
बोले मुंगेर : धरहरा के किसान बाढ़, बिजली और नीलगाय के आतंक से त्रस्त
मुंगेर जिले के धरहरा प्रखंड के किसानों को खेती में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बाढ़, बिजली की कमी, खाद की कालाबाजारी और नीलगाय के हमलों के कारण किसान साल में केवल तीन महीने ही फसल उगा पाते हैं। सरकारी सहायता के बावजूद, किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर बनी हुई है।
बोले मुंगेर : धरहरा के किसान बाढ़, बिजली और नीलगाय के आतंक से त्रस्त

-प्रस्तुति: गौरव कुमार मिश्रा
मुंगेर जिले के धरहरा प्रखंड स्थित बाहचौकी और चौर बीघा मौजा के किसान आज भी अनेक कठिनाइयों के बीच खेती करने को विवश हैं। लगभग 2500 एकड़ भूमि में फैले इस क्षेत्र में खेती की स्थिति बाढ़, बिजली और वन्यजीवों की मार से प्रभावित है। यहां की अधिकांश भूमि छह महीने बाढ़ के पानी में डूबी रहती है, जिससे साल में केवल तीन महीने ही खेती हो पाती है। सीमित बिजली आपूर्ति, असमान बिल वसूली, खाद की कालाबाजारी और नीलगाय द्वारा फसलों की क्षति ने किसानों की कमर तोड़ रखी है। सरकारी योजनाओं और सहायता के बावजूद किसान आर्थिक रूप से लगातार संकट में हैं।
धरहरा प्रखंड के बाहाचौकी और चौर बीघा मौजा की पहचान उपजाऊ भूमि के रूप में रही है, लेकिन आज यह क्षेत्र समस्याओं से घिरा हुआ है। यहां की कुल लगभग 2500 एकड़ भूमि में केवल तीन महीने खेती होती है, क्योंकि छह महीने खेत बाढ़ के पानी में डूबे रहते हैं। ऐसी स्थिति में किसान केवल रबी फसल जैसे गेहूं, चना या मसूर की ही खेती कर पाते हैं। यह भी कई बार पिछात हो जाता है। किसानों का कहना था कि बिजली व्यवस्था हम किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। यहां के लगभग 100 किसान बिजली उपभोक्ता हैं, जिन्हें औसतन 820 रुपए प्रति माह बिल देना पड़ता है। यह राशि तब भी वसूली जाती है, जब किसान केवल तीन महीने ही बिजली का उपयोग कर पाते हैं। कई किसानों के खेतों तक बिजली के खंभे तक नहीं पहुंचे हैं, जिससे सिंचाई करना असंभव हो गया है। वहीं, जिन किसानों तक बिजली पहुंची है, वे भी अनियमित आपूर्ति और अधिक बिल के कारण परेशान हैं। यही नहीं, खाद की उपलब्धता भी हम किसानों के लिए बड़ी चिंता है। सरकार द्वारा निर्धारित 266 रुपए प्रति बोरी की दर पर खाद मिलनी चाहिए, लेकिन स्थानीय बाजार में किसान 325 रुपए तक में खाद खरीदने को मजबूर हैं। इससे लागत बढ़ जाती है और लाभ घट जाता है। इसके अतिरिक्त, नीलगाय की समस्या ने हम किसानों की नींद हराम कर रखा है। फसलों को भारी नुकसान पहुंचाने के बावजूद इन पर नियंत्रण की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। पिछले वर्ष प्रशासन द्वारा नीलगाय नियंत्रण अभियान चलाया गया था, लेकिन अब किसानों ने इस अभियान को पुनः शुरू करने की मांग की है। ज्ञात हो कि धरहरा प्रखंड के 13 पंचायतों में से केवल तीन में ही रबी फसल की बुआई हो पाती है।
सीमित बिजली उपयोग और अधिक बिल वसूली
किसान केवल तीन महीने ही सिंचाई के लिए बिजली का उपयोग कर पाते हैं, जबकि उन्हें पूरे वर्ष का बिल चुकाना पड़ता है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। कई खेतों तक बिजली के खंभे नहीं पहुंचे हैं, जिससे खेती असंभव हो गई है। बिजली विभाग को चाहिए कि, उपयोग के आधार पर मौसमी बिल व्यवस्था लागू करे ताकि किसानों पर अनुचित आर्थिक भार न पड़े।
खाद की कालाबाजारी व महंगी दरों से हलकान
सरकार द्वारा निर्धारित 266 रुपए प्रति बोरी दर के स्थान पर किसान बाजार में 325 रुपए में यूरीया खरीदने को विवश हैं। इससे खेती की लागत बढ़ जाती है और लाभ घट जाता है। प्रशासन को चाहिए कि, खाद की वितरण प्रणाली की सख्त निगरानी करे और किसानों को सरकारी दर पर ही खाद उपलब्ध कराए, ताकि वे न्यायसंगत लाभ प्राप्त कर सकें।
नीलगाय से फसलों की क्षति
गांवों में नीलगायों का बढ़ता आतंक किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। खेतों में तैयार फसलें रातोंरात बर्बाद हो जाती हैं। आलू, मटर, गेहूं और अरहर जैसी फसलें इन झुंडों के हमले से विशेष रूप से प्रभावित होती हैं। किसानों का कहना है कि उनकी महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में नष्ट हो जाती है, जिससे वे आर्थिक संकट में घिर जाते हैं। पिछले वर्ष प्रशासन ने नीलगायों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण के लिए अभियान चलाया था, जिससे कुछ राहत मिली थी। हालांकि, अभियान बीच में ही बंद कर दिया गया। इसके बाद से नीलगायों की संख्या फिर से तेजी से बढ़ने लगी है। खेतों में रात के समय झुंडों के आने से किसानों को न दिन नींद मिलती है न चैन। कई किसान अपने खेतों की रखवाली के लिए रातभर पहरा देते हैं, फिर भी फसल को पूरी तरह बचा पाना मुश्किल होता है। किसानों की मांग है कि शासन इस अभियान को दोबारा शुरू करे और वन विभाग के सहयोग से नीलगायों के नियंत्रण के स्थायी उपाय किए जाएं।
हमारी भी सुनें
साल में केवल तीन महीने ही खेती कर पाते हैं, फिर भी बिजली विभाग पूरे वर्ष का बिल भेज देता है। इससे आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है।
-वीर अभिमन्यु
लगभग छह महीने बाढ़ का पानी खेतों में भरा रहता है, उस दौरान बिजली भी काट दी जाती है, फिर भी बिजली विभाग पूरे महीने का बिल भेज देता है।
-विनोद
यहां के अधिकतर किसान बिजली बिल से परेशान हैं। हम लोग केवल रबी फसल की बुआई करते हैं, फिर भी पूरे वर्ष का बिल भेजा जाता है।
-रामदेव महतो
खेती के समय यूरिया खाद हमें सरकारी दर से अधिक कीमत पर खरीदनी पड़ती है और कई बार समय पर खाद उपलब्ध भी नहीं हो पाती।
-नवल महंतो
किसान की स्थिति हमेशा खराब रहती है। कभी सूखा तो कभी बाढ़ का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमारी समस्याओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
-मुकेश कुमार
साल में केवल एक ही फसल रबी की होती है, उसमें भी नीलगाय फसल को बर्बाद कर देती है, फिर भी वन विभाग कोई ठोस कदम नहीं उठाता।
-राकेश कुमार
हम लोग चना या मसूर की खेती ही कर पाते हैं, पर कई बार फसल नष्ट हो जाती है। बिजली व्यवस्था सही नहीं रहने से पटवन में कठिनाई होती है।
-वीर बहादुर
सरकार द्वारा तय 266 रुपये प्रति बोरी की जगह किसानों को बाजार में 325 रुपये देकर यूरिया खरीदना पड़ रहा है। निगरानी हो।
-अमरेंद्र कुमार
छह महीने तक खेतों में बाढ़ का पानी भरे रहने से केवल तीन महीने खेती हो पाती है। इससे किसान पूरे वर्ष आर्थिक रूप से कमजोर बने रहते हैं।
-नरेश महंतो
कई खेतों तक आज भी बिजली के खंभे नहीं पहुंचे हैं। किसान तीन महीने बिजली उपयोग करने के बावजूद पूरे साल का बिल भरने को मजबूर हैं।
-सुरेश सिंह
नीलगाय के झुंड खेतों की फसल बर्बाद कर रहे हैं, जबकि इस बार वन विभाग ने उनकी रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
-राजीव रंजन उर्फ डब्लू
100 किसान बिजली उपभोक्ता हैं, जिन्हें औसतन 820 रुपये प्रति माह बिल देना पड़ता है, जबकि बिजली उपयोग केवल तीन महीने ही होता है।
-उमेश मंडल
किसान कभी सूखा तो कभी बाढ़ का दंश झेलते हैं, फिर भी सरकार स्थायी समाधान नहीं निकाल रही है। केंद्र और राज्य दोनों को इस पर ध्यान देना चाहिए।
-अनिल कुमार
यूरिया की समय पर उपलब्धता नहीं होने और कालाबाजारी से किसान प्रभावित हैं। अगर खाद सरकारी दर पर समय से मिले तो किसान खुशहाल हो सकते हैं।
-अवधेश प्रसाद सिंह
धरहरा प्रखंड के किसान जलजमाव के कारण खेती नहीं कर पा रहे हैं, जिससे वे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। इस समस्या का जल्द निदान हो।
-सुनील कुमार सिन्हा
बिजली बिल किसानों की सबसे बड़ी समस्या है। खेत लगभग पांच महीने पानी में डूबे रहते हैं, फिर भी पूरे साल का बिल वसूला जाता है, जिससे किसान कर्ज में डूब रहे हैं।
-सफल किशोर सफल
बोले जिम्मेदार
किसानों को यदि इस तरह की समस्याएं आ रही हैं तो निश्चित रूप से उन्हें बाढ़ के समय बिजली विभाग को सूचना देनी चाहिए, ताकि उन्हें बिल से राहत मिल सके। उपभोक्ता दो प्रकार के होते हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने खेतों में मीटर लगवाएं। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि उन्होंने वास्तव में कितनी बिजली का उपयोग किया है और उन्हें केवल उसी के अनुसार बिल देना होगा।
-मनोज कुमार सिंह, एसडीओ, बिजली विभाग
शिकायत
1. क्षेत्र में छह महीने तक बाढ़ का पानी भरा रहने के कारण साल में केवल तीन महीने ही खेती संभव होती है।
2. किसानों के अनुसार कई खेतों तक बिजली के खंभे नहीं पहुंचे हैं।
3. सरकारी दर 266 रुपए प्रति बोरी तय है, लेकिन स्थानीय बाजार में किसानों को 325 रुपए तक की दर पर खाद खरीदनी पड़ती है।
4. नीलगाय के झुंड फसलों को नष्ट कर देते हैं, जिससे किसानों की मेहनत बेकार चली जाती है।
5. 13 पंचायतों में केवल तीन को ही रबी फसल के बीज मिल पाते हैं।
सुझाव
1. क्षेत्र में स्थायी जल निकासी की व्यवस्था की जाए, ताकि किसान खरीफ फसल भी उगा सकें।
2. किसानों से बिजली बिल उनकी उपयोग अवधि (तीन माह) के अनुसार लिया जाए।
3. सरकारी दर पर ही खाद मिले। पंचायत स्तर पर खाद वितरण केंद्र खोले जाएं।
4. वन विभाग और प्रशासन संयुक्त रूप से नीलगाय से फसलों की सुरक्षा के लिए अभियान चलाए।
5. सरकारी योजनाओं का लाभ सभी पंचायतों तक समान रूप से पहुंचाया जाए।

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