बोले पूर्णिया : होलिका की ज्वाला में सिमट रही परंपरा,फगुआ के सुर हुए गायब

Mar 01, 2026 01:24 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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-प्रस्तुति : अमित कुमार रजनीश होली रंगों और उल्लास का ऐसा पर्व है, जो

बोले पूर्णिया : होलिका की ज्वाला में सिमट रही परंपरा,फगुआ के सुर हुए गायब

-प्रस्तुति : अमित कुमार रजनीश होली रंगों और उल्लास का ऐसा पर्व है, जो हर वर्ष फाल्गुन मास में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल, समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है। इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान होलिका दहन है, जिसे असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। किंतु आधुनिकता की तेज रफ्तार, बदलती जीवनशैली और शहरी व्यस्तताओं के बीच होलिका दहन की पारंपरिक चमक अब फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। महानगरों और कस्बों में होलिका दहन अब एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर रह गया है। पहले जहां मोहल्लों में लोग कई दिन पहले से लकड़ियां, उपले और अन्य सामग्री इकट्ठा करने में जुट जाते थे, वहीं अब तैयार लकड़ी खरीदकर औपचारिक रूप से दहन कर दिया जाता है।

सामूहिक श्रम और उत्साह की वह भावना, जो लोगों को जोड़ती थी, अब कम होती जा रही है। न तो पहले जैसा सामूहिक उल्लास दिखाई देता है और न ही लोकगीतों की वह गूंज सुनाई देती है, जो पूरे वातावरण को जीवंत बना देती थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने लोगों को घरों के भीतर सीमित कर दिया है। पहले होली का इंतजार महीनों पहले से शुरू हो जाता था। गांव-गांव में सरस्वती पूजा के बाद से ही फगुआ की धुन सुनाई देने लगती थी। रात में चौपाल सजती थी, ढोल-नगाड़े बजते थे और सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली जैसे लोकगीत दूर-दूर तक गूंजते थे। जोगीरा, फगुआ और पारंपरिक कविताओं की धूम रहती थी। लोग तीन दिनों तक दिन-रात एक कर एक-दूसरे के घर जाकर गीत गाते और रंग-गुलाल खेलते थे। समय के साथ होली गीत गाने वाली टोलियों की संख्या में भारी कमी आई है। पहले जहां हर गांव में कई टोलियां हुआ करती थीं, वहीं अब गिने-चुने गांवों में ही यह परंपरा बची है। युवा पीढ़ी का रुझान आधुनिक संगीत और डीजे की ओर अधिक हो गया है। पारंपरिक लोकधुनों की जगह तेज ध्वनि वाले गीतों ने ले ली है। गांवों में आज भी लोग सामूहिक रूप से लकड़ियां इकट्ठी करते हैं, ढोलक-मंजीरा बजाते हैं और फाग गीत गाते हुए उत्सव मनाते हैं। कई गांवों में जोगीरा की टोली घर-घर जाकर गीत गाती है, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि स्वाद का भी पर्व है। दही-बड़ा, पुआ, पकवान और गुजिया जैसे व्यंजन इस त्योहार की पहचान रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़े चाव से ये पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। परिवार और पड़ोस मिलकर एक-दूसरे को खिलाते-पिलाते हैं। लेकिन शहरों में बाजार से तैयार मिठाइयां खरीदने का चलन बढ़ गया है। घर में सामूहिक रूप से पकवान बनाने की परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।होलिका दहन का धार्मिक और सामाजिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह पर्व सिखाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य की विजय होती है। साथ ही यह गिले-शिकवे भुलाकर भाईचारे को मजबूत करने का अवसर देता है। पहले लोग पूरे मोहल्ले या गांव के साथ मिलकर त्योहार मनाते थे, लेकिन आज अधिकांश लोग अपने परिवार और सीमित रिश्तेदारों तक ही उत्सव सीमित कर रहे हैं। सामूहिकता की वह भावना, जो भारतीय संस्कृति की पहचान रही है, धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।ग्रामीण इलाकों में भी आधुनिकता का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। होली गीत प्रतियोगिताएं जोगीरा कार्यक्रम कराएं समाज के बुजुर्गों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि स्कूलों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों को मिलकर पारंपरिक होली गीत प्रतियोगिताएं, जोगीरा कार्यक्रम और सामूहिक होलिका दहन जैसे आयोजन करने चाहिए। इससे युवाओं में सांस्कृतिक रुचि बढ़ेगी और परंपराएं सुरक्षित रह सकेंगी। होलिका दहन केवल लकड़ी जलाने की रस्म नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। समय की मांग है कि आधुनिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि होली का यह पावन पर्व आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतना ही जीवंत और अर्थपूर्ण बना रहे। शिकायत 1. शहरों और गांवों में होलिका दहन की परंपरा अब केवल औपचारिकता बनकर रह गई है, सामूहिक उत्साह व पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन पहले जैसा नहीं दिखता। 2. युवाओं में पारंपरिक फगुआ,जोगीरा व लोकगीतों के प्रति रुचि घटती जा रही है, उनकी जगह तेज डीजे और आधुनिक संगीत ने ले ली है, जिससे पहचान कमजोर पड़ रही है। 3. मोहल्लों में पहले की तरह तैयारी व आपसी सहयोग नहीं दिखता, लोग व्यक्तिगत रूप से कार्यक्रम करते हैं, जिससे एकता व भाईचारे की भावना कमजोर होती जा रही है। 4. घरों में पारंपरिक पकवान बनाने की परंपरा कम हो रही है, बाजार की तैयार मिठाइयों व रंगों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे घरेलू संस्कृति और आत्मीयता में कमी आई है। 5. ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन और व्यस्त जीवनशैली के कारण सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी घट रही है, नई पीढ़ी अपने लोक पर्वों के महत्व को समझ नहीं पा रही है। सुझाव 1. स्कूलों, पंचायतों व सामाजिक संगठनों के स्तर पर पारंपरिक होली गीत, फगुआ व जोगीरा प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं,इससे नई पीढ़ी में भावना जीवित रहेगी। 2. सामूहिक होलिका दहन की तैयारी में मोहल्लों व गांवों के लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, सामाजिक एकता की परंपरा को मजबूत बनाया जा सके। 3. लोक कलाकारों, ढोलक वादकों और पारंपरिक गायकों को मंच व आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, ताकि वे उत्साह के साथ अपनी कला प्रस्तुत कर सकें । 4. घरों में पारंपरिक पकवान बनाने व बांटने की परंपरा को बढ़ावा दिया जाए, जिससे पारिवारिक आत्मीयता, मेलजोल व त्योहार की घरेलू खुशियां सजीव हो सकें। 5. अभियान चलाकर युवाओं को समझाया जाए कि त्योहार केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार भी हैं। हमारी भी सुनें : ------------- 1. होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। पहले गांवों में लोग मिलकर लकड़ियां जुटाते थे, सामूहिक पूजा करते थे और पूरी रात फगुआ गाते थे। आज शहरी जीवन की व्यस्तता और आधुनिक साधनों ने इस परंपरा को प्रभावित किया है। यदि समाज सजग नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियां इस सामूहिक उल्लास से वंचित रह जाएंगी। -शंकर झा 2. ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी होली की असली झलक देखने को मिलती है, जहां ढोलक-मंजीरा की थाप पर जोगीरा गूंजता है। हालांकि पहले जैसी भीड़ और उत्साह नहीं दिखता। युवाओं का पलायन और बदलती जीवनशैली इसका बड़ा कारण है। फिर भी बुजुर्गों की पहल से कई गांवों में परंपरा को जीवित रखने का प्रयास जारी है। -ब्रज किशोर भारती 3. दस-बीस वर्ष पहले तक होली का इंतजार महीनों पहले से शुरू हो जाता था। सरस्वती पूजा के बाद चौपालों पर फगुआ की महफिल सजती थी। आज मोबाइल और डीजे संस्कृति ने लोकगीतों की जगह ले ली है। इससे पारंपरिक जोगीरा और देशी होली गीत गाने वालों की संख्या घटती जा रही है। -केशव कुमार मंडल 4. होली के दिन गांवों में दिन-रात ढोल-नगाड़े बजते थे। टोली घर-घर जाकर गीत गाती थी और लोग उनका स्वागत करते थे। अब यह परंपरा कहीं-कहीं ही दिखाई देती है। सामूहिकता का भाव कम होने से त्योहार का मूल स्वरूप बदल रहा है। -पंकज कुमार सिंह 5. धुरखेल होली का खास आकर्षण हुआ करता था। मेहमान, दामाद और कुटुंब के साथ हंसी-ठिठोली होती थी। कभी-कभी कठिनाई भी होती थी, पर सब आनंद का हिस्सा माना जाता था। आज यह परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। -अजय कांत झा 6. होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने का अवसर है। पहले “पहुना” का इंतजार पूरे गांव को रहता था। मेहमानों की जमकर खातिरदारी होती थी। आज लोग सीमित दायरे में त्योहार मनाने लगे हैं। -सुभाष चन्द्र मिश्र 7. दही-बड़ा, पुआ और अन्य पकवान होली की पहचान हैं। पहले घर-घर में महिलाएं मिलकर पकवान बनाती थीं। अब बाजार से मिठाई खरीदने का चलन बढ़ गया है। इससे पारंपरिक व्यंजनों की आत्मीयता कम हो रही है। -संतोष मिश्रा 8. होलिका दहन असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देता है। समाज को चाहिए कि इस प्रतीकात्मक महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाए। केवल औपचारिकता निभाने से परंपरा जीवित नहीं रह सकती। -मनीष जैन 9. ग्रामीण इलाकों में अभी भी कई स्थानों पर लोग उत्साह के साथ लकड़ी इकट्ठा कर सामूहिक होलिका दहन करते हैं। यह पहल सराहनीय है और इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। -पवन कुमार राय 10. जोगीरा और फगुआ की परंपरा लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इसे बचाने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन जरूरी है, ताकि युवा पीढ़ी इससे जुड़ सके। -सानु जायसवाल 11. आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन अपनी जड़ों से कट जाना उचित नहीं। होली जैसे पर्व हमें सामूहिकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाते हैं। इन मूल्यों को जीवित रखना समाज की जिम्मेदारी है। -पप्पू गिरी 12. शहरों में अपार्टमेंट संस्कृति के कारण सामूहिक आयोजन कम हो गए हैं। लोग अपने-अपने फ्लैट तक सीमित हो गए हैं। इससे होलिका दहन की सार्वजनिक रौनक प्रभावित हुई है। -हिमकर मिश्र 13. यदि पंचायत और सामाजिक संगठन मिलकर पारंपरिक होली आयोजन करें तो युवाओं की भागीदारी बढ़ सकती है। इससे लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को नया जीवन मिलेगा। -राजकिशोर 14. समय की मांग है कि हम आधुनिक जीवन के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखें। होली की असली पहचान सामूहिक उल्लास, गीत-संगीत और आपसी प्रेम में है, जिसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। -शैलेन्द्र मंडल ---------- -बोले जिम्मेदार : ---------- -विलुप्त हो रहे कला व संस्कृति को आगे लाने की जरूरत : ------------ -होली जैसे पर्व में जोगीरा और फगुआ गीत की परंपरा अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। गांव-घर में भी पहले की अपेक्षा कम दिखने को मिलती है। पहले होली के एक सप्ताह पहले से गांव में जोगिरा होली की गीत गूंजती थी जो अब कम दिखती है। इसे आगे बढ़ाने और संवारने की जरूरत है। इस दिशा में सरकार की ओर से लोक कला और लोक गीत को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे गांव घर के कलाकारों को भी आने वाले दिनों में लाभ मिलेगा। -पंकज कुमार पटेल, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, पूर्णिया।

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