भागलपुर में छोटी नदियां सूखीं तो यहां की अर्थव्यवस्था भी सूख गई

Jan 09, 2026 01:10 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
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लोगो/अभियान कभी ये नदियां आसपास के समुदायों की आजीविका का स्रोत भी होती थीं मछुआरे

भागलपुर में छोटी नदियां सूखीं तो यहां की अर्थव्यवस्था भी सूख गई

भागलपुर, मुख्य संवाददाता। भागलपुर में छोटी नदियां सूखीं तो यहां की अर्थव्यवस्था ही सूख गई। मशहूर व्यापारी चंद्रधर सौदागर (चांदो सौदागर) इसी धरती से चंपा नदी के सहारे पूरे पूर्वोत्तर भारत में कारोबार करते थे। नाथनगर में बड़े-बड़े नाव और जहाज से अनाज और रेशम कपड़े का कारोबार होता था। भागलपुर के मुहाने पर कुरसेला में दो बड़ी नदी कोसी और गंगा का संगम होता है। लेकिन इन दोनों नदियों से फूटी धारा करीब आधा दर्जन सहायक नदियों का उद्गम केंद्र बना। जो हजारों परिवार की आजीविका का साधन होता था। नदी किनारे के गांवों में बसे लोग मछली मारकर आजीविका चलाते थे।

मछली की शिकारमाही होने से जाल बुनने वालों को भी काम मिल जाता था। नदियों में पानी की प्रचूरता थी तब धोबी उसमें कपड़ा धोकर आजीविका चलाते थे। नदियां सूखीं तो नाव भी किनारे हो गया। इससे लकड़ी वाले और नाविकों का कारोबार बर्बाद हो गया। गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े उदय बताते हैं, गंगा में बेलगाम विकास के चलते गाद बढ़ती जा रही है। जिससे बड़ी नदियों का पानी छोटी नदियों में सिर्फ बरसात में ही जा पाता है। यही वजह है कि जिले की तमाम सहायक नदियां बरसाती बनकर रह गई हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण चंपा नदी है। गंगा मुक्ति आंदोलन के योगेंद्र सहनी बताते हैं, कभी भागलपुर मछलियों के व्यापार से समृद्ध था। गंगा में जलकर देने के बाद भी मछली कारोबार ठीक-ठाक था। लेकिन सुल्तानगंज से कहलगांव तक डॉल्फिन क्षेत्र घोषित होने के बाद शिकारमाही पूरी तरह बंद हो गई है। सुनिश्चित हो कि छोटी नदियों में सालोंभर पानी रहे आंदोलन से जुड़े रामकिशोर बताते हैं, छोटी नदियां सूखने से मल्लाह, धोबी, कुम्हार आदि जाति के लोग पुश्तैनी धंधे से विमुख हो गए। वे आजीविका के लिए दूसरे धंधे करने लगे। जल श्रमिक संघ से जुड़े गौतम कुमार की सरकार से मांग है कि सिर्फ गंगा-कोसी से गाद निकालने से कल्याण नहीं हो पाएगा। बल्कि सहायक और छोटी नदियों में सालों भर पानी रहे, यह सुनिश्चित भी करना होगा। ताकि भूजल स्तर बेहतर रहे और नदी से सालों भर कारोबार होता रहे। कई गांवों के खेत बंजर हो गये उदय बताते हैं, कजरैली, शाहकुंड आदि क्षेत्र में कई गांवों में सूखे की स्थिति रहती है। नदी धारा का क्षेत्र बालू-मिट्टी से भर गया है। लेकिन बालू के कारण खेती नहीं हो रही है। ये जमीन बंजर हो गई है। सरकार को चाहिए कि तमाम छोटी नदियों में सालों भर पानी भरा रहे, इसके लिए योजना बनाएं। नदी में पानी रहने से मछली कारोबार फिर से खड़ा हो जाएगा। कइयों को रोजगार मिल जाएगा।

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