बोले भागलपुर: होली के लोकगीत और ढोल, झाल की आवाजें हो रहीं विलुप्त

Feb 27, 2026 12:53 am ISTYogendra Rai हिन्दुस्तान, भागलपुर
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होली भारतीय संस्कृति का प्रमुख त्योहार है, जो प्रेम और एकता का प्रतीक है। लोग उत्साह से होली मनाते थे, पर अब पारंपरिक होली लोकगीत धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। युवा फिल्मी गानों को पसंद करने लगे हैं और सामाजिक समरसता में कमी आ रही है। इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

बोले भागलपुर: होली के लोकगीत और ढोल, झाल की आवाजें हो रहीं विलुप्त

होली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है, जो खुशी, आनंद, प्रेम और एकता का प्रतीक है। लोग होली को उत्साह और उमंग से मनाते हैं। इस पर्व में होली लोकगीत गाने की परंपरा रही है। जो एकजुटता और सामूहिकता को प्रदर्शित करती है। लोग एक जगह जमा होकर ढोलक, झाल और मंजीरा के साथ होली गीत गाते थे। एक माह तक चलने वाली यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। होली में अब ढोल, झाल, मंजीरा और गीत की आवाजें बहुत कम सुनाई देती हैं।

होली को लोग उत्सव के रूप में भी मनाते थे। बसंत पंचमी के दिन से गांवों में होली लोकगीत गाने की परंपरा शुरू हो जाती थी। होली तक लोग समूह में ढोल, झाल और मंजीरा के साथ होली के लोकगीत गाते थे। होली बाद कुछ दिनों तक चैती गीत गाने की परंपरा रही है। होली के दिन लोग टोली बनाकर एक-दूसरे के घरों में जाकर आपसी मतभेदों को भूल गले मिलते थे। इस दिन बच्चे, युवा और बुजुर्ग सब मिलकर होली लोकगीत का आनंद लेते थे। शहर हो या गांव। होली के दिन हर जगह जोगीरा सुनने को मिलता था। लेकिन यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। एकाध जगहों पर ही होली लोकगीत सुनने को मिलता है। वह भी औपचारिता निभाने के स्वरूप में दिख रहा है।

साहित्य सफर के संस्थापक अध्यक्ष जगतराम साह कर्णपूरी ने बताया कि त्योहार हमेशा से जिन्दगी का एक हिस्सा रहा है। इसी त्योहार में एक होली है। होली उत्सव का पर्व है। यह उत्सव लोगों को जोड़ने का काम करता है। सम्पूर्ण भारत में मनाया जाने वाला होली का त्योहार आज भी कुछ परंपरा और रीति रिवाजों को एक साथ संजोये रखा है। परंतु कुछ ऐसी चीजें है जो पीछे छुटती जा रही हैं। इसमें होली का लोकगीत, लोक भजन, झुमरी आदि गीत शामिल है। होली का त्योहार विभिन्न में एकता का संदेश देता है। वह एकता जो भाईचारे, आपसी प्रेम और सद्भाव को स्थापित करते हुए आपसी कटुता और द्वेष को मिटाता है। पारंपरिक होली लोकगीत को सामूहिक रूप से गाने की परंपरा रही है। कभी महीनों भर चलने वाला लोगगीत अपनी परंपरा खो रही है। इसका एक कारण शहर और गांवों में स्थापित टोली का लुप्त होना है। वह टोली जो कभी ढोलक, मंजीरा और झाल के सुर के साथ जमा होती थी और वातावरण होली गीतों से गुलजार हो जाता था। कभी पारंपरिक होली गीत लोगों को जोड़ने, सहेजने और बांधने का तरीका था। वह आज टूटकर बिखरने लगा है। इस परंपरा के खत्म होने के कई कारण हैं।

परिधि के निदेशक उदय ने बताया कि पहले सरस्वती पूजा के दिन से पारंपरिक होली गीत शुरू होता था। होली तक लोग टोली बनाकर होली गीत गाते थे। होली बाद चैता गीत गाया जाता था। होली लोकगीत की परंपरा लगभग विलुप्त हो रही है। इधर राजनैतिक दलों और मीडिया में होली के कार्यक्रम को देखते हुए आम लोगों में कुछ चेतना आई है। होली मनाने के तरीके में भी बदलाव आया है। सभ्रांत लोग बाहर निकलने से बचने लगे हैं। गांवों से पलायन हो रहा है। युवा कमाने के लिए बाहर चले गये हैं। होली लोकगीत विलुप्त होने का यह भी बड़ा कारण है। पहले होली को लेकर युवाओं में जोश देखा जाता था। दूसरे शहरों से होली में लौटकर आने वाले युवाओं में पहले की तरह लोकगीतों में रुचि नहीं रह गई है। युवा फिल्मी गाने और डीजे बजाना पंसद कर रहे हैं। यह सामाजिक एकजुटता और सामूहिकता का त्योहार है। परंपरागत लोगगीत को बढ़ावा मिलना चाहिए। इससे समाज में अच्छा संदेश जाता है।

गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष प्रकाश चन्द्र गुप्ता ने कहा कि पहले होली के दिन लोग टीम बनाकर ढोल, मंजीरा और झाल बजाते हुए घर-घर जाकर गले मिलते थे। जब तक लोग घर से नहीं निकलते थे। टोली वहीं खड़ी रहती थी। इसका मकसद लोगों के बीच प्रेम का संदेश देने का था। लोग मस्ती में टोली बनाकर लोकगीत गाते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा समाप्त हो रही है। होली लोकगीत की जगह डीजे और अश्लील गाने बजने लगे हैं। इस त्योहार को सभी जाति और धर्म के लोग मिलकर मनाते थे। भाईचारा, मस्ती और उमंग का पर्व माना जाता था।

अधिवक्ता निरंजन कुमार सिन्हा ने बताया कि होली का परंपरागत लोकगीत का चलन घटता जा रहा है। फिल्मी गीतों का चलन बढ़ गया है। गांव और शहरों में युवा कम रह रहे हैं। इसका असर भी पड़ रहा है। चैती दुर्गापूजा समिति मोहनपुर नरगा के सचिव जवाहर लाल मंडल ने बताया कि होली गीत की परंपरा खत्म हो रही है। होली में डीजे हावी हो गया है। पहले बसंत पंचमी से होली तक लोग टोली बनाकर होली लोकगीत गाते थे। गांव और शहर के मोहल्लों में ढोल, झाल और मंजीरा की आवाज सुनाई देती थी। गीत सुनने के लिए लोगों की भीड़ जमा होती थी।

अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं लोग

डॉ. संतोष कुमार ठाकुर ने बताया कि होली लोकगीत गाने की परंपरा अब खत्म होती जा रही है। लोग इस परंपरा को अब ढो रहे हैं। लोग गीतों में पहले सौहार्द और भाईचारा का भाव झलकता था। वर्तमान में होली गीत का स्वरूप विकृत हो रहा है। ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, जिसे सुनने में तकलीफ होती है। लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। लगता है जैसे लोगों के पास समय नहीं है। सामाजिक सौहार्द में कमी आ रही है। लोग दूसरों से मिलना नहीं चाहते हैं। अजय कुमार यादव ने बताया कि पहले एक महीना तक लोगों में उमंग, उत्साह और प्रेम की भावना होती थी। टोली बनाकर लोग गीत गाते थे। गीत में प्रेम और सामाजिक समरसता रहता था। अब भाईचारे में कमी आ रही है। युवा परंपरागत गीतों से दूर हो रहे हैं। फुहड़ गीतों की भरमार हो रही है। परंपरागत गीतों को बढ़ावा मिलना चाहिए।

रंग और गुलाल के त्योहार को उत्साह से मनायें : डीएम

समस्त भागलपुरवासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। सभी से आग्रह है कि रंग एवं गुलाल के त्योहार को पूरे उत्साह के साथ मनायें। होली सामाजिक एकता और प्रेम का प्रतीक है। कोई ऐसा काम नहीं करें जो दूसरे को बुरा लगे। सरकार ने बिहार में शराबंदी लागू की है। ऐसी स्थिति में किसी के बहकावे में नहीं आएं। अपनी सांस्कृतिक धरोहर खासकर परंपरागत लोकगीत को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। होली में शांति और आपसी सौहार्द बनाये रखें। जिला प्रशासन आपके साथ है।

-डॉ. नवल किशोर चौधरी, जिलाधिकारी, भागलपुर

बातचीत

होली का त्योहार अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले बसंत पंचमी से ही फागुन गीतों की शुरुआत हो जाती थी। लोग एक महीने पहले से तैयारी में जुट जाते थे। अब फूहड़ गानों के कारण लोकगीतों की परंपरा समाप्त होती जा रही है।

-जगतराम साह कर्णपुरी

होली आपसी प्रेम और भाईचारे का पर्व है, लेकिन वर्तमान समय में इसका स्वरूप बदलता जा रहा है। पहले लोग बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे को रंग लगाते थे। आज लोगों में सामाजिक दूरी बढ़ती जा रही है।

-निरंजन कुमार सिन्हा

फागुन गीतों में प्रकृति, प्रेम और सामाजिक एकता की झलक मिलती है। आज उन गीतों की जगह अश्लील और फूहड़ गानों ने ले ली है। सांस्कृतिक मंच तैयार कर बुजुर्गों से पुराने गीतों को संरक्षित किया जाना चाहिए।

-अनूप लाल मंडल

पहले होली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता था। अब वह परंपरा लगभग समाप्त होती जा रही है। समाज के सभी वर्गों को मिलकर पारंपरिक होली को पुनर्जीवित करने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

-धनु मंडल

होली में पहले सामाजिक समरसता दिखाई देती थी। अमीर-गरीब, जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं होता था। लोग एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते थे। अब यह त्योहार केवल औपचारिकता बनकर रह गया है।

-जवाहर लाल मंडल

होली भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। पहले फागुन गीतों में प्रकृति और मानवीय संबंधों की गहराई झलकती थी। अब आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोक संस्कृति दबती जा रही है। होली को संरक्षित करने की आवश्यकता है।

-डॉ संतोष ठाकुर ‘अनमोल’

बसंत पंचमी से ही होली की तैयारी शुरू हो जाती थी। गांव की चौपालों पर प्रतिदिन गीत-गायन होता था। अब वैसा कुछ नहीं दिखता है। समय रहते प्रयास नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी इन परंपराओं से अनभिज्ञ रह जाएगी।

-गंगा प्रसाद मंडल

होली का मूल स्वरूप सामाजिक एकता और प्रेम पर आधारित था। पहले लोग बिना किसी झिझक के रंग खेलते थे और आपसी मतभेद भुला देते थे। वर्तमान में इसका स्वरूप बदल रहा है। परंपराओं को जीवंत करने की जरूरत है।

-जोगिंदर मंडल

पहले होली के अवसर पर गांवों में ढोल-झाल और मंजीरे की थाप से वातावरण गूंज उठता था। अब डीजे और फूहड़ गीतों से त्योहार की मर्यादा प्रभावित हो रही है। लोकगीतों को संरक्षित करने की आवश्यकता है।

-जय प्रकाश साह

होली का पर्व हमेशा से आपसी सद्भाव का प्रतीक रहा है। पहले लोग होली के बहाने रिश्तों को मजबूत करते थे। आजकल होली का त्योहार सीमित दायरे में सिमटता जा रहा है। बुजुर्गों को युवाओं को परंपराओं से परिचित कराने की जरूरत है।

-कारू मंडल

पहले फागुन के गीतों में प्रकृति और प्रेम का अद्भुत समन्वय सुनने को मिलता था। आज वे गीत बहुत ही कम सुनाई देते हैं। होली की इस सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने की जरूरत है।

-पूरण साह

पहले होली के अवसर पर पूरे गांव एवं शहर में उत्साह और उमंग का माहौल रहता था। लेकिन अब त्योहार का स्वरूप बदलता जा रहा है। सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए युवाओं को आगे आने की जरूरत है।

-चंद्र मिश्र मंडल

आज के युवा पीढ़ी को पारंपरिक रीति-रिवाजों से जोड़ने की जरूरत है। गांव और शहरों में सांस्कृतिक मंच तैयार किए जाएं तो पुरानी होली की झलक दिखाई दे सकती है। अब होली का तौर-तरीका बदल रहा है।

-पिंटू कुमार

पहले होली में सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश मिलता था। अब कई स्थानों पर त्योहार का स्वरूप केवल औपचारिक रह गया है। हमें फूहड़ता से बचते हुए पारंपरिक गीत-संगीत को बढ़ावा देना चाहिए।

-भावेश कुमार

होली के पांच दिनों तक चलने वाली परंपराएं अब समाप्त हो चुकी हैं। पहले लोग मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे के घर जाते थे। आज के युवाओं को पहल कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए।

-शिव शंकर मंडल

होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि धार्मिक एवं सांस्कृतिक रीति-रिवाज का पर्व है। पहले फागुन गीतों की मधुरता पूरे वातावरण को आनंदित कर देती थी। आज आवश्यकता है इन परंपराओं से युवा पीढ़ी को जोड़ने की।

-अजय कुमार यादव

होली के त्योहार में क्या बदलाव आएं हैं

1. पहले होली की पहचान फगुआ लोकगीतों से होती थी। जिनमें प्रेम, सामाजिक समरसता की झलक देखने को मिलती थी, अब फूहड़ गीतों से यह विलुप्त होती जा रही है।

2. पहले शहर और गांव के चौपालों में डोल-झाल, मंजीरा और ढोलक की थाप पर सामूहिक गायन की परंपरा सामाजिक एकता का प्रतीक हुआ करती थी।

3. पहले होली में जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति का भेद मिटाकर लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर या उनके घर जाकर रंग-गुलाल लगाते और बधाई देते थे।

4. पहले बसंत पंचमी से लेकर होली के पांच दिनों बाद तक परंपराएं निभाई जाती थीं, जिनमें सामूहिक भोजन और गीत-संगीत शामिल होता था।

5. होली पहले रिश्तों की मरम्मत और मनमुटाव समाप्त करने का अवसर मानी जाती थी, जिसमें गीतों और रंगों के माध्यम से जुड़ाव होता था।

सुझाव

1. इस व्यस्त भरी जिंदगी से गांव और शहरों में लोगों को सामूहिक फाग संध्या का आयोजन करना चाहिए। बुजुर्गों के गाये गीत को संरक्षित करने की पहल होनी चाहिए।

2. स्थानीय स्तर पर होली में सामुदायिक मंचों को तैयार किया जाना चाहिए, जहां त्योहारों पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ गीत-संगीत का कार्यक्रम आयोजित हो।

3. मोहल्लों और पंचायत स्तर पर सामूहिक होली मिलन समारोह आयोजित किए जाने चाहिए, जहां सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।

4. समाज को चाहिए कि पारंपरिक कार्यक्रमों को पुनः स्थापित किया जाए। जहां परिवारों में एक-दूसरे को सब कुछ भुलाकर मिलकर पर्व मनाने की जरूरत है।

5. त्योहारों में सादगी, संवाद और आत्मीय मिलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इस दौरान भोजपुरी व फूहड़ गीतों पर पूरी तरह प्रतिबंध होना चाहिए।

प्रस्तुति: वीरेन्द्र कुमार, संतोष कुमार, फोटोग्राफ: कान्तेश

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