
बोले सहरसा : वित्तरहित शिक्षकों के बुढ़ापे का जीवन अनुदान पर टिका
कोसी दियारा क्षेत्र के वित्तरहित कॉलेजों में शिक्षकों को आर्थिक संकट, असुरक्षा और सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश शिक्षक 60 वर्ष से ऊपर हैं और सेवानिवृत्ति पर उन्हें कोई पेंशन या सुरक्षा नहीं मिलती
सलखुआ/ धर्मेंद्र कुमार
कोसी दियारा क्षेत्र में कई वित्तरहित कॉलेज आज भी लाखों की आबादी के बीच उच्च शिक्षा का एकमात्र सहारा बने हुए हैं। इन कॉलेजों ने पिछले कई दशकों में हजारों छात्रों का भविष्य गढ़ा है, अनेक पीढ़ियों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। लेकिन विडंबना यह है कि इन संस्थानों को जीवित रखने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों का खुद का जीवन आज भी संकट, उपेक्षा और असुरक्षा में घिरा है। उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुच चुके कई शिक्षकों के लिए सेवानिवृत्ति सम्मान नहीं, बल्कि नई कठिनाइयों की शुरुआत है। इन कॉलेजों में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षकों की आयु 60 वर्ष से ऊपर हो चुकी है, लेकिन न उनके लिए पेंशन का प्रावधान है, न कोई मासिक वेतन, न स्वास्थ्य सुविधा, न पारिवारिक सुरक्षा। उन्हें पूरे वर्ष की सेवा के बदले केवल एक बार मिलने वाला अनुदान ही जीवन-निर्वाह का साधन है, जो इतनी अल्प राशि होती है कि घर-परिवार के मूल खर्च भी पूरे नहीं हो पाते। बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी, इलाज, हर मोड़ पर उन्हें कर्ज या साहूकार की शरण लेनी पड़ती है। वित्तरहित कॉलेजों में वर्षों से नई नियुक्तिया बंद हैं। एक–एक कर शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन उनकी जगह भरने की प्रक्रिया पूरी तरह रुकी हुई है। इससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है और सेवा में बचे शिक्षकों पर दोहरा बोझ बढ़ गया है। फिर भी उन्हें न नौकरी की सुरक्षा है, न भविष्य की गारंटी। कोसी दियारा के वित्तरहित कॉलेजों की स्थिति सिर्फ एक क्षेत्र का दर्द नहीं, बल्कि पूरे बिहार की शिक्षा प्रणाली की वास्तविकता है। चार दशक तक समाज को ज्ञान देने वाले शिक्षक आज असुरक्षा, आर्थिक संकट और सरकारी उपेक्षा के बीच जीवन काट रहे हैं। अब समय है कि सरकार संवेदनशीलता दिखाए और इन वास्तविक ज्ञानयोगियों को उचित सम्मान व सुरक्षा दे।
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संसाधनों की कमी के बावजूद नहीं रुका पठन–पाठन
इन कॉलेजों में वर्षों तक भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और संसाधनों की भारी कमी रही, लेकिन शिक्षकों ने कभी पढ़ाई को रुकने नहीं दिया। टुटे–फूटे कमरों, कम वेतन और बिना सुविधा के बावजूद उन्होंने छात्रों के भविष्य को संवारने में कोई कमी नहीं छोड़ी। आज अनेक विद्यार्थी बड़े – बड़े पदों पर कार्यरत हैं। मगर वही शिक्षक जिन्होंने उन्हें राह दिखाई आज बुढ़ापे में असुरक्षा और अभाव में समय काटने को मजबूर हैं। शिक्षक कहते है कि हमने पूरी उम्र विद्यार्थियों को दी, समाज को दिया, लेकिन बदले में हमें असुरक्षा मिली। सेवा की लौ में हम जलते रहे, और वृद्धावस्था में उपेक्षा की आग हमें झुलसा रही है। वर्षों से सरकारें कॉलेजों के सरकारीकरण का भरोसा देती रहीं, फाइलें बनीं, बैठकें हुईं, घोषणाए हुईं, परंतु जमीन पर कुछ नहीं बदला। शिक्षक और कर्मचारी आज भी मान्यता प्राप्त तो हैं, लेकिन नियमित नहीं। उन्हें सम्मान तो मिला, लेकिन सुरक्षा नहीं।शिक्षकों का कहना है कि शायद हमारी पीढ़ी को न्याय न मिले, लेकिन आने वाले शिक्षकों को इस असमानता से मुक्ति मिलनी चाहिए। यह लड़ाई हमारी नहीं, पूरे बिहार की शिक्षा व्यवस्था की लड़ाई है। कोसी दियारा के अधिकांश वित्तरहित कॉलेजों का हाल समान है। साल में मिलने वाला अनुदान थोड़ी राहत देता है, लेकिन महीनों बाद वही संघर्ष फिर शुरू हो जाता है। कर्ज बढ़ता जाता है, परिवार की जरूरतें पूरी नहीं होतीं, और बुढ़ापा तनाव और अवसाद में बदलने लगता है।
---शिकायतें
1. शिक्षकों ने 30–40 वर्ष सेवा की, लेकिन सेवानिवृत्ति पर उन्हें कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती। न पेंशन, न प्रोविडेंट फंड, न ग्रेच्युटी, सबकुछ शून्य।
2. परिवार के मूल खर्च, बच्चों की पढ़ाई या इलाज संभव नहीं हो पाते। उन्हें यह व्यवस्था पूरी तरह अनुपयोगी लगती है। शिक्षकों का कहना है कि यह सम्मानजनक जीवन के खिलाफ है।
3. कई विषयों में शिक्षक नहीं बचे, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित हो रही है। पुराने शिक्षकों पर अतिरिक्त भार बढ़ गया है। कक्षाओं और परीक्षाओं का संचालन प्रभावित होता है।
4. बुढ़ापे में आय के स्रोत समाप्त हो जाते हैं। बेटी की शादी, इलाज और आपात स्थिति में कर्ज ही एकमात्र विकल्प बन जाता है। कर्ज का बोझ कई परिवारों को तोड़ देता है।
5. सरकारें वर्षों से सरकारीकरण का दावा करती रहीं, लेकिन फाइलें आज भी दफ्तरों में धूल खा रही हैं। नीतिगत बदलाव की नीयत नहीं दिखती।
---सुझाव
1. सरकारीकरण ही शिक्षकों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।इससे शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी।बिना सरकारीकरण के समस्या स्थाई रूप से दूर नहीं होगी।
2. बुढ़ापे में पेंशन सबसे बड़ा सहारा होती है। चिकित्सा सहायता प्रत्येक कर्मचारी का अधिकार है।इससे उनकी जीवन–गुणवत्ता सुधरेगी। सरकार को इसके लिए विशेष नीति बनानी चाहिए।
3. नए शिक्षक आने से शिक्षा का स्तर सुधरेगा। पुराने शिक्षकों का भार कम होगा। कॉलेजों में शैक्षणिक माहौल सुदृढ़ होगा। यह शिक्षा व्यवस्था को स्थिर बनाएगा।
4. मासिक अनुदान से परिवार की जरूरतें नियमित रूप से पूरी होंगी। कर्ज पर निर्भरता कम होगी। शिक्षक आर्थिक रूप से स्थिर रहेंगे। यह व्यवस्था अधिक मानवीय और व्यावहारिक होगी।
5. मॉनिटरिंग से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी। कर्मचारियों की समस्याए समय पर सुनी जाएगी। कमी–कमजोरिया दूर होंगी। कॉलेजों का संचालन पारदर्शी बनेगा।
---हमारी भी सुनो
1. हमने पूरी जिंदगी समाज के लिए पढ़ाया, पर वृद्धावस्था में कोई सहारा नहीं। न पेंशन है, न स्वास्थ्य सुविधा। कर्ज पर निर्भर होकर जीना पड़ रहा है। बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो जाती है।क्या यही हमारी सेवा का सम्मान है?
- लालकांत राय
2. हमने हर कठिन परिस्थिति में पढ़ाई नहीं रुकने दी, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद हमारी सुरक्षा पर कोई नीतिगत चर्चा भी नहीं। यह उपेक्षा दुख देती है। हमने पीढ़िया बनाई, पर हमारी पीढ़ी बिखर रही है। सरकार को जागना चाहिए।
- मिथलेश कुमार राय
3. बिना संसाधन के पढ़ाना बहुत कठिन है। भवन, लैब, पुस्तकालय का अभाव छात्रों को रोक रहा है। हम पूरी मेहनत करते हैं लेकिन हमें भविष्य की चिंता सताती है। नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। वरना शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा।
- रजनीश कुमार
4. मेरी उम्र हो गई है। आय का कोई साधन नहीं बचा।बीमारी बढ़ रही है, दवा खरीदना मुश्किल है।सरकार कब तक हमें अनदेखा करेगी? हम बस सम्मान भरा बुढ़ापा चाहते हैं।
- रामभरोस महतो
5. हमने छात्रों को संस्कार और शिक्षा दी।लेकिन हमारे अपने बच्चों की पढ़ाई कर्ज पर चल रही है।यह कटु सत्य है कि हम खुद असुरक्षित हैं।सरकारीकरण ही समाधान है।अन्यथा यह शिक्षा तंत्र टूट जाएगा।
- रामदेव महतो
6. लैब के बिना विज्ञान कैसे पढ़ाए? फिर भी हम कोशिश करते हैं कि छात्र पीछे न रहें।लेकिन हमें भी स्थायित्व चाहिए।हम भी इंसान हैं, मशीन नहीं।सरकार को हमारी स्थिति समझनी होगी।
- शत्रुघ्न साह
7. शिक्षक हमारी रीढ़ हैं। उनकी स्थिति खराब होगी तो शिक्षा कैसे अच्छी होगी? हमें सभी विषयों के शिक्षक नहीं मिलते। कई कक्षाए बंद रहती हैं।सरकार को तुरंत कदम लेना चाहिए।
- चांसू कुमारी
8. हमने देखा है कि शिक्षक कठिन परिस्थितियों में पढ़ाते हैं।लेकिन उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखती है। उन्हें पेंशन और सुविधा मिलनी चाहिए।हम उनके भविष्य को सुरक्षित देखना चाहते हैं।
- पूजन कुमारी
9. नई नियुक्ति न होने से कई विषय अधूरे रह जाते हैं।एक शिक्षक चार–चार विषय संभालते हैं।यह शिक्षा के साथ अन्याय है।
- सोनी कुमारी
10. कंप्यूटर, लैब, पुस्तकालय सबकी कमी है।फिर भी शिक्षक प्रयास करते हैं।लेकिन उनकी स्थिति देखकर दुख होता है।उन्हें मासिक वेतन मिलना चाहिए।तभी शिक्षा मजबूत होगी।
- रौनी कुमारी
11. शिक्षकों के मन में असुरक्षा है।फिर भी वे पढ़ाते हैं।यह उनके समर्पण का प्रमाण है।सरकार को उन्हें सुरक्षा देनी चाहिए।वरना यह शिक्षा तंत्र ढह जाएगा।
- सपना
12. हमारे बच्चे इन्हीं कॉलेजों से पढ़े हैं।शिक्षकों ने बड़ा योगदान दिया है।लेकिन उनका हाल देखकर दिल दुखता है।सरकार को उनकी सुध लेनी चाहिए।यह सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
- मंजीता कुमारी
13. शिक्षक इज्जत के हकदार हैं। लेकिन उन्हें सुविधा नहीं मिलती।कर्ज लेकर जीवन जीना पड़ता है।यह गलत है।सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए।
- मौसम कुमारी
14. हमने शिक्षकों को वर्षों से संघर्ष करते देखा है।उन्होंने गांव के बच्चों को आगे बढ़ाया।लेकिन उनकी अपनी हालत अच्छी नहीं।पेंशन मिलना ही चाहिए। हम उनके साथ हैं।
- मुन्नी कुमारी
15. कोसी दियारा के कॉलेजों में सुधार जरूरी है।भवन और शिक्षक दोनों कम हैं।युवा पीढ़ी इसका नुकसान उठा रही है।सरकार को इसे प्राथमिकता देनी चाहिये।
- प्रीति कुमारी
16. यह सिर्फ एक कॉलेज का मामला नहीं। पूरे बिहार का मसला है।शिक्षक सुरक्षित होंगे तो शिक्षा सुरक्षित होगी।अनुदान प्रणाली बदलनी चाहिए।सरकार को ठोस कदम उठाना होगा।
- राहत कुमारी
बोले जिम्मेदार
वित्त रहित शिक्षक एवं कर्मी की समस्या सरकार के नजर में है। उनके स्तर से भी प्रयास किया जाएगा। इन लोगों की समस्याओं को सरकार केसामने रखा जाएगा।
राजेश वर्मा, सांसद, खगड़िया

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