बोले भागलपुर: नाथनगर दियारा में पांच किमी लंबा व 15 फीट ऊंचा बांध बने
नाथनगर के दियारा में मानसून के दौरान गंगा की बाढ़ के कारण लगभग एक लाख लोग दो महीने तक विस्थापित होते हैं। स्थानीय लोग बाढ़ से राहत के लिए स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकारी राहत शिविरों में...
मानसून के दौरान गंगा में आने वाली बाढ़ के कारण नाथनगर के दियारा में बसे करीब एक लाख की आबादी को वर्ष में करीब दो महीने तक विस्थापन का दर्द झेलना पड़ रहा है। बाढ़ व विस्थापन की यह समस्या यहां रहने वाले लोगों के कई पुश्तों को झेलनी पड़ रही है। आजादी के समय यहां की आबादी वर्तमान समय से करीब चार गुना कम थी, लेकिन समय के साथ बढ़ती आबादी के बोझ के कारण दियारा के निचले इलाकों में लोग रहने को मजबूर हुए। दियारा में हर साल बाढ़ झेलने वाले पंचायतों में शंकरपुर, रत्तीपुर बैरिया, अजमेरीपुर, श्रीरामपुर, रसीदपुर व गोसाईंदासपुर समेत अन्य पंचायत हैं। इन पंचायतों में करीब दो दर्जन गांव हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाढ़ से राहत के लिए जिले के कई हिस्सों में तटबंध बनकर तैयार हो गये हैं, लेकिन नाथनगर दियारा की सुरक्षा के लिए बांध व पुल कब बनेंगे, पता नहीं।
गंगानदी में आयी बेतहाशा बाढ़ के कारण नाथनगर दियारा स्थित शंकरपुर पंचायत की करीब 10 हजार की आबादी व पांच हजार मवेशी अपनी जान बचाकर सरकारी बाढ़ राहत कैंप में अपना जीवन काट रहे हैं। बाढ़ पीड़ितों की आवाज को जिला प्रशासन व राज्य सरकार तक पहुंचाने के लिए हिन्दुस्तान के बोले भागलपुर कार्यक्रम का आयोजन टीएनबी कॉलेजिएट बाढ़ राहत शिविर में किया गया। इस कार्यक्रम से शिविर में रहने वाले करीब 300 लोग जुड़े। सबकी जुबां पर बस एक ही मांग थी कि इस समस्या का अब स्थायी समाधान होना चाहिये।
शिविर में रह रहे 80 वर्षीय वृद्ध विशुनदेव मंडल ने बताया कि बचपन से अब बूढ़े हो गये। उम्र के साथ-साथ समस्या बढ़ती ही जा रही है। अब हमारे बच्चे व पोते-पोती को यही दुख झेलना पड़ रहा है। हर साल हमें दो महीने तक गांव छोड़कर भागना पड़ता है। पानी नहीं रहने के बाद गांव में सुख-सुख ही सुख है। बाढ़ आने के बाद महादुख है। बाढ़ से पहले दियारा पर मवेशियों के लिए भरपूर मात्रा में चारा मिलता है। हर घर में दूध की नदी बहती है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद खेतों में गेहूं, सरसों, मटर, चना, खेसारी, सब्जियां व मक्का खूब उगता है। लेकिन साल भर की कमायी महज दो माह में बह जाती है। दशहरा तक हम राहत कैंप में ही रहेंगे। गांव का रास्ता सूखने के बाद हम घर लौटेंगे। दीपावली के समय घर की मरम्मत से लेकर अनाज व सामान की बर्बादी से एक परिवार को कम से कम 25 हजार रुपये का नुकसान झेलना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पंचायत में 700 परिवार रहते हैं। आप खुद जोड़ लीजिए हर साल बाढ़ के कारण पंचायत के लोगों को कितना नुकसान होता है। पास में खड़े एक युवा ने अपने मोबाइल पर जोड़कर बताया कि साढ़े सत्रह करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
शंकरपुर पंचायत के मुखिया अशोक मंडल ने बताया कि मेरे पंचायत के दारापुर, बालूटोला, बिंदटोली, सहोनियां समेत अन्य टोले में करीब 4800 मतदाता व 10 हजार की आबादी है। बीते एक सप्ताह से सभी लोग अपने पांच हजार से अधिक मवेशियों के साथ राहत कैंप में रहते हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए हमने सांसद के माध्यम से राज्य व केंद्र सरकार को मांगपत्र सौंपा है। मांग की गयी है कि नाथनगर के आधा दर्जन पंचायतों की बाढ़ से सुरक्षा के लिए करीब पांच किलोमीटर लंबा व 15 फीट ऊंचा मजबूत तटबंध का निर्माण कराया जाये। हर साल की समस्या का यही निदान है। उन्होंने बताया कि बाढ़ का पानी रातोंरात घर व गांव में घुसता है। पंचायत में पुल नहीं रहने से लोगों को निकलने में काफी समय लग जाता है। नाव के सहारे एक परिवार को निकलने में तीन से चार दिन लग जाते हैं। तबतक घर के कई सामान खराब हो जाते हैं। उम्मीद है कि जनवरी से किलाघाट में पुल व सड़क का निर्माण शुरू हो जायेगा। इससे भी लोगों की आधी मुश्किलें कम होंगी।
टीएनबी कॉलेजिएट बाढ़ राहत शिविर में रह रहे वृद्ध दिनेश महतो ने बताया कि गांव में पुल नहीं रहने के कारण लड़के-लड़कियों की शादी में काफी समस्या होती है। गांव की स्थिति देखकर रिश्तेदार हड़क जाते हैं। बच्चे-बच्चियों को स्कूल व कॉलेज जाने में नाव का सहारा लेना पड़ता है। नेता लोग सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं। चुनाव के बाद हम डूबे या मरे, इसकी चिंता जनप्रतिनिधियों को नहीं रहती है। हमारा जीवन तो यही सब देखते हुए बीत गया है। अब नयी पीढ़ी को यह सब न देखना पड़ेगा। भगवान से हर समय यही सुमरते रहते हैं। गांव के बच्चे नौकरी कर कमाए और जमीन लेकर सूखे में बस जाए।
गांव के सियाराम मंडल ने बताया कि सरकार की ओर से हमें दियारा के बाहर जमीन देना चाहिये। यहां की आबादी को दूसरी जगह बसाने की जरूरत है। बाईपास के निकट 300 बीघा सरकारी जमीन है। अगर यहां के ग्रामीणों को वहीं पर बसा दिया जाये तो बहुत अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि काफी मान मनौव्वल के बाद सरकार की तरफ से बाढ़ राहत कैंप शुरू कर दिया गया है। शिविर में दो टाइम खाना मिल रहा है। पानी, दवा व चारा भी बांटा जा रहा है। रविवार को नाथनगर प्रखंड कार्यालय से वितरण के लिए 750 प्लास्टिक का तिरपाल भी गाड़ी से भेजा गया है। इसका वितरण होने से हम इसे टांग कर रहेंगे। दिन में तेज धूप व बारिश से हम परेशान हो गये हैं। रात में अब ओस भी पड़ने लगा है।
बोले जिम्मेदार
नाथनगर प्रखंड के दियारा में आयी भीषण बाढ़ के कारण यहां के ग्रामीण बाढ़ राहत शिविर में आकर आश्रय ले रहे हैं। ग्रामीणों के लिए टीएनबी कॉलेजिएट, बाल निकेतन उच्च विद्यालय समेत अन्य बाढ़ राहत शिविर में रहने के लिए पूरी व्यवस्था की गयी है। बाढ़ पीड़ितों की हर मांग को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। रत्तीपुर बैरिया व शंकरपुर समेत आसपास के सभी ग्रामीणों की मांग है कि बाढ़ से बचाव के बांध का निर्माण किया जाये। इस मांग को पूरा करने के लिए सरकार से लिखित रूप से आग्रह किया जायेगा। बांध बनने से हजारों लोगों को हर साल की बाढ़ से राहत मिलेगी।
-अजय कुमार मंडल, सांसद, भागलपुर
इनकी भी सुनिए
बाढ़ से हर वर्ष गांववासियों को हजारों रुपये की आर्थिक क्षति होती है। हालांकि शिविरों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, परंतु यह अस्थायी समाधान है। सरकार ऊंचे स्थानों पर स्थायी बसावट की व्यवस्था करे।
-अशोक मंडल
बाढ़ के दौरान मवेशियों को हरा चारा उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाता है, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में सूखा चारा खिलाना पड़ता है। मवेशियों के लिए हरे चारे की भी व्यवस्था की होनी चाहिए।
-मुगल महतो
शिविर का निरीक्षण अधिकारी नियमित रूप से कर रहे हैं, यहां तक कि डीएम साहब भी आ चुके हैं, लेकिन अब तक हमारे जनप्रतिनिधि हालचाल लेने नहीं पहुंचे हैं।
-नंदकिशोर मंडल
बाढ़ के समय जिनके कच्चे मकान होते हैं, वे गंगा में अक्सर पानी में बह जाते हैं, जिससे उस परिवार को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। इस आपदा में सालों की मेहनत और बचत भी पानी में बह जाता है।
-नमाखन मंडल
बाढ़ के दौरान दो माह तक गांव में रहना मुश्किल हो जाता है। हालांकि अब तो गांव में बिजली की भी व्यवस्था हो चुकी है। बाढ़ के दौरान राहत शिविर से मदद भी मिल रही है, जिससे जरूरतमंदों को अस्थायी सहारा मिलता है।
-सदानंद महतो
क्षेत्र में बाढ़ की समस्या 1971 के आसपास शुरू हुई थी, लेकिन अब इसका रूप और भी विकराल हो गया है। हर साल बाढ़ से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, फसलें और घर क्षतिग्रस्त होते हैं।
-विष्णदेव मंडल
शिविर में पके हुए भोजन से लेकर दवाई तक की व्यवस्था की गई है, जिससे लोगों को राहत मिली है। मवेशियों के चारे की कमी बनी हुई है। चारा तो मिलता है, लेकिन मवेशियों की जरूरत पूरी नहीं हो पाती है।
-नरेश महतो
गांव को जोड़ने के लिए एक पुल का निर्माण जरूरी है। पुल न होने के कारण ग्रामीणों को आने-जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। समय पर चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिल पाती है।
-शिवशंकर महतो
बाढ़ के कारण दो माह तक बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो जाती है। गांव में हाई स्कूल तक की सुविधा होने के बावजूद पानी भरने और रास्ते बंद होने से बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते।
-दिनेश महतो
दियारा क्षेत्र में लोग साल में केवल एक ही फसल से अपना भरण-पोषण करते हैं। बाढ़ आने से पहले लगाई गई सब्जियां या फसलें पानी में डूबकर नष्ट हो जाती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
-मनोहर महतो
गांव में बाढ़ और आवागमन की कठिनाइयों के कारण लोग यहां शादी-विवाह करना नहीं चाहते। लड़के वालों को यहां लड़की देना पसंद नहीं होता और बारात भी गांव तक लाने से कतराते हैं।
-सरिता देवी
शिविर में मवेशी रखने की सुविधा उपलब्ध है, जिससे पशुओं को सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन बाढ़ के दिनों में आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मवेशियों को मजबूरीवश कम दामों में बेचना पड़ता है।
-विशाखा देवी
बाढ़ आने से घर में रखा राशन और अन्य जरूरी सामान नष्ट हो जाते हैं, जिससे भारी नुकसान होता है। शिविर लगने से रहने और भोजन की सुविधा जैसी कुछ राहत मिलती है, लेकिन बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं हो पाता।
-यशोदा देवी
दियारा क्षेत्र में अब बिजली की उचित व्यवस्था होने से सिंचाई में परेशानी नहीं होती। अगर पुल का निर्माण किया जाए तो आम दिनों के साथ-साथ बाढ़ के समय भी लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
-टिंकू कुमार
गंगा की समय-समय पर सफाई यानी गाद निकालने की आवश्यकता है। अगर गंगा से नियमित रूप से गाद हटाई जाए तो नदी का प्रवाह बेहतर होगा और बाढ़ का प्रभाव कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।
-शिवम मंडल
गांव में आने-जाने के सही साधन न होने के कारण लोग यहां शादी-विवाह नहीं करना चाहते। यदि किसी लड़की की शादी तय भी होती है, तो बारात गांव लाने के बजाय विवाह मंदिर या शहरी क्षेत्र में संपन्न करना चाहते हैं।
-पिंकी देवी
शिकायत
1. दियारा क्षेत्र में बाढ़ से पहले लगी सब्जी और फसलों का नुकसान हो जाता है, जिससे किसानों को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है।
2. गांव में शादी-विवाह नहीं करना चाहते कोई भी, क्योंकि आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
3. बाढ़ के समय कई किसान परिवारों को कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण मवेशियों को कम दाम में बेचने की मजबूरी बन जाती है।
4. बाढ़ के समय मेहनत कर घर में रखे राशन और सामान का नुकसान होता है।
5. शिविरों में लंबे समय तक रहने से जीवन प्रभावित होती है। बच्चों की पढ़ाई भी बाधित होती है।
सुझाव
1. सरकार की ओर से फसल बीमा का लाभ किसानों को समय पर दिलाया जाए। साथ ही वैकल्पिक फसलें जैसे दलहन व तिलहन की खेती को प्रोत्साहित कर किसानों की आय बढ़ाई जाए।
2. दियारा क्षेत्र को जोड़ने के लिए अगर एक पुल निर्माण किया जाए तो शायद ऐसी समस्या नहीं आए।
3. बाढ़ पीड़ितों को मवेशी पालने के लिए भी आर्थिक सहायता व चारा भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
4. कहीं ऊंचे स्थानों पर बाढ़ पीड़ितों को सरकार बसाने की व्यवस्था करें, जिससे आर्थिक नुकसान सहना न पड़े।
5. स्थायी बाढ़-राहत केंद्र और पुनर्वास योजना चलाकर हम बाढ़ पीड़ितों को उस स्थान पर बसाया जाए।
प्रस्तुति: गौतम वेदपाणि, संतोष कुमार, फोटोग्राफ: संजीव

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Yogendra Raiलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




