मौसम, सिस्टम की मार से महंगी पड़ रही धान की खेती
धरती पुत्रों की व्यथा जिले में धान की खेती पूरी तरह मौसम पर निर्भर,

भागलपुर, वरीय संवाददाता। जिले में आज की तारीख में करीब 52 से 54 हजार हेक्टेयर में धान की खेती हो रही है। ये आंकड़े देखने में भले ही आकर्षक लगते हो, लेकिन किसानों के लिए धान की खेती न तो कायदे और न ही फायदे का सौदा साबित हो रहा है। धान की खेती करने वाले किसान कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़ से जूझ रहे हैं। अगर भगवान भरोसे खेतों में धान की फसल लहलहा गई तो फिर उन्हें धान बेचकर रुपये पाने में पसीने छूट जाते हैं। आलम ये है कि मौसम, आपदा व कृषि विभाग के सिस्टम के आगे किसानों को धान की खेती महंगी पड़ रही है।कहलगांव:
एक क्विंटल पर आठ किलो अधिक धान ले रहे, लेकिन भुगतान मिलने में लग रहा एक माहकहलगांव प्रखंड क्षेत्र में लगभग 3800 हेक्टेयर में धान की खेती होती है। यहां के किसानों की मुख्य आजीविका है। यहां पर धान की खेती पूरी तरह से मौसम पर निर्भर है। सिंचाई की सुविधा बेहतर न होने के कारण किसानों को बिचड़ा गिराने से लेकर धान रोपनी और इसकी कटाई तक में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बीते साल भी मौसम की अनियमितता और बेमौसम बारिश के कारण धान खेती बुरी तरह से प्रभावित हुई, जिससे धान के उत्पादन में गिरावट आई। कई जगह तो धान में खखरी (छिलके के अंदर चावल नहीं) भी देखा गया। कैरिया पंचायत के किसान राजेश सिंह, राकेश सिंह कहते हैं कि धान की खेती में भारी पूंजी लगाने के बावजूद उन्हें कभी अतिवृष्टि, तो कभी अनावृष्टि, बाढ़ और सूखाड़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा। ऐसे में अब धान की खेती के प्रति उत्साह कम होता जा रहा है। गोपाल यादव, अमरेंद्र कुमार ने बताया कि पैक्स में धान देने के बावजूद अब तक भुगतान नहीं हुआ है। प्रति क्विंटल आठ किलो अधिक धान लिया जा रहा है। नंदलालपुर पंचायत के विनोद पांडे ने बताया कि इस बार पैक्स में धान की खरीद नहीं होने से उन्हें औने-पौने दाम पर धान बेचना पड़ा।सन्हौला: 4500 क्विंटल धान पड़ा है गोदामों में, किसान भुगतान के लिए लगा रहे चक्करसन्हौला ताड़र नहर में विभाग ने लाखों रुपया खर्च किया, बावजूद किसानों के खेत तक पानी नहीं पहुंच पाया। धान की सिंचाई भगवान भरोसे तो भू जलस्तर बहुत नीचे रहने के कारण 90 प्रतिशत किसान बोरिंग नहीं कर पाते हैं। रासायनिक खाद आसानी से उपलब्ध हो जाता है इसलिए कम्पोस्ट खाद के बजाय धान के किसान रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने पर मजबूर हैं। किसानों को धान बेचने के लिए उचित बाजार नहीं मिलता है। सोनूडीह के किसान राजकिशोर यादव ने बताया कि पैक्स में धान की कीमत भले ही 48 घंटे में देने का दावा किया जा रहा है, लेकिन हम जैसे किसानों को 20-25 दिन से पहले बेचे गये धान का भुगतान नहीं मिल पाया है। ऐसे में जरूरत पर स्थानीय व्यापारी या फिर बिचौलिए के हाथों औने-पौने दाम में धान बेचने को मजबूर होना पड़ता है। ताड़र के किसान समरेश सिंह ने बताया कि सहकारिता विभाग के अधिकारी की लापरवाही के कारण ताड़र में 700 क्विंटल, सन्हौला में 600 क्विंटल तो फरीदमपुर पैक्स और व्यापार मंडल के गोदाम में 3200 क्विंटल धान दो महीना से पड़ा हुआ है। कुछ का भुगतान हुआ और बाकी किसान भुगतान के लिए पैक्स पर दौड़ लगा रहे हैं।शाहकुंड में धान की खेती बन रही आर्थिक परेशानी का सबबप्रखंड के सरहा के किसान विनोद यादव ने बताया कि धान की खेती में बिचड़ा गिराने के समय पर सिंचाई के अभाव में बारिश के भरोसे धान की खेती करनी पड़ती है। इस पर कभी ज्यादा बारिश धान को डुबोती है तो कभी बाढ़ धान की फसल को डुबो देता है। किसी तरह अगर बिचड़ा तैयार हो गया तो धान की रोपनी में मजदूरों की कमी से दो-चार होना पड़ता है। अगर मजदूर मिल गया तो उसकी मजदूरी देने में जेब खाली हो जाती है। जिससे धान की खेती करना साल दर साल महंगी होती जा रही है। वहीं गंगा की बाढ़ या कम बारिश होने पर सुखाड़ की स्थिति से गुजरना पड़ता है। वहीं सूखाड़ या फिर बाढ़ से हुई फसलों के नुकसान का मुआवजा मिलने में इतनी तकलीफ होती है और इतने कायदे कानून बताये जाते हैं कि उसे पूरा करने में दम फूल जाता है। वहीं मुआवजा जब तक मिलता है, तब तक उधार लेकर अगले सीजन की खेती तक हो जाती है।सुल्तानगंज: पूंजी के अनुपात में नहीं मिल पा रहा दामप्रखंड में धान की खेती पर किसान कड़ी मेहनत और पूंजी लगाकर खेती करते हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के दौर में धान की खेती में लागत तो बढ़ती जा रही है। लेकिन महंगाई के अनुपात में जो मुनाफा मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है। भीरखुर्द पंचायत के किसान चंदन कुमार कहते हैं कि उचित सिंचाई की सुविधा एवं मजदूरों की उपलब्धता में कमी धान की खेती में परेशानी का कारण बनता है। धान की खेती करने में खाद की समस्या आई, जिससे अधिक दर पर खाद खरीदकर खेत में डालना पड़ा। तरैटा के किसान राजेश कुमार ने कहा कि किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या पटवन की होती है। नलकूप बंद है और नहरों का पता नहीं, ऐसे में धान की सिंचाई करने में जेब ढीली हो जाती है। इसके अलावा हम सबको बाढ़ एवं सूखाड़ का दंश झेलना पड़ता है।गोराडीह: धान की खेती के लिए सिंचाई बनी सबसे बड़ी बाधाआज के समय में किसानों के लिए धान की खेती करना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। मौसम की बेरुखी किसानों का कमर तोड़ रही है। समय पर मजदूर का न मिलना, महंगा बीज, उर्वरक पाना किसानों के लिए सिरदर्द बन रहा है। बाबजूद किसान जब कड़ी मेहनत और काफी खर्च कर जब धान की खेती करते हैं तो उसे अच्छा बाजार नहीं मिल पाता है। जिससे वह थक-हारकर अपना फसल औने-पौने दाम में बिचौलियों के हाथों बेचने को मजबूर होना पड़ता है। जगदीशपुर प्रखंड के अंगारी गांव के किसान बजरंगी यादव ने बताया कि धान की खेती की सबसे बड़ी समस्या सिंचाई की है। क्षेत्र के 80 प्रतिशत किसान धान की खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं। गोराडीह के किसान अजय सिंह ने बताया कि धान की फसल लगाते हैं तो कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़ की मार झेलनी पड़ती है। फसल जब तैयार हो जाता है तो बेचने में पसीने छूट जाते हैं। सरकार द्वारा पैक्स के माध्यम से घान की कीमत तो तय कर दी गई है। लेकिन धान औने-पौने दाम में बिचौलिए को ही बेचना पड़ता है। पैक्स पर जब धान खरीद शुरू होती है तब तक कई तरह के नियम और शर्तें थोप दिया जाता है। धान में नमी बताकर चार से पांच प्रतिशत तक धान की कटौती कर दी जाती है। साथ ही कमीशन अलग से वसूला जाता है।कोटआपदा पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन फसल की नुकसान पर उचित मुआवजा समय पर किसानों को मिल जाता है। खेती में जैविक खाद के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। अगर किसान को खाद, पानी, मुआवजा या फिर पैक्स की मनमानी पर कोई समस्या है तो संबंधित लिखित शिकायत करें, उचित कार्रवाई की जाएगी।-प्रेमशंकर प्रसाद, जिला कृषि पदाधिकारी भागलपुर
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