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बोले कटिहार : दफ्तरों की दहलीज पर ठिठके दिव्यांगों के सपने

बोले कटिहार : दफ्तरों की दहलीज पर ठिठके दिव्यांगों के सपने

संक्षेप:

कटिहार जिले में दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना मुश्किल हो रहा है। आवास, राशन, पहचान, रोजगार और शिक्षा के लिए दिव्यांगों को अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

Feb 03, 2026 12:35 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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-प्रस्तुति: ओमप्रकाश अम्बुज, मोना कश्यप

कटिहार जिले में दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अनेक योजनाएं संचालित हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन योजनाओं के उद्देश्यों से बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है। कागजों में मजबूत दिखने वाली व्यवस्था व्यवहार में दिव्यांगों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रही है। आवास, राशन, पहचान, रोजगार और शिक्षा हर मोर्चे पर दिव्यांग जन खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस कर रहे हैं। दिव्यांगों का कहना है कि योजनाओं का लाभ पाने के लिए उन्हें बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। आवेदन, सत्यापन और तकनीकी शर्तों की जटिल प्रक्रिया उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है। बैटरी चालित साइकिल, जो कई दिव्यांगों की आजीविका और आवाजाही का मुख्य साधन है, खराब होने के बाद अनुपयोगी हो चुकी है। जिले में इसकी मरम्मत के लिए कोई अधिकृत कार्यशाला या व्यवस्था नहीं है। नतीजतन कई साइकिलें कबाड़ में तब्दील हो रही हैं और दिव्यांग फिर से दूसरों पर निर्भर होने को मजबूर हैं। राशन कार्ड का मामला भी कम चिंताजनक नहीं है। एकल दिव्यांगों के लिए राशन कार्ड बनवाना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। कार्यालयों में कभी नियमों का हवाला दिया जाता है तो कभी नई प्रक्रिया बताकर लौटा दिया जाता है। अंत्योदय योजना से दिव्यांगों को बाहर रखा जाना सामाजिक न्याय की भावना पर गंभीर सवाल खड़े करता है। दिव्यांगों का तर्क है कि जब वे पहले से ही आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर हैं, तो उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि योजनाओं से बाहर किया जाना। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी दिव्यांगों में गहरी निराशा है। कई पात्र दिव्यांगों को यह कहकर लाभ से वंचित कर दिया गया कि वे तकनीकी शर्तें पूरी नहीं करते। दिव्यांगों का कहना है कि ये शर्तें उनकी वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं हैं। जिनके पास न स्थायी आय है और न ही मजबूत दस्तावेजी आधार, वे कागजी मानकों में ही उलझकर रह जाते हैं। पहचान से जुड़ा यूडीआईडी कार्ड दिव्यांगों के लिए अन्य योजनाओं की चाबी माना जाता है, लेकिन इसे बनवाने की प्रक्रिया ही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। सदर अस्पताल में प्रक्रिया की धीमी गति, अव्यवस्था और कथित अनियमितताओं के कारण महीनों तक आवेदन लंबित रहते हैं। पहचान पत्र के अभाव में दिव्यांग कई योजनाओं से स्वतः बाहर हो जाते हैं। रोजगार और प्रशिक्षण के क्षेत्र में स्थिति और भी चिंताजनक है। जीविका जैसी योजनाओं के बावजूद दिव्यांगों को स्वरोजगार से जोड़ने के प्रयास बेहद कमजोर हैं। विशेष दिव्यांग बच्चों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित हो रही है। सहायक उपकरणों की मरम्मत के लिए जिले में कोई कार्यशाला नहीं होने से छोटे उपकरण भी खराब होने पर पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। दिव्यांग जनों का साफ कहना है कि नई योजनाओं की घोषणा से ज्यादा जरूरी है मौजूदा योजनाओं का संवेदनशील और जवाबदेह क्रियान्वयन। जब तक प्रशासनिक स्तर पर इच्छाशक्ति, समन्वय और मानवीय दृष्टिकोण नहीं दिखेगा, तब तक दिव्यांगों का सशक्तिकरण सिर्फ फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा। कटिहार में आज भी दिव्यांग सम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए जूझ रहे हैं और यह स्थिति प्रशासन से ठोस पहल की मांग कर रही है। बैटरी चालित साइकिल कभी दिव्यांगों के लिए आजादी का प्रतीक थी। उसी साइकिल के सहारे वे काम पर जाते थे, बाजार तक पहुंचते थे और अपनी रोज़मर्रा की जरूरतें खुद पूरी करते थे। लेकिन कटिहार में आज यही साइकिलें खराब होकर घर के कोने या कबाड़ में पड़ी । अधिकृत व्यवस्था नहीं होने से एक छोटी खराबी पूरे जीवन को थाम देती है।

यूडीआईडी की कतार में खड़े दिव्यांग

दिव्यांग जनों के लिए यूडीआईडी कार्ड सिर्फ पहचान पत्र नहीं, बल्कि हर सरकारी योजना की चाबी है। लेकिन कटिहार में यही चाबी सबसे मुश्किल से मिलने वाली चीज बन गई है। सदर अस्पताल में आवेदन करने के बाद महीनों तक फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। दिव्यांग रोज़ उम्मीद लेकर पहुंचते हैं और निराश लौट आते हैं।पहचान पत्र के अभाव में राशन, पेंशन, आवास और रोजगार जैसी योजनाओं के दरवाजे अपने आप बंद हो जाते हैं। कई दिव्यांगों का कहना है कि वे हर जगह एक ही जवाब सुनते हैं। पहले यूडीआईडी बनवाइए। दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते दिव्यांग शारीरिक और मानसिक रूप से टूटने लगते हैं। उनके लिए लंबी लाइन में खड़ा रहना आसान नहीं होता, फिर भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।

साइकिल मरम्मत की सुविधा नहीं

दिव्यांग बताते हैं कि साइकिल खराब होने के बाद उनकी आवाजाही पूरी तरह रुक गई। कई लोग जो छोटी-मोटी दुकान, ठेला या निजी काम से जुड़े थे, वे फिर से घर पर बैठने को मजबूर हो गए। परिवार पर निर्भरता बढ़ी और आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंची। नई साइकिल मिलने की उम्मीद भी धुंधली नजर आती है। सबसे पीड़ादायक यह है कि इस समस्या का समाधान जटिल नहीं है। अगर जिले में एक मरम्मत केंद्र या मोबाइल रिपेयर यूनिट भी होती, तो सैकड़ों दिव्यांग दोबारा सक्रिय जीवन जी सकते थे। लेकिन व्यवस्था की उदासीनता ने उनकी रफ्तार छीन ली है। जो साधन उन्हें दिए गए थे, वही जब बेकार हो जाएं और उन्हें ठीक कराने की कोई राह न हो, तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता बन जाती है।

दिव्यांगों को रोजगार व प्रशिक्षण से जोड़ने की ठोस पहल नहीं

सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, लेकिन कटिहार के दिव्यांगों के लिए आत्मनिर्भरता अब भी सपना बनी हुई है। जीविका जैसी योजनाएं मौजूद हैं, पर दिव्यांगों को रोजगार और प्रशिक्षण से जोड़ने की ठोस पहल नजर नहीं आती। काम सीखने और कमाने का मौका न मिलने से वे हमेशा सहायता पर निर्भर रह जाते हैं। विशेष दिव्यांग बच्चों की स्थिति और भी चिंताजनक है। प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। शिक्षा के अभाव में भविष्य के अवसर और सीमित हो जाते हैं। यह केवल वर्तमान की नहीं, आने वाली पीढ़ी की भी समस्या है। सहायक उपकरण खराब होने पर मरम्मत की सुविधा न होने से दिव्यांगों की कार्यक्षमता और घट जाती है। छोटे-छोटे साधन, जो उन्हें आत्मनिर्भर बना सकते थे, बेकार हो जाते हैं। दिव्यांगों का कहना है कि अगर रोजगार, शिक्षा और तकनीकी सहायता को एक साथ जोड़ा जाए, तो वे भी समाज की मुख्यधारा में आ सकते हैं। फिलहाल योजनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन दिव्यांगों का संघर्ष एक ही-सम्मान के साथ जीने का।

शिकायत

1. योजनाओं का लाभ पाने के लिए दिव्यांगों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

2. बैटरी चालित साइकिल खराब होने पर मरम्मत की कोई व्यवस्था नहीं है। आवाजाही रुक जाती है।

3. यूडीआईडी कार्ड बनाने में महीनों की देरी होती है। जिससे योजनाओं से भी वंचित रह जाते हैं।

4. एकल दिव्यांगों को अंत्योदय से बाहर रखा जा रहा है। इससे भोजन पर संकट खड़ा हो गया है।

5. रोजगार, प्रशिक्षण और विशेष शिक्षा के क्षेत्र में प्रशासनिक उदासीनता साफ दिखती है।

सुझाव

1. बैटरी चालित साइकिल की मरम्मत के लिए जिला में अधिकृत कार्यशाला तुरंत स्थापित की जाए

2. कार्ड बनाने की प्रक्रिया को पारदर्शी किया जाए। अस्पताल में दिव्यांगजनों के लिए अलग से काउंटर बनाए जाएं।

3. एकल दिव्यांगों को अंत्योदय में प्राथमिकता दी जाए। शर्तों को सरल और व्यवहारिक बनाने से लाभ मिलेगा

4. प्रधानमंत्री आवास योजना में दिव्यांगों के लिए अलग मानक और विशेष कोटा तय किया जाए, तभी लाभ मिलेगा।

5. जीविका और अन्य योजनाओं के तहत दिव्यांगों के लिए रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण शुरू किया जाए, ताकि लाभ मिले।

हमारी भी सुनें

सरकारी योजनाओं की बात सुनकर उम्मीद जरूर जगती है, लेकिन हकीकत में हमें सिर्फ कागजी औपचारिकताओं का सामना करना पड़ता है। बैटरी साइकिल खराब होने के बाद मेरी आवाजाही पूरी तरह रुक गई है। दफ्तरों में बार-बार जाने के बाद भी समाधान नहीं मिलता। अगर समय पर मरम्मत और सहायता मिल जाए, तो हम भी सम्मान के साथ जीवन जी सकते हैं।

— लूखरी देवी

दिव्यांग होने के कारण रोजगार पहले ही सीमित है, ऊपर से योजनाओं तक पहुंच और कठिन बना दी गई है। यूडीआईडी कार्ड के लिए महीनों से आवेदन पड़ा है। बिना पहचान पत्र के हर जगह रोक दिया जाता है। अगर प्रक्रियाएं सरल हों और समयबद्ध काम हो, तो दिव्यांगों को भी आत्मनिर्भर बनने का मौका मिल सकता है।

— राजीव कुमार सिंह

राशन कार्ड बनवाने के लिए कई बार प्रखंड कार्यालय गया, लेकिन हर बार नया नियम बता दिया गया। एकल दिव्यांग होने के बावजूद अंत्योदय योजना से बाहर हूं। भोजन जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भटकना सबसे ज्यादा पीड़ा देता है। सरकार को दिव्यांगों की स्थिति समझनी चाहिए।

— माया नंद यादव

प्रधानमंत्री आवास योजना में नाम होने के बाद भी तकनीकी कारण बताकर लाभ नहीं दिया गया। दिव्यांगों के लिए बनाई गई शर्तें व्यवहारिक नहीं हैं। हमारे लिए कागज जुटाना आसान नहीं होता। अगर नियमों में थोड़ी मानवीय सोच जुड़ जाए, तो कई बेसहारा लोगों को छत मिल सकती है।

— विंदेश्वरी शर्मा

बैटरी चालित साइकिल ही मेरी रोज़ी-रोटी का सहारा थी। अब वह खराब पड़ी है और मरम्मत की कोई जगह नहीं है। नई साइकिल मिलने की उम्मीद भी नहीं दिखती। बिना साधन के घर से निकलना मुश्किल हो गया है। इससे आत्मसम्मान पर भी गहरा असर पड़ता है।

— मुन्ना साह

सरकार कहती है कि दिव्यांगों के लिए कई योजनाएं हैं, लेकिन हमें उनका लाभ नहीं दिखता। कार्यालयों में संवेदनशीलता की भारी कमी है। हर जगह लाइन और इंतजार ही मिलता है। अगर अधिकारी हमारी परेशानी को समझें, तो आधी समस्या अपने आप खत्म हो सकती है।

— बंटी कुमारी

यूडीआईडी कार्ड के बिना कोई भी योजना पूरी नहीं होती। सदर अस्पताल में बार-बार जाने के बाद भी काम आगे नहीं बढ़ता। महीनों से फाइल अटकी है। पहचान नहीं होने की वजह से मैं हर योजना से बाहर हो गई हूं। यह स्थिति बेहद निराशाजनक है।

— बेगम खातून

दिव्यांगों के लिए रोजगार और प्रशिक्षण की बात सिर्फ कागजों में है। जीविका जैसी योजनाओं में हमारा नाम जोड़ने की कोई ठोस पहल नहीं दिखती। काम सीखने और कमाने का मौका मिले, तो हम भी दूसरों पर निर्भर नहीं रहेंगे।

— राज खान

विशेष दिव्यांग बच्चों के लिए प्रशिक्षित शिक्षक नहीं होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो तो निजी व्यवस्था भी संभव नहीं होती। शिक्षा ही भविष्य का सहारा है, लेकिन वही सबसे कमजोर कड़ी बन गई है।

— काली चरण

सरकारी दफ्तरों में दिव्यांगों के लिए अलग सुविधा नहीं है। लाइन में घंटों खड़ा रहना हमारे लिए आसान नहीं होता। अगर अलग काउंटर और सहायता कर्मी हों, तो काम तेजी से हो सकता है। सम्मान के साथ सेवा मिलना हमारा हक है।

— मो. इज़राइल

अंत्योदय योजना से दिव्यांगों को बाहर रखना समझ से परे है। हम सबसे कमजोर हैं, फिर भी प्राथमिकता नहीं मिलती। राशन की असुरक्षा से पूरा परिवार प्रभावित होता है। यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है।

— किशन राय

सहायक उपकरण खराब होने पर पूरा जीवन ठहर सा जाता है। छोटी खराबी के कारण उपकरण बेकार हो जाता है क्योंकि मरम्मत की व्यवस्था नहीं है। अगर जिले में कार्यशाला हो, तो दिव्यांगों को बड़ी राहत मिल सकती है।

— सीताराम महलदार

योजनाओं की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है उनका सही क्रियान्वयन। बार-बार आवेदन और सत्यापन से हम थक जाते हैं। एक ही जगह सभी सुविधाएं मिल जाएं, तो दिव्यांगों का भरोसा सिस्टम पर लौट सकता है।

— महेश चौहान

दिव्यांग होने के कारण पहले ही समाज में कई चुनौतियां हैं। जब सरकारी सहायता भी समय पर नहीं मिलती, तो हौसला टूटने लगता है। हमें सहानुभूति नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में सुविधा चाहिए।

— मानती देवी

बोले जिम्मेदार

दिव्यांगजनों की सुविधा और सशक्तिकरण विभाग की प्राथमिकता है। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समय-समय पर शिविर लगाकर ट्राई साइकिल वितरण एवं उससे जुड़े मामलों का त्वरित निष्पादन किया जाता है। प्रधानमंत्री आवास योजना एवं राशन कार्ड से संबंधित मामलों में पात्र दिव्यांगजन संबंधित विभाग में आवेदन कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यदि किसी दिव्यांगजन को किसी प्रकार की असुविधा या समस्या होती है तो वे सीधे सामाजिक सुरक्षा कोषांग कार्यालय में आकर संपर्क करें। विभाग द्वारा हर संभव सहयोग और त्वरित सहायता सुनिश्चित की जाएगी। विभाग की पूरी कोशिश है कि जिले के किसी भी दिव्यांगजनों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

-यशस्वी, सहायक निदेशक, सामाजिक सुरक्षा कोषांग, कटिहार

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