पूरा परिवार इसी बांध पर रहता है। अब पक्के मकान बनाकर उन्हें किराये पर दे दिया गया है, जिससे जगह खत्म होती जा रही है।
- रोहित चौधरी
बांध की जमीन पर कब्जा कर दुकानें बनाने की होड़ मची है। मनमाना किराया वसूला जा रहा है और विस्थापितों के लिए कोई जगह नहीं बची।
- हिराकांत भगत
बाढ़ के समय मजदूर परिवार इसी बांध पर बसते हैं, पर अब जगह नहीं मिलती। पक्के भवनों को किराये पर देकर इसे बाजार में बदल दिया गया है।
- पंकज कुमार
अंगनबाड़ी केंद्र तक बच्चों को लाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। बांध की जमीन पर स्थायी निर्माण से विस्थापित परिवारों की जगह खत्म हो गई है।
- विपिन
बाढ़ में स्कूल के सामने बांध ही सबसे भरोसेमंद ठिकाना था। अब वहां दुकानों और भवनों की लंबी लाइनें लगा दी गई हैं। वाहन मोड़ना भी खतरनाक हो गया है।
- पूलेन्द्र सादा
बांध किनारे दुकानें किराये पर देना एक बड़ा अवैध कारोबार बन चुका है। इससे विस्थापितों की पारंपरिक बसने की जगह तेजी से खत्म हो रही है।
- समीर कुमार अपोलो
बाढ़ के समय महिलाएं और परिवार इसी बांध पर रहते थे। अब वहां पक्की दुकानें बनाकर ऊंचे किराये पर दे दी गई हैं। रात में चलना बेहद जोखिमपूर्ण हो गया है।
- निर्मल कुमार सादा
सड़क पर जगह ही नहीं बची, हर मोड़ अब दुर्घटना का कारण बन गया है। किराये की दुकानों ने बांध को आश्रय स्थल से बाजार में बदल दिया है।
- अंजनी सिंह
बोले जिम्मेदार
मामला संज्ञान में है। पूर्व में लोगों को वैकल्पिक जमीन आवंटित की गई थी, लेकिन कई परिवारों ने बांध की भूमि पर ही निर्माण कर लिया। अब डी-आलॉटमेंट प्रक्रिया होगी और उन्हें उपयुक्त स्थान पर बसाया जाएगा। अपर समाहर्ता सुपौल की अध्यक्षता वाली कमेटी जांच कर रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करेगी।
-राजेश कुमार, डिविजनल कमिश्नर, कोसी प्रोजेक्ट
कोसी बांध की जमीन कोसी प्रोजेक्ट विभाग के अधिकार क्षेत्र में है। विभाग से सूचना मिलते ही स्थल निरीक्षण कर अतिक्रमित स्थलों की मापी की जाएगी। विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी।
- पुष्पांजलि कुमारी, सीओ, सलखुआ
शिकायत
1. कोसी बांध पर पक्के भवनों के कारण बाढ़ के समय लोगों को शरण लेने की जगह नहीं मिल पा रही है।
2. बांध किनारे दुकान बनाकर किराये पर देना एक बड़ा धंधा बन चुका है।
3. अतिक्रमण के कारण सड़क इतनी पतली हो गई है कि दो पहिया वाहन भी मुश्किल से निकलते हैं।
4. कोसी प्रोजेक्ट और प्रशासन को कई बार लिखित व मौखिक शिकायत की गई। लेकिन अब तक न तो सर्वे हुआ और न ही अवैध निर्माण पर रोक लगी।
5. हर वर्ष बाढ़ में हजारों लोग बेघर होकर बांध पर आकर रहते हैं। लेकिन अब उसी बांध पर कब्जा होने से सुरक्षित स्थान खत्म होता जा रहा है।
सुझाव
1. बांध की संरचना पर खतरा बढ़ता जा रहा है, जिसे रोकना अत्यंत आवश्यक है।
2. प्रशासन को बाढ़ पीड़ितों के लिए नई शरणस्थली की पहचान करनी चाहिए।
3. स्थायी रूप से पुलिस की मौजूदगी अतिक्रमण पर अंकुश लगा सकती है।
4. संकरी सड़क को चौड़ा किया जाए ताकि दुर्घटनाओं का खतरा कम हो। अभियान चलाकर अवैध कब्जा हटाकर सड़क की स्थिति सुधारी जाए।
5. जो लोग बांध पर पक्का निर्माण कर दुकानें किराये पर दे रहे हैं, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का पालन के लिए दंडात्मक कदम आवश्यक है।

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