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बोले पूर्णिया : दो साल से बंद फूड पार्क बना उपेक्षा का शिकार

बोले पूर्णिया : दो साल से बंद फूड पार्क बना उपेक्षा का शिकार

संक्षेप:

पूर्णिया में फूड पार्क का उद्देश्य गरीबों को रोजगार और शहरवासियों को स्वच्छ फल प्रदान करना था। लेकिन दो वर्षों से बंद पड़े इस पार्क ने प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्थानीय लोग निराश हैं और नगर निगम को तुरंत कार्रवाई करने की आवश्यकता है। 

Dec 07, 2025 01:22 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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प्रस्तुति : मुकेश कुमार श्रीवास्तव

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फूड पार्क का उद्देश्य था गरीबी उन्मूलन, स्वरोजगार, स्वच्छता और नगर निगम की आय में बढ़ोतरी। लेकिन दो वर्षों से बंद पड़ा यह पार्क आज प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। अगर अब भी नगर निगम ने इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो यह योजना हमेशा के लिए इतिहास बन जाएगी और शहर एक बड़ी सार्वजनिक सुविधा से वंचित रह जाएगा। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब जागते हैं और कब यह फूड पार्क वास्तव में जनता के लिए खुलता है। हालांकि इस मुद्दे पर अधिकारियों के बयान लगातार बदलते रहे हैं। कभी फाइल प्रक्रिया में होने की बात कही जाती है, तो कभी तकनीकी कारणों का हवाला दिया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि बीते दो वर्षों में किसी ठोस कार्रवाई का अब तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है।

शहरी गरीबी उन्मूलन और बेरोजगार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से पूर्णिया नगर निगम द्वारा करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए फूड पार्क आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। आस्था मंदिर और राजेन्द्र बाल उद्यान के समीप स्थित यह आधुनिक फूड पार्क बीते करीब दो वर्षों से आवंटन की राह देख रहा है, लेकिन अब तक इसे फल दुकानदारों और फुटपाथ विक्रेताओं के बीच वितरित नहीं किया जा सका है। नतीजा यह है कि यह महत्वाकांक्षी योजना सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। बता दें कि फूड पार्क का उद्देश्य था गरीबी उन्मूलन, स्वरोजगार, स्वच्छता और नगर निगम की आय में बढ़ोतरी। लेकिन दो वर्षों से बंद पड़ा यह पार्क आज प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। अगर अब भी नगर निगम ने इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो यह योजना हमेशा के लिए इतिहास बन जाएगी और शहर एक बड़ी सार्वजनिक सुविधा से वंचित रह जाएगा। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब जागते हैं और कब यह फूड पार्क वास्तव में जनता के लिए खुलता है। पूर्णिया नगर निगम द्वारा फूड पार्क निर्माण का मुख्य उद्देश्य था कि शहर में फुटपाथ पर फल-सब्जी बेचने वाले गरीब विक्रेताओं को एक सुव्यवस्थित स्थान दिया जाए, ताकि वे स्वच्छ वातावरण में व्यापार कर सकें और शहरवासियों को ताजा व साफ-सुथरे फल उपलब्ध हों। साथ ही, इससे स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार का अवसर मिलता और नगर निगम की आय में भी वृद्धि होती। लेकिन अफसोस की बात यह है कि फूड पार्क तैयार होने के बावजूद यह योजना अब तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है। आस्था मंदिर के समीप बना यह फूड पार्क आज देखरेख के अभाव में झाड़ियों और जंगल में तब्दील हो चुका है। चारों ओर गंदगी, टूटी-फूटी संरचनाएं, उखड़ी टाइल्स और लावारिस साज-सामान इस बात की गवाही देती नजर आती हैं कि यहां लंबे समय से कोई गतिविधि नहीं हुई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि शुरुआत में उद्घाटन की चर्चाएं खूब हुई थीं, लेकिन धीरे-धीरे फूड पार्क प्रशासनिक उदासीनता का शिकार हो गया। अगर समय रहते इसका आवंटन कर दिया जाता तो आज यह पार्क रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकता था। फूड पार्क के निर्माण में पूर्णिया नगर निगम ने नगर निधि से लाखों रुपये खर्च किए थे। यह रकम शहर के करदाताओं के पैसे से जुटाई गई थी। अब हालत यह है कि जनता के पैसे से बना यह सार्वजनिक संसाधन बेकार पड़ा है और धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा है। शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह सीधा-सीधा सरकारी धन का दुरुपयोग है, क्योंकि जिस उद्देश्य से इसे बनाया गया था, उसे अब तक पूरा नहीं किया गया।

शहरवासियों को मिलता फ्रेश व लजीज व्यंजन

फूड पार्क का एक बड़ा उद्देश्य यह भी था कि शहरवासियों को एक ही स्थान पर स्वच्छ, ताजा और सुरक्षित फल उपलब्ध कराए जाएं। लेकिन फूड पार्क के चालू नहीं होने से यह सपना भी अधूरा रह गया है। आज भी लोगों को सड़क किनारे धूल-मिट्टी और वाहनों के धुएं के बीच रखे गए फल खरीदने पड़ते हैं, जो स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद नुकसानदायक है। फूड पार्क की बदहाली को लेकर स्थानीय लोगों में लगातार आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोगों का कहना है कि नगर निगम ने सिर्फ निर्माण कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली है, जबकि असली जिम्मेदारी तब पूरी होती जब इसे जरूरतमंदों को सौंपा जाता।

हमारी भी सुनें

दो वर्षों से बना फूड पार्क बेकार पड़ा है। अगर समय पर हमें दुकान मिल जाती तो आज हमारा परिवार सम्मानजनक जीवन जी रहा होता।

- नवीन कुमार

बेरोजगार युवाओं के लिए फूड पार्क उम्मीद बना था, लेकिन दो साल से इंतजार ही कर रहे हैं। अब तो लगता है कि यह योजना सिर्फ कागजों में ही सिमट गई।

- सुष्मिता सिंह

उपयोग नहीं होना प्रशासनिक असफलता है। इससे न केवल रोजगार रुका है बल्कि सरकारी धन का भी खुला दुरुपयोग हो रहा है।

- नमिता

पार्क में अब झाड़ियां और गंदगी है। लोग डरते हैं उधर जाने से। अगर इसे चालू किया जाए तो शहर को स्वच्छ फल और नया बाजार दोनों मिल सकते हैं।

- मुकेश कुमार सिन्हा

फुटपाथ पर दुकान लगाने में हमेशा डर बना रहता है। फूड पार्क मिलता तो हमें सुरक्षित जगह मिलती और रोजी-रोटी भी सम्मान से चलती।

- रमेश सिंह

सड़क किनारे दुकान लगाने से जाम की समस्या रहती है। फूड पार्क में फल व्यवसायी को जगह मिलती तो सुरक्षा के साथ नगर निगम को राजस्व की वृद्धि होता।

- ब्रजमोहन झा

नगर निगम ने करोड़ों खर्च कर पार्क बना दिया लेकिन उसका उपयोग नहीं कराया। यह लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है।

- रतन

युवाओं को यहां सस्ता और ताजा फल मिल सकता था। लेकिन पार्क बंद होने से शहर एक अच्छी सुविधा से वंचित रह गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

- अरविंद कुमार झा

अगर फूड पार्क चालू हो जाए तो शहर की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। छोटे दुकानदारों को स्थायित्व मिलेगा और नगर निगम की आय भी बढ़ेगी।

- शिव शंकर

पार्क के आसपास अब असामाजिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। समय रहते अगर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो यह इलाका पूरी तरह असुरक्षित हो सकता है।

- जावेद अंजूम

पहले इस फूड पार्क से बड़ी उम्मीद थी, लेकिन अब इसकी बदहाली देख मन दुखी हो जाता है। सरकार की योजनाएं ज़मीन पर क्यों नहीं उतरतीं, यही सवाल है।

- रजनी गुप्ता

रोज पार्क के पास से गुजरता हूं, लेकिन वहां सन्नाटा ही रहता है। अगर दुकानें खुलतीं तो यात्रियों को सुविधा मिलती और हम लोगों का भी काम बढ़ता।

- दिलीप कुमार चौधरी

यह मामला सिर्फ फूड पार्क का नहीं बल्कि शहरी योजनाओं की सच्चाई को उजागर करता है। निर्माण के बाद रखरखाव और संचालन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

- अभिमन्यु

सरकार का उद्देश्य गरीबों को रोजगार देना था, लेकिन प्रशासन की ढिलाई से गरीब आज भी इंतजार में हैं। इस पर तुरंत ठोस कार्रवाई जरूरी है।

- अनुज चांद

यहां आधुनिक फल बाजार विकसित किया जा सकता थे। इससे रोजगार, स्वच्छता और नगर निगम की आमदनी तीनों को फायदा होता।

- ओमप्रकाश चौधरी

बोले जिम्मेदार

फूड पार्क बनने के बाद अब तक आवंटित किसी को नहीं किया गया है तो इस संबंध में जानकारी प्राप्त कर नगर निगम की अगली बैठक में प्रमुखता विचार के लिए उठाया जाएगा।

- विजय कुमार खेमका, विधायक, पूर्णिया

फूड पार्क आवंटन को लेकर अगली बोर्ड की बैठक में इसे रखा जाएगा। सभी स्टॉलों को लॉटरी के माध्यम से जरूरतमंद लोगों के बीच बने स्टॉल को आवंटित किया जाएगा।

- कुमार मंगलम, नगर आयुक्त, पूर्णिया

शिकायत

1. दो वर्षों से फूड पार्क का आवंटन नहीं होने से लाखों की संपत्ति बेकार पड़ी है, झाड़ियां उग चुकी हैं, संरचना क्षतिग्रस्त हो रही है और दुरुपयोग स्थिति बन गई।

2. रखरखाव के अभाव में फूड पार्क में गंदगी, टूटे शेड, खराब नालियां और आवारा जानवरों का जमाव है।

3. फुटपाथ विक्रेताओं और बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने की योजना ठप पड़ी है।

4. समय पर आवंटन और निगरानी नहीं होने से असामाजिक तत्वों का डर बना रहता है।

5. शहरवासियों को स्वच्छ और ताजे फल एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का उद्देश्य अधूरा है।

सुझाव

1. नगर निगम को तुरंत आवंटन प्रक्रिया पूरी कर पात्र फुटपाथ विक्रेताओं और बेरोजगार युवाओं को दुकानें सौंपनी चाहिए।

2. फूड पार्क की साफ-सफाई, मरम्मत, रोशनी और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अलग बजट तय कर नियमित निगरानी कराई जाए।

3. फलों की कीमत, गुणवत्ता और साफ-सफाई के लिए नगर निगम द्वारा मानक तय किए जाएं।

4. फूड पार्क को डिजिटल किराया जमा, ऑनलाइन शिकायत व पारदर्शी आवंटन प्रणाली से जोड़ा जाए।

5. जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों व व्यापार संघों को फूड पार्क की निगरानी समिति में शामिल किया जाए।