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जमुई :::::: शुरूआती चुनावों में प्रत्याशियों के नाम की बजाय पार्टियों की पहचान को अलग-अलग रंग की होती थीं मतपेटियां

जमुई :::::: शुरूआती चुनावों में प्रत्याशियों के नाम की बजाय पार्टियों की पहचान को अलग-अलग रंग की होती थीं मतपेटियां

संक्षेप:

1952 से झाझा विधान सभा के चुनावों में मतपेटियों पर उम्मीदवारों के नाम नहीं होते थे। अलग-अलग रंग की मतपेटियों से पार्टियों की पहचान होती थी। उस समय चुनावों में हिंसा या मतदाता खरीद-फरोख्त जैसी समस्याएं...

Wed, 22 Oct 2025 06:46 PMNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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शुरूआती चुनावों में प्रत्याशियों के नाम की बजाय पार्टियों की पहचान को अलग-अलग रंग की होती थीं मतपेटियां फोटो- : वयोवृद्ध शिवदत्त विश्वकर्मा, 90 वर्ष झाझा, निज संवाददाता 1952 से ही शुरू हुए झाझा विधान सभा के चुनावी राजनीति के सफर के शुरूआती चुनावों में मतपेटियों पर उम्मीदवारों के नाम नहीं हुआ करते थे। प्रत्याशियों के नाम की बजाय अलग-अलग रंग की मतपेटियों के जरिए उनकी पार्टियों की पहचान स्पष्ट की जाती थी। निर्दलीय के मामले में भी बैलट बॉक्स का रंग ही उनकी पहचान हुआ करता था। और....वोटर भी अपनी पसंद की पार्टी या नेता को वोट उस रंग की पेटी में डालकर किया करते थे।

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‘70 के दशक के पूर्व तक बूथ लूट जैसे वाकये कल्पना तक से कोसों दूर होते थे। कोई अप्रिय या हिंसक वारदात जैसी बातें भी शायद ही कभी होती थीं। इसलिए सुरक्षा के भी कोई तामझाम नहीं होते थे। शहरी क्षेत्र में पक्के भवनों में और ग्रामीण अंचल में तो केवल चार खूंटे व उस पर कपड़ा लगाकर मतदान करा लिया जाता था। और....मतदान के बाद मतपेटियों भी पुलिस के चौकीदार ही नियत स्थल पर ले जाते थे। उसके साथ कंडीडेट या उसके लोग भी साथ हो लिया करते थे। किंतु सुरक्षाकर्मियों के साथ की जरूरत महसूस नहीं होती थी। मतदाता किसी भी दल के समर्थक रहे हो,किंतु सभी आपस में हंसी-ठिठोली करते हुए बड़े उत्साह के साथ मतदान करते थे। लोकतंत्र के इस महापर्व को तब के मतदाता से ले सियासी लोग तक भी सही मायनों में महापर्व के बतौर मनाते थे। यदि किसी उम्मीदवार को अपने प्रतिद्धंदी की कोई हरकत नागवार गुजरती थी तो सामाजिक अंदाज में सीधे उसके पास जाकर कहते थे,जिसे वह सुधारता भी था। वोटरों की खरीद फरोख्त या उन्हें गलत तरीकों से लुभाने जैसी बुराइयों से भी पूरी तरह दूर होते थे तब के चुनाव। ------------------- कहते हैं साहित्यकार प्रो.गौरीशंकर पासवान जमुई। राजीव कुमार चुनाव न केवल सत्ता का खेल है, बल्कि यह लोकतंत्र का एक उत्सव भी है। यह एक ऐसा अवसर है जब आम जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपने नेताओं का चयन करती है और देश की दिशा तय करती है। चुनाव के दौरान लोग अपने-अपने दलों और उम्मीदवारों के समर्थन में जुट जाते हैं, और यह एक तरह से लोकतांत्रिक उत्सव का माहौल बन जाता है। लोग अपने विचारों और राय को साझा करते हैं, और यह एक तरह से राष्ट्रीय संवाद का भी अवसर होता है। उम्मीदवार अपने समर्थकों के साथ घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क करते हैं। उम्मीदवार और उनके समर्थक बड़ी संख्या में इकट्ठे होकर अपने विचारों और वादों को साझा करते हैं। मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट देते हैं। चुनाव के इस उत्सव में भाग लेकर हम अपने लोकतंत्र को मजबूत बना सकते हैं और देश के भविष्य को आकार देने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।