बोले कटिहार : बाजार में बढ़ी मिलावटी रंगों की भरमार से हो सकती है परेशानी

Mar 03, 2026 12:55 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
share Share
Follow Us on

होली के दौरान सस्ते और मिलावटी रंगों के कारण स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है। इन रंगों में हानिकारक रसायन होते हैं, जो त्वचा और आंखों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हर्बल रंगों का उपयोग करना और सावधानी बरतना आवश्यक है।

बोले कटिहार : बाजार में बढ़ी मिलावटी रंगों की भरमार से हो सकती है परेशानी

प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप होली की आहट के साथ ही शहर से लेकर गांव तक के बाजार रंग-बिरंगे नजर आने लगे हैं। फुटपाथों पर सजे अस्थायी स्टॉल हों या बड़ी दुकानों की चमचमाती शेल्फ-हर जगह अबीर, गुलाल और रंगों की बहार है। कम कीमत का लालच ग्राहकों को अपनी ओर खींच रहा है। बच्चे मुट्ठी भर रंग को हवा में उड़ाकर खुश हो रहे हैं, लेकिन इसी रंगीन उत्साह के पीछे एक अदृश्य खतरा भी तेजी से पांव पसार रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो अत्यधिक सस्ते और बिना ब्रांड वाले रंगों में मिलावट की आशंका सबसे अधिक होती है।

कई नकली रंगों में सीसा, क्रोमियम, बारीक कांच पाउडर और कृत्रिम डाई जैसे हानिकारक रसायन मिलाए जाते हैं। ये तत्व त्वचा की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचाते हैं और एलर्जी, जलन, खुजली, लाल चकत्ते तथा संक्रमण जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। कटिहार के चर्म रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि होली के बाद उनके क्लिनिक में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। खासकर बच्चों और संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को ज्यादा परेशानी होती है। केवल त्वचा ही नहीं, आंखों के लिए भी ये रंग खतरनाक साबित हो सकते हैं। कई बार रंग खेलने के दौरान गुलाल या गीला रंग आंखों में चला जाता है। यदि उसमें तेज रसायन मिला हो तो जलन, लालिमा और दृष्टि पर असर तक पड़ सकता है। डॉक्टरों की सलाह है कि आंख में रंग जाने पर तुरंत साफ पानी से अच्छी तरह धोएं और यदि जलन बनी रहे तो बिना देर किए चिकित्सक से संपर्क करें। श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए भी मिलावटी रंग बड़ी परेशानी बन सकते हैं। हवा में उड़ते बारीक रासायनिक कण सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। अस्थमा या एलर्जी के मरीजों को खांसी, गले में जलन और सांस लेने में तकलीफ जैसी शिकायतें हो सकती हैं। चिकित्सकों का कहना है कि त्योहार की खुशी किसी की सेहत पर भारी नहीं पड़नी चाहिए। पर्यावरण पर भी इन रंगों का असर कम नहीं है। होली के बाद बड़ी मात्रा में रंग नालियों और जलाशयों में पहुंचते हैं। रासायनिक तत्व पानी को दूषित करते हैं और जलीय जीवों के लिए खतरा बनते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ी है। सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से बाजारों में छापेमारी अभियान चलाने की मांग की है। उनका कहना है कि खाद्य एवं औषधि विभाग और नगर प्रशासन को संयुक्त रूप से कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि मिलावटी और नकली रंगों की बिक्री पर रोक लग सके। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल सरकारी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। उपभोक्ताओं को भी सजग बनना होगा। डॉक्टर और पर्यावरणविद हर्बल व प्राकृतिक रंगों के उपयोग की सलाह दे रहे हैं। घर पर भी पलाश के फूल, हल्दी, चंदन और चुकंदर जैसे प्राकृतिक स्रोतों से सुरक्षित रंग तैयार किए जा सकते हैं। बाजार से रंग खरीदते समय पैकेजिंग, लेबल और प्रमाणित ब्रांड की जांच अवश्य करें। बिना लेबल और अत्यधिक सस्ते रंगों से दूरी बनाना ही समझदारी है। होली खेलने से पहले त्वचा पर सरसों या नारियल तेल लगाने से रंग का असर कम होता है। आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मा और बालों की सुरक्षा के लिए तेल का उपयोग फायदेमंद हो सकता है। बच्चों को विशेष रूप से समझाना जरूरी है कि अज्ञात स्रोत से खरीदे गए रंगों का इस्तेमाल न करें।रंगों का त्योहार प्रेम, उल्लास और आपसी भाईचारे का प्रतीक है। इसे लापरवाही और मिलावट की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिए। जब रंग बन जाए जख्म: होली के बाद अस्पतालों की बढ़ती कतार कटिहार। कटिहार में हर साल होली के बाद अस्पतालों और निजी क्लिनिकों में मरीजों की भीड़ अचानक बढ़ जाती है। त्वचा पर लाल चकत्ते, खुजली, जलन और आंखों में तेज दर्द की शिकायत लेकर बच्चे, युवा और बुजुर्ग पहुंचते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि सस्ते और मिलावटी रंग इस परेशानी की बड़ी वजह हैं। जिन रंगों में रासायनिक तत्व मिलाए जाते हैं, वे त्वचा की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचाते हैं और संक्रमण का खतरा बढ़ा देते हैं। कई अभिभावक बताते हैं कि त्योहार की खुशी उस वक्त चिंता में बदल जाती है, जब बच्चों के चेहरे पर दाने या सूजन दिखने लगती है। आंखों में रंग जाने से जलन और धुंधलापन की शिकायत भी आम है। विशेषज्ञों की मानें तो थोड़ी सी सावधानी बड़ी परेशानी से बचा सकती है। प्रमाणित और हर्बल रंगों का उपयोग, त्वचा पर तेल लगाना और आंखों की सुरक्षा जैसे छोटे कदम बेहद जरूरी हैं। होली का असली रंग मुस्कान है, अस्पताल की पर्ची नहीं। जरूरत है कि उत्साह के साथ सतर्कता भी अपनाई जाए, ताकि त्योहार के बाद इलाज की नहीं, यादों की चर्चा हो। शिकायत 1. बाजार में बिना ब्रांड और संदिग्ध रंग खुलेआम बिक रहे हैं। इन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन की ओर से पर्याप्त निगरानी नजर नहीं आती है। 2. कई दुकानदार बेहद सस्ते दाम का लालच देकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। गुणवत्ता की जांच के बिना बिक्री से लोगों की सेहत खतरे में पड़ रही है। 3. होली के बाद अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। इसके बावजूद मिलावटी रंगों की बिक्री पर ठोस नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। फिर भी सुनवाई नहीं हो रही है। 4. फुटपाथ और अस्थायी दुकानों पर बिकने वाले रंगों की जांच शायद ही कभी होती है। प्रशासनिक कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। 5. पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले रासायनिक रंगों पर सख्ती नहीं दिखती। नालियों और जलाशयों में प्रदूषण बढ़ने के बावजूद ठोस कदम कम नजर आते हैं। सुझाव 1. होली खेलने से पहले त्वचा और बालों में सरसों या नारियल तेल जरूर लगाएं। इससे रंग सीधे त्वचा में समाने से काफी हद तक बचाव होता है। 2. केवल प्रमाणित और पैकिंग वाले हर्बल रंग ही खरीदें। बिना लेबल और अत्यधिक सस्ते रंगों से दूरी बनाए रखें। प्रशासन को भी इस पर कार्रवाई की जाए। 3. बच्चों को समझाएं कि अज्ञात स्रोत से खरीदे गए रंगों का उपयोग न करें। स्कूलों में भी सुरक्षित होली को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाए। 4. आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मे का इस्तेमाल करें और रंग सीधे चेहरे पर न डालें। अगर रंग आंख में चला जाए तो तुरंत साफ पानी से धोएं। 5. प्रशासन नियमित रूप से बाजारों में जांच अभियान चलाए। मिलावटी रंग बेचने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। ताकि लोगों का नुकसान नहीं हो सके। हमारी भी सुनें : होली खुशियों का त्योहार है, लेकिन सस्ते रंगों के कारण हर साल बच्चों की त्वचा पर जलन और चकत्ते देखती हूं तो डर लगता है। प्रशासन को जांच करनी चाहिए। - संजू देवी रंग खरीदते समय लोग कीमत देखते हैं, गुणवत्ता नहीं। पिछले साल मेरे बेटे की आंख में रंग चला गया था, काफी परेशानी हुई। तब समझ आया कि सस्ता रंग महंगा पड़ता है। - राजू कुमार मिलावटी गुलाल से सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाती है। त्योहार की खुशी सबके लिए है, इसलिए लोगों को ऐसे रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए जो किसी की सेहत खराब न करें।- मिथिलेश कुमार गांव में फुटपाथ पर बिकने वाले रंग ज्यादा बिकते हैं क्योंकि वे सस्ते होते हैं। बच्चों की त्वचा बहुत नाजुक होती है। अभिभावकों को सतर्क रहना चाहिए। - राम कुमार होली पर हम उत्साह में सब भूल जाते हैं, लेकिन त्वचा और बालों को होने वाला नुकसान बाद में परेशान करता है। इस बार मैं घर पर ही हल्दी और चुकंदर से रंग बनाने की सोच रही हूं।- प्रियंका देवी त्योहार का मतलब सेहत से समझौता नहीं होना चाहिए। मैं सिर्फ हर्बल गुलाल का ही इस्तेमाल करती हूं। थोड़ी कीमत ज्यादा है, लेकिन मन शांत रहता है कि किसी को नुकसान नहीं होगा।- साजन देवी होली के बाद अक्सर लोगों को त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास जाना पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि अनजान लोगों से रंग न लें और आंखों की सुरक्षा का ध्यान रखें। - मौसमात देवी नालियों और तालाबों का पानी दूषित हो जाता है। त्योहार मनाने का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे प्रकृति को नुकसान न पहुंचे। प्राकृतिक रंगों को बढ़ावा देना समय की मांग है।- ज्योति भगत बाजार में आकर्षक पैकिंग देखकर बच्चे जिद करते हैं, लेकिन हमें समझदारी दिखानी होगी। लेबल पढ़कर, प्रमाणित उत्पाद ही खरीदना चाहिए। थोड़ी सावधानी बड़े खतरे से बचा सकती है।- सरिता कुमारी होली में मिलावटी रंग रिश्तों में कड़वाहट घोल सकते हैं जब कोई बीमार पड़ जाए। मैं चाहती हूं कि लोग एक-दूसरे को सुरक्षित रंग से ही रंगें। खुशी तभी पूरी होगी जब सब स्वस्थ रहेंगे।- कंचन देवी धूल और गंदगी भी उसमें मिल जाती है। ऐसे रंग त्वचा के साथ-साथ आंखों के लिए भी खतरनाक हैं। प्रशासन को नियमित निरीक्षण करना चाहिए और लोगों को भी सजग रहना चाहिए।- मोनिका कुमारी होली खेलने से पहले त्वचा पर तेल लगाना और आंखों को बचाना जरूरी है। मैंने तय किया है कि इस बार केवल भरोसेमंद दुकान से ही गुलाल खरीदूंगी और दूसरों को भी यही सलाह दूंगी।- साक्षी कुमारी सस्ते और तेज रंगों की होड़ में हम अपनी सेहत भूल जाते हैं। बेहतर है कि कम रंगों से, लेकिन सुरक्षित तरीके से होली खेली जाए। जागरूक समाज ही स्वस्थ समाज बन सकता है।- ब्रातत्त्व दत्ता पिछले साल मेरी बहन को त्वचा संक्रमण हुआ था। तब से हम केवल प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं। हर परिवार पहले सुरक्षा को प्राथमिकता दे, फिर उत्सव मनाए।- रूबी कुमारी बोले जिम्मेदार होली में मिलावटी और रासायनिक रंग स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। हर वर्ष होली के बाद त्वचा, आंख और श्वसन संबंधी शिकायतों के मामले बढ़ जाते हैं। लोगों से अपील है कि केवल प्रमाणित एवं हर्बल रंगों का ही उपयोग करें और बच्चों को विशेष सावधानी बरतने की सीख दें। -डॉ जितेंद्र नाथ, सिविल सर्जन, कटिहार

Hindustan

लेखक के बारे में

Hindustan
हिन्दुस्तान भारत का प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग अखबार के रिपोर्टरों ने की है। और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।