Hindi NewsBihar NewsBhagalpur NewsFlaka Block Farmers Struggle as Canals Dry Up A 35-Year Battle for Water and Livelihood
बोले कटिहार : फलका की नहरें सूखने से सिंचाई व्यवस्था चौपट

बोले कटिहार : फलका की नहरें सूखने से सिंचाई व्यवस्था चौपट

संक्षेप:

फलका प्रखंड के किसानों की जिंदगी बर्बाद हो गई है, क्योंकि 35 साल पहले आई बाढ़ के बाद नहरें सूख गई हैं। किसान अब सिंचाई के लिए भारी खर्च कर रहे हैं और कई ने खेती छोड़कर मजदूरी करने का विकल्प चुना है। प्रशासनिक लापरवाही और अवैध कब्जे नहरों के अस्तित्व को संकट में डाल रहे हैं।

Tue, 2 Dec 2025 01:22 AMNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
share Share
Follow Us on

-प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, आशीष कुमार सिंह

LiveHindustan को अपना पसंदीदा Google न्यूज़ सोर्स बनाएं – यहां क्लिक करें।

फलका प्रखंड… एक ऐसा इलाका, जिसकी पहचान कभी हरियाली, भरपूर फसल और बहते पानी की मधुर धुन थी। नहरों में कल-कल करती धारा यहां के खेतों को नहीं, बल्कि किसान परिवारों की उम्मीदों को भी सींचती थी। गर्मा धान की खुशबू और गेहूं-दलहन के सुनहरे खेत यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे। मगर वक्त बदला, और इसी बदले वक्त ने फलका की किस्मत भी बदल दी, ऐसे बदली कि अब सूखी नहरें किसानों की पीड़ा बनकर खड़ी हैं। 1987 की बाढ़… और इसके बाद सब कुछ थम गया। 35 साल पहले आई प्रलयंकारी बाढ़ ने यहां की नहरों को जैसे निगल लिया। कोसी और बरंडी नदियों के रौद्र रूप ने बारहमासी धाराओं का रास्ता ही बदल दिया। किसान अमित गुप्ता, बंटू शर्मा, टुनटुन गुप्ता, शमशेर आलम, राघव सिंह, शंकर सिंह, राजू चौधरी और उमानाथ पटेल ने कहा कि उन्हें हर एक सिंचाई के लिए 800–1000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। छोटे और सीमांत किसानों की हालत सबसे खराब है, जिन्हें हर बार सोचकर फसल बोनी पड़ती है कि पानी का इंतज़ाम कर भी पाएंगे या नहीं। कई परिवारों ने खेती छोड़कर मजदूरी या प्रवास का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है क्योंकि बिना सिंचाई के खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। सबसे अधिक संकट उन परिवारों का है जो बटाई पर खेती करते हैं। बढ़ती महंगाई, महंगे बीज, दोगुने दाम पर मिलने वाली खाद और ऊपर से पानी का संकट-इन सबने खेती को घाटे का धंधा बना दिया है। कई ने जमीन बटाई पर दे दी, कोई बंधक रखकर घर चला रहा है। 2011 में हुए बांध मरम्मत के शिलान्यास ने किसानों में एक बार फिर रोशनी जगाई थी। कुछ वर्षों तक कुरसेला वितरणी पर काम भी चला, लेकिन वो काम अधूरा रहा। विधायिका पूनम पासवान और दिवंगत बरारी विधायक नीरज यादव ने कई बार इस मुद्दे को उठाया। विभाग ने दावा किया कि 50 हजार किसानों को सिंचाई मिलेगी, 25,699 एकड़ हरा-भरा होगा। मगर जमीन की सच्चाई इससे बिल्कुल जुदा है। नहरें आज खंडहर जैसी दिखती हैं। कई छोटी नहरें पूरी मिट चुकी हैं। कुछ इलाकों में लोगों ने नहर की जमीन पर बगीचे तक लगा लिए हैं। सरकारी कागजों में करोड़ों की योजनाएं अब भी दर्ज हैं, पर धरातल पर नहरें सिर्फ किसानों की आंखों की नमी में जिंदा हैं। फलका की सूखी नहरों ने सबसे बड़ा असर गांव के युवाओं पर डाला है। जहां पहले युवा खेती को गर्व का पेशा मानते थे, आज उनमें से अधिकतर इससे दूरी बना रहे हैं। स्थानीय युवाओं का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति संभालना मुश्किल हो गया है। ऐसे में वे बाहर शहरों का रुख करने को मजबूर हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में रोज़गार के लिए प्रवास करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

अवैध कब्जे से नहरों के अस्तित्व पर संकट

फलका प्रखंड की नहरों का सूखना सिर्फ प्राकृतिक आपदा या बाढ़ का परिणाम नहीं है। असल वजहों में प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और नहरों पर बढ़ता अवैध कब्जा भी शामिल है। गांव में कई स्थानों पर नहर की जमीन पर पक्के निर्माण, बगीचे और खेत खड़े कर दिए गए हैं, जिससे पानी का मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नहरों की सफाई और मरम्मत के नाम पर कई बार बजट आया, लेकिन काम आधा-अधूरा ही किया गया। कई जगह तो सिर्फ कागजों में निर्माण दर्ज है, जबकि जमीन पर एक फावड़ा मिट्टी भी नहीं हटी। नहरों की लाइनिंग में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण वह पहली बारिश में ही टूट गई। ग्रामीणों का आरोप है कि इस सब में स्थानीय ठेकेदारों और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत भी रही है। जब तक जांच नहीं होगी और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होगी, नहरें दोबारा जिंदा होना मुश्किल है।

शिकायत

1. नहर मरम्मत की घोषणाएं बार-बार हुईं, लेकिन धरातल पर काम पूरा नहीं हुआ

2. कई वर्षों से अधिकारी सिर्फ कागजी रिपोर्ट भेजकर अपना काम पूरा मान लेते हैं, लेकिन किसानों की पीड़ा सुनने कोई नहीं आता

3. करोड़ों खर्च के बाद भी नहरें जगह-जगह टूटी पड़ी हैं। यह विभाग की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

4. नहर के मार्ग पर अवैध कब्जे बढ़ते जा रहे हैं, प्रशासन कार्रवाई का आश्वासन देता है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है

5. सिंचाई का लाभ 50 हजार किसानों तक पहुंचाने का दावा था। एक बूंद पानी भी खेतों तक नहीं पहुंचा

समाधान

1. मुख्य नहरों के साथ छोटी वितरणियों को पुनर्जीवित किया जाए। तभी पानी हर खेत तक पहुंच सकेगा।

2. सरकार को नहरों की पूरी तकनीकी जांच कराकर स्थायी मरम्मत करनी चाहिए। अधूरा काम बंद कर, नई एजेंसियों को ही जिम्मेदारी दी जाए।

3. नहरों की जमीन पर हो रहे अवैध कब्जे तुरंत हटाए जाएं। इससे पानी के प्रवाह में कोई बाधा नहीं रहेगी।

4. किसानों की भागीदारी के साथ एक स्थानीय निगरानी समिति बनाई जाए। इससे मरम्मत और रखरखाव पर पारदर्शिता बनी रहेगी।

5. जल-संचयन और माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा देकर वैकल्पिक सिंचाई व्यवस्था विकसित की जाए।

इनकी भी सुनें

फलका की नहरों के सूख जाने से यहां के किसानों का जीवन ठहर गया है। सरकारें आईं व गईं, पर नहरें कभी नहीं जगीं। अब उम्मीद थकने लगी है।-बाबा जयमंगल सिंह

हमने अपनी जवानी नहरों के किनारे खेती करते हुए बिताई थी। आज यह हाल देखकर मन भारी हो जाता है कि नहरें सिर्फ मिट्टी की खाइयों में बदल गई हैं। —कारू सिंह

हर चुनाव में इस मुद्दे को उठाया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सबकी आवाज़ गायब हो जाती है। खेती हमारी रीढ़ है, पर बिना पानी के रीढ़ कमजोर हो गई है।—राघव सिंह

कई बार अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक गुहार लगाई, लेकिन नहरों में पानी अब तक नहीं आया। खेती छोड़कर लोग शहर की ओर जा रहे हैं। —गुड्डू झा

नहरों में दोबारा पानी लाने के लिए सिर्फ कागजी योजनाएं नहीं, ईमानदार कार्रवाई की जरूरत है। वरना आने वाली पीढ़ी खेती से दूर हो जाएगी।—विश्वराज सिंह

अगर समय रहते सिंचाई व्यवस्था ठीक न की गई, तो खेती पूरी तरह चरमराने वाली है। हम चाहते हैं कि सरकार गंभीरता से काम करे, ताकि परेशानी कम हो —प्रवीण सिंह

पानी हो तो हम फसल खड़ी कर सकते हैं, खेतों में हरियाली ला सकते हैं। लेकिन अधूरी मरम्मत और लापरवाही ने इस उम्मीद को कमजोर कर दिया है। —संतोष सिंह

नहरें बहना बंद हुईं, तो गांव की खुशहाली भी रुकी। जिम्मेदार ने सिर्फ आश्वासन दिया। नहरें शुरू होंगी तभी किसान फिर से मजबूती से खड़े हो पाएंगे। —शंकर सिंह

नहरें सूखने के कारण खेती अब जोखिम बन चुकी है। कभी यही नहरें हमारी ताकत थीं। सरकार इस मुद्दे को प्राथमिकता देकर समाधान निकाले। —आदेश सिंह

हमारे गांव के युवा खेती छोड़कर बाहर जाने लगे हैं, क्योंकि नहरों के बिना फसल टिक नहीं रही। खेत का मालिक होकर भी मजदूर जैसा जीवन जीना पड़ रहा है। —मोनू सिंह

35 साल का इंतजार बहुत लंबा होता है। हमने अपनी पूरी जिंदगी यह सोचते गुजार दी कि शायद अगले साल पानी आएगा। पर हर बार नहरें सूखी ही रहीं। —नवीन सिंह

नहरें धूल से भरी दिखती हैं। किसानों को उम्मीद है कि अगर एक बार पानी आ जाए, तो खेती फिर से पटरी पर लौट सकती है। हमें सिर्फ वादा नहीं, काम चाहिए। —अविनाश सिंह

नहरों का सूख जाना सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, किसानों की कमर तोड़ने वाला दर्द है। पानी नहीं तो फसल नहीं, और फसल नहीं तो आमदनी कैसे होगी?—कुंदन सिंह

नहर की मरम्मत अधूरी छोड़ दी गई और उसका खामियाजा किसान आज तक भुगत रहे हैं। किसी भी योजना का अधूरा काम जनता के लिए मुसीबत बन जाती है। —राधा रमन

किसानों का मन टूट चुका है, लेकिन उम्मीद अभी बाकी है। हम बार-बार यही सोचते हैं कि अगर नहरें बहने लगें तो जिंदगी फिर पटरी पर लौट आए। —संजय सिंह

बोले जिम्मेदार

किसानों को जिस संकट का सामना करना पड़ रहा है, वहं स्वीकार्य नहीं है। मैंने इस मुद्दे को विधानसभा व विभागीय बैठकों में उठाया है। जल्द ही नहरों की तकनीकी जांच, अवैध कब्जा हटाने व मरम्मत के लिए विशेष योजना तैयार की जा रही है।

-कविता देवी, विधायक, कोढ़ा विधानसभा