
बोले कटिहार : कोढ़ा व कुरसेला में यूनिट होने से मिलेगी त्वरित मदद
कटिहार जिले में हर साल गर्मियों में आगजनी की घटनाएं होती हैं, जिससे ग्रामीणों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। प्रशासनिक लापरवाही और अग्निशामक उपकरणों की कमी के कारण आग तेजी से फैल जाती है। आग लगने पर मुआवजा नाकाफी होता है और कई परिवारों की जिंदगियां तबाह हो जाती हैं।
-प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज
कटिहार जिला ही नहीं, बल्कि पूरा सीमांचल और कोसी अंचल हर साल आग के डर के साए में जीता है। जैसे ही चैत और बैशाख का महीना आता है, तेज हवा, सूखी फसल और घनी आबादी वाले गांवों में एक छोटी सी चिंगारी पूरे टोले को राख में बदल देती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा भर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा का नतीजा है। अगर पंचायत स्तर तक अग्निशमन यंत्रों और यूनिटों की मुकम्मल व्यवस्था होती, तो शायद हर साल होने वाले करोड़ों-अरबों रुपये के नुकसान को रोका जा सकता था। सीमांचल और कोसी के अधिकांश पंचायत ऐसे हैं, जहां घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं। फूस, खपरैल और लकड़ी से बने मकान आग पकड़ते ही पल भर में भभक उठते हैं। शॉर्ट-सर्किट, चूल्हे की चिंगारी या खेत में जलाई गई पराली से उठी आग देखते ही देखते पूरे गांव को चपेट में ले लेती है। ग्रामीण बताते हैं कि आग लगने के बाद दमकल की गाड़ी आने तक सब कुछ खत्म हो चुका होता है। कई बार तो दमकल पहुंचती ही नहीं, क्योंकि दूरी ज्यादा होती है और सड़कें संकरी हैं।
कटिहार जिले की बात करें तो यहां हर साल अग्निकांड की दर्जनों बड़ी घटनाएं होती हैं। कोढ़ा, कुरसेला, बारसोई, आजमनगर जैसे प्रखंडों में आगजनी की घटनाएं आम हो चुकी हैं। खासकर कोढ़ा और कुरसेला जैसे घनी आबादी वाले और राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे क्षेत्रों में अगर एक-एक अग्निशमन यूनिट स्थापित हो जाए, तो हालात काफी हद तक काबू में आ सकते हैं। चैत और बैशाख के महीनों में यही इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, जब खेत सूखे होते हैं और हवाएं आग को तेजी से फैलाती हैं। हर अग्निकांड के बाद मुआवजे की घोषणा होती है, लेकिन क्या वह मुआवजा किसी परिवार की पूरी जिंदगी की कमाई की भरपाई कर पाता है? राख में बदले घर, जलकर नष्ट हुए अनाज, मवेशी और जरूरी दस्तावेज—इनका नुकसान सिर्फ पैसों से नहीं तौला जा सकता। बच्चों की किताबें, बेटियों का दहेज, बुजुर्गों की दवाइयां। सब कुछ आग की भेंट चढ़ जाता है। इसके बाद शुरू होता है राहत के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने का सिलसिला। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समस्या वर्षों से सामने है, तो समाधान क्यों नहीं? पंचायत स्तर पर छोटे अग्निशमन यंत्र, प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रखंड स्तर पर मिनी फायर यूनिट की व्यवस्था आज भी सपना बनी हुई है। अब समय आ गया है कि कटिहार जिला समेत पूरे सीमांचल और कोसी क्षेत्र को केवल संवेदनशील नहीं, बल्कि अत्यधिक अग्नि-संवेदनशील क्षेत्र मानकर योजना बनाई जाए। ग्रामीणों को आखिरकार वह सुरक्षा मिलनी चाहिए, जिसके वे वर्षों से हकदार हैं। सवाल बस इतना है-क्या अगली आग से पहले कोई सुनेगा, या फिर एक और गांव राख होने के बाद ही व्यवस्था जागेगी?
अग्नि की लपटों में जलीं बचपन की खुशियां, टूटीं उम्मीदें
हर साल कटिहार, सीमांचल और कोसी क्षेत्र के गांवों में जब आग लगती है, तो केवल लकड़ी या फूस का घर ही नहीं जलता, बल्कि एक पूरा परिवार टूट जाता है। बच्चों की पढ़ाई की किताबें, बुजुर्गों की दवाइयां, परिवार के दस्तावेज, मवेशी, अनाज सब कुछ राख हो जाता है। कई परिवारों के लिए यह नुकसान उनकी पूरी जिंदगी का फलसफा है। गरीब और सीमांत किसान, जो वर्षों की मेहनत से संजोई संपत्ति आग की भेंट चढ़ा देते हैं, फिर भी सरकारी मुआवजे की रकम इतनी कम होती है कि उसे दोबारा शुरुआत करने के लिए वह संघर्ष फिर से शुरू करते हैं। अग्निकांड के बाद राहत के लिए दर-दर भटकते ये लोग अपनी तकलीफों के बीच खुद को अकेला महसूस करते हैं। गांवों में अग्निशमन यंत्रों की कमी और दमकल की दूरियां इस तबाही को और गहरा करती हैं।
शिकायत
1. हर साल अग्निकांड के बावजूद स्थायी समाधान की कोई ठोस योजना आज तक लागू नहीं की गई। बदलाव नहीं दिखता।
2. ग्रामीण इलाकों में दमकल की गाड़ियां घंटों बाद पहुंचती हैं, जिससे आग पर काबू पाना लगभग असंभव हो जाता है।
3. अधिकांश पंचायतों में अग्निशमन यंत्र या संसाधन बिल्कुल नहीं हैं, फिर भी प्रशासन इसे गंभीरता से नहीं लेता,होता है नुकसान
4. अग्निकांड के बाद मिलने वाला मुआवजा वास्तविक नुकसान के सामने नगण्य होता है, जिससे पीड़ित दोहरी मार झेलते हैं।
5. आग से बचाव को लेकर अभियान न के बराबर हैं, जिससे लोग हर साल वही गलतियां दोहराने को मजबूर हैं।
सुझाव
1. प्रत्येक पंचायत में कम-से-कम पोर्टेबल अग्निशमन यंत्र और उसका नियमित रख-रखाव अनिवार्य किया जाए।
2. कोढ़ा और कुरसेला जैसे संवेदनशील प्रखंडों में स्थायी अग्निशमन यूनिट की तुरंत स्थापना की जाए।
3. ग्रामीण युवाओं और पंचायत प्रतिनिधियों को अग्निशमन प्रशिक्षण दिया जाए ताकि आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई हो सके।
4. फूस व खपरैल के घरों वाले इलाकों में फायर सेफ्टी ऑडिट कराकर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जाए। ।
5. मुआवजा प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाया जाए ताकि पीड़ित परिवारों को 72 घंटे के भीतर प्राथमिक राहत मिल सके।
हमारी भी सुनें
गर्मी शुरू होते ही गांव में आग लगने का डर सताने लगता है। फूस के घर, संकरी गलियां और पास में कोई दमकल नहीं होना हमारी सबसे बड़ी मजबूरी है। आग लगने पर सब कुछ मिनटों में खत्म हो जाता है। मिलने वाली मदद नाकाफी है। -सौरव कुमार
मैंने अपनी आंखों से पड़ोस का पूरा टोला जलते देखा है। आग बुझाने के लिए लोग बाल्टी लेकर दौड़ते रहे, लेकिन कोई साधन नहीं था। दमकल देर से पहुंची और तब तक सब राख हो चुका था। प्रशासन को गांवों की हालत समझनी चाहिए। -कन्हाई मंडल
अग्निकांड सिर्फ मकान नहीं जलाता, पूरे परिवार की उम्मीदें खत्म कर देता है। अनाज, कपड़े, जरूरी कागजात सब जल जाते हैं। इसके बाद महीनों तक लोग संभल नहीं पाते। हर साल दोहराई जाती है, लेकिन व्यवस्था नहीं सुधरती।-मंटू महतो
शॉर्ट-सर्किट या चूल्हे की चिंगारी से बड़ी घटना हो जाती है। दमकल की दूरी इतनी ज्यादा है कि मदद पहुंचने से पहले सब खत्म हो जाता है। सरकार को चाहिए कि संवेदनशील इलाकों में स्थायी यूनिट बनाए, ताकि जान-माल सुरक्षित रह सके। -उपेन्द्र महतो
आग के बाद सिर्फ मुआवजे की घोषणा होती है। कुछ हजार रुपये देकर प्रशासन अपना कर्तव्य पूरा मान लेता है। जीवन भर की कमाई की भरपाई कौन करेगा? पंचायतों में अग्निशमन यंत्र होते, तो लोग खुद ही शुरुआती आग पर काबू पा सकते थे। -नरेश सूरी
गांवों की घनी आबादी आग के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। एक घर में लगी आग पल भर में कई घरों तक फैल जाती है। हमने कई बार इसकी शिकायत की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा। अब जरूरत है कि जमीन पर भी तैयारी दिखाए। — बालकृष्ण झा
हर अग्निकांड के बाद बच्चों और महिलाओं की हालत सबसे ज्यादा खराब होती है। खुले आसमान में रहना मजबूरी बन जाती है। पढ़ाई, दवा और रोजमर्रा की जरूरतें सब प्रभावित होती हैं। अग्निशमन व्यवस्था मजबूत हो तो यह हालात पैदा ही न हों। -सुमित कुमार
हर बार आग के बाद हम वादे सुनते हैं, लेकिन कुछ महीनों में सब भूल जाता है। अगली गर्मी फिर वही डर लेकर आती है। अगर पंचायत स्तर पर स्थायी व्यवस्था बन जाए, तो यह चक्र टूट सकता है। — अनिल कुमार
गांवों में अग्निशमन की कमी एक सामाजिक असमानता को दिखाती है। शहरों में सुविधाएं हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों को नजरअंदाज किया जाता है। इसलिए सुरक्षा भी सबके लिए बराबर होनी चाहिए। -धर्मेंद्र कुमार
मैंने देखा है कि आग लगने पर गांव के लोग खुद की जान जोखिम में डालकर बुझाने की कोशिश करते हैं। कई बार लोग झुलस भी जाते हैं। अगर सही उपकरण और प्रशिक्षण मिले, तो ऐसी नौबत न आए। — वीरेंद्र कुमार
अग्निकांड के बाद कारणों पर गंभीरता से काम नहीं किया जाता। न बिजली व्यवस्था सुधारी जाती है, न जागरूकता बढ़ाई जाती है। रोकथाम पर ध्यान नदेने पर ही सही तस्वीर सामने आएगी । - दिलीप महतो
हमारे क्षेत्र में आग लगने की खबर सुनते ही लोग भगवान को याद करने लगते हैं, क्योंकि व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। दमकल कब आएगी, आएगी भी या नहीं-यह तय नहीं होता। यह स्थिति बेहद डरावनी है। -राम पुलिस महतो
खेत, घर और सामान जलने के बाद जिंदगी फिर से शुरू करना आसान नहीं होता। सरकार अगर सच में किसानों और मजदूरों की चिंता करती है, तो अग्निशमन को प्राथमिकता देनी होगी। सुरक्षा का सवाल है। -लालू महतो
आग को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके असर को जरूर कम किया जा सकता है। इसके लिए गांव में प्रशिक्षित लोग व उपकरण हों, तो बड़ी आपदा को छोटी में बदला जा सकता है। -मंटू कुमार राय
बोले जिम्मेदार
छोटी और बड़ी मिलाकर कुल 10 दमकल गाड़ियां उपलब्ध हैं। इसके अलावा मनिहारी में 3 और बारसोई में 6 दमकल गाड़ियां कार्यरत हैं। इन गाड़ियों को प्राणपुर, मनसाही, बरारी, कुर्सेला, फालका, मुफस्सिल और मनिहारी जैसे प्रमुख थानों में रणनीतिक रूप से तैनात किया गया है।- मनोरंजन कुमार चौधरी, सहायक जिला अग्निशमन अधिकारी, कटिहार
मेरी प्राथमिकता है कि पंचायत स्तर पर अग्निशमन यंत्र, स्वयंसेवक दल और प्रखंड स्तर पर मिनी फायर स्टेशन की व्यवस्था हो। इसके लिए मैं अधिकारियों से बात कर रहा हूं व विस में भी यह मुद्दा उठाया गया है। जनता की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।
-विजय सिंह, विधायक, बरारी विधानसभा

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