बोले भागलपुर: होली मनाने के तरीके बदले लेकिन मालपुआ और दहीबड़ा का जलवा बरकरार
होली का त्योहार शहरों और गांवों में धूमधाम से मनाया जा रहा है। महिलाएं पारंपरिक व्यंजनों जैसे मालपुआ और दहीबाड़ा के साथ नए व्यंजन बनाने की तैयारी कर रही हैं। जबकि पहले होली सामूहिकता और मेलजोल का प्रतीक थी, अब लोग एकल परिवारों में सिमटते जा रहे हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।

शहर हो या देहात। उत्साह और उमंग के त्योहार होली के रंग में लोग रंगने लगे हैं। होली की तैयारी शुरू हो गई है। दूसरे शहरों से लोग होली मनाने घरों को लौट रहे हैं। होली के सामान से बाजार सज गया है। महिलाएं भी होली में तरह-तरह का व्यंजन बनाने की तैयारी कर रही हैं। होली मनाने के तरीके में समय के साथ बदलाव आ रहा है, लेकिन होली के व्यंजनों में आज भी मालपुआ और दहीबड़ा का जलवा बरकरार है। महिलाओं का कहना है कि जमाने के अनुसार मेन्यू में अन्य व्यंजन जुड़ रहे हैं।
रंगों का त्योहार होली सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का त्योहार है। रंग-अबीर के अलावा इस त्योहार में स्वादिष्ट पकवान का बहुत महत्व होता है। होली में लोगों को दावतें दी जाती हैं। पहले होली में मुख्य रूप से मालपुआ और दहीबड़ा, गुजिया के अलावा कटहल और दूसरे तरह की सब्जियां घरों में बनती थीं। वर्तमान में मालपुआ और दहीबड़ा, गुजिया के अलावा विभिन्न प्रकार का चाट बनाया जाता है। ठंडई की व्यवस्था लोग घरों में दावत में आने वाले लोगों के लिए करते हैं। महिलाओं का कहना है कि होली मनाने के तरीके में काफी बदलाव आया है। पहले लोग सामूहिकता में होली मनाते थे। गांवों में टोली में शामिल लोग होली खेलते हुए किसी के घर चले जाते थे। सभी घरों में पहले से विभिन्न प्रकार का स्वादिष्ट व्यंजन तैयार रहता था। आज लोग एक-दूसरे के घर जाना नहीं चाहते हैं। खाने-पीने की तैयारी भी अब बड़े पैमाने पर नहीं होती है। परिवार के सदस्यों के पसंद के अनुसार होली का मेन्यू बनाया जाता है। पहले की तुलना में स्वास्थ्य के प्रति लोग अधिक जागरूक हैं। व्यंजन बनाने में इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
मां आनंदी संस्थान की निदेशक प्रिया सोनी ने कहा कि होली भारत का एक प्रमुख और प्राचीन त्योहार है। जिसकी कथा प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी हुई है। पहले गांवों में मिलकर लकड़ियां इकट्ठा की जाती थीं और होलिका दहन सामूहिक रूप से होता था। रंग प्राकृतिक होते थे। ढोलक और मंजीरा के साथ होली गीत गाये जाते थे। रिश्तों में अपनापन और मेल-मिलाप पर अधिक जोर होता था। पहले होली पर घरों में सभी तरह की मिठाइयां और नमकीन बनाये जाते थे। मालपुआ बनाने के लिए दूध और मैदा के घोल को घी में तला जाता था। दहीबड़ा घर में दाल पिसकर बनाया जाता था। बादाम, सौंफ, काली मिर्च और दूध मिलाकर ठंडई तैयार की जाती थी। सब कुछ शुद्ध घी और पारंपरिक तरीके से बनाया जाता था। आज होली मनाने के तरीके में बदलाव आया है। प्राकृतिक रंगों की जगह केमिकल रंगों और पिचकारियों का अधिक प्रयोग के अलावा डीजे और तेज संगीत का चलन बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर ‘होली सेल्फी’ और ऑनलाइन शुभकामनाएं आम हो गई। अब लोग बाजार से तैयार मिठाइयां खरीद लेते हैं। फास्ट फूड और नए व्यंजन भी शामिल हो गए हैं। समय की कमी के कारण पारंपरिक तरीके कम अपनाए जाते हैं। पहले की होली सादगी, प्राकृतिक रंगों और पारिवारिक मेल-मिलाप पर आधारित थी। आज भी होली का उत्साह वही है, लेकिन मनाने के तरीके में आधुनिकता आ गई है।
रीना सिन्हा ने बताया कि महिलाओं ने होली की तैयारी शुरू कर दी है। पहले होली में अधिकांश घरों में मालपुआ और दहीबड़ा के अलावा कटहल की सब्जी बनती थी। कटहल की सब्जी खास व्यंजन में शामिल होता था। वर्तमान में भी मालपुआ और दहीबड़ा बनाने की परंपरा है। इसके अलावा परिवार के पसंद के अनुसार घरों में विभिन्न प्रकार का चाट, कचौड़ी, इडली, गुजिया, पोलाव, तड़का आदि बनाया जा रहा है। पहले होली में मोहल्ले और आसपास के लोग घर आते थे और कुछ ना कुछ खाकर ही जाते थे। उसी के हिसाब से महिलाएं पकवान तैयार करती थीं। लेकिन यह परंपरा धीरे-धीरे टूटती जा रही है। लोग दूसरों के घर जाने से परहेज करने लगे हैं। सामूहिकता की जगह एकांकी होली मनाने की परंपरा बढ़ती जा रही है।
रेणु राय ने बताया कि पहले गांव और शहर में मोहल्ले के बच्चे और बुजुर्ग एक जगह जमा होकर होली खेलते थे। किसी के घर जाकर स्वादिष्ट पकवान खाते थे। इसमें अब गिरावट आयी है। पहले व्यंजन का प्रकार कम होता था। लेकिन लोगों के बीच प्रेम अधिक देखा जाता था। एक महीना से लोग होली की तैयारी करते थे। विभिन्न शहरों में काम करने वाले परिवार के सदस्य होली में घर आते थे। नये-नये कपड़े के अलावा होली के दिन तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन घरों में तैयार किये जाते थे। वर्तमान में व्यंजन की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन होली सोसायटी पार्टी बनकर रह गयी है। होली खेलने के लिए मोहल्ले के लोग जमा नहीं होते हैं। मालपुआ और दहीबड़ा होली के स्वादिष्ट और परंपरागत व्यंजनों में शामिल है। आज भी इसे अधिकांश घरों में बनाया जाता है। पहले से महंगाई बढ़ी है, लेकिन व्यंजनों में कमी नहीं आयी है। स्वास्थ्य को लेकर भी लोग अधिक जागरूक हुए हैं। वर्तमान में चाट, इडली, कचौड़ी आदि व्यंजन लोग अधिक पसंद कर रहे हैं।
स्वाति कुमारी ने बताया कि पहले और वर्तमान में होली मनाने और खाने की परंपरा में बदलाव हुआ है। पहले शहर और गांवों में एक महीने जगह-जगह होली के लोकगीत गाये जाते थे। वर्तमान में स्थिति वैसी नहीं है। पहले लोग घर-घर जाकर पकवान आदि खाते थे। समाज के लोग एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाते थे। कोई बुरा नहीं मानता था। अब रंग और गुलाल लगाने पर विवाद होने का डर लगा रहता है। मालपुआ और दहीबड़ा का व्यंजनों में दबदबा पहले भी था और आज भी है। अल्का कुमारी ने बताया कि समाज में संयुक्त की जगह एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। इसका असर होली के उत्साह और उमंग पर भी देखने को मिल रहा है। पहले घरों में दो-तीन दिनों तक तरह-तरह के व्यंजन बनाये जाते थे। लेकिन आज होली के दिन ही व्यंजन बनाये जा रहे हैं। मालपुआ और दहीबाड़ी पहले और वर्तमान में भी अधिकांश घरों में बनता है। बच्चों के पसंद को देखते हुए विभिन्न तरह के चाट और नमकीन के अन्य व्यंजन भी बनाये जा रहे हैं। कस्टर्ड और आइसक्रीम भी लोग तैयार करते हैं। होली में पानीपुड़ी और गोलगप्पा भी घरों में बनाया जा रहा है। घरों में तरह-तरह के फलों की व्यवस्था भी की जाती है।
रीता जायसवाल ने बताया कि पहले होली सम्मेलन होता था। अब होली मिलन होने लगा है। पहले समाज के लोग मिलकर खाना खाते थे। अब लोग घर जाकर अबीर लगाकर और मिलकर चले जाते हैं। पहले मोहल्ले के लोगों को खाने पर आमंत्रित किया जाता था। मालपुआ आटा का बनता था। अब आटा के अलावा छेना, मैदा, खोआ, सुज्जी आदि का भी बनाया जा रहा है। मालपुआ बनाने की प्रक्रिया में बदलाव हुआ है। व्यंजनों की संख्या पहले से बढ़ी है। पुष्पा देवी ने बताया कि होली में मालपुआ और दहीबड़ा का जलवा पहले और आज भी बरकरार है। अधिकांश घरों में इसे बनाया जाता है। वर्तमान में चाट, पापड़ी, गोलगप्पा आदि व्यंजन भी बन रहे हैं। रंग खेलने में भी बदलाव हुआ है।
बोले जिम्मेदार
होली मस्ती और आनंद का त्योहार है। रंगों के त्योहार में लोग मनपसंद पकवान बनवाकर खाएं। मनपसंद का मतलब यह नहीं कि जरूरत से ज्यादा लोग भोजन करें। मिलावटी सामान से सावधानी बरतें। नशा का सेवन बिल्कुल नहीं करें। मस्ती का मतलब नशा नहीं होता है। बिना नशा के भी लोग खुश और मस्त रहते हैं। मधुमेह, हृदय और रक्तचाप से पीड़ित मरीजों को खानपान में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। मधुमेह के मरीज मीठा पकवान नहीं खाएं। रक्तचाप वाले मरीज शुद्ध घी के बने पकवान का सेवन करें। नमक का सेवन कम करें। पेट और किडनी के मरीज मसाला का कम सेवन करें।
-डॉ. डीपी सिंह
इनकी भी सुनिए
पहले होली पर घरों में गिने-चुने पारंपरिक पकवान जैसे मालपुआ, दहीबड़ा और कचौड़ी बनते थे, लेकिन लोगों का आपसी मिलना-जुलना ज्यादा होता था। त्योहार पर पहले जैसा खुलापन और मेलजोल अब कम होता जा रहा है।
-सोनी प्रिया
होली के पकवानों में काफी बदलाव आया है। पहले सादगी थी, अब विविधता है। मालपुआ में अब खोवा और पनीर डाला जाता है। अब घरों में चाट की भी कई किस्में बनने लगी हैं, लेकिन आपस में मिलना-जुलना कम हो गया है।
-पुष्पा अरूण
पहले होली का इंतजार बच्चों को सबसे ज्यादा रहता था, सब एक दूसरे के साथ मिलकर खाना खाते थे। वे पूरे मोहल्ले में घूम-घूमकर रंग खेलते और जहां मन करता, वहीं खाना खा लेते थे। अब त्योहार सीमित होता जा रहा है।
-रीना सिन्हा
अब बच्चों की पसंद को ध्यान में रखकर नए-नए पकवान बनाए जाते हैं। पहले परंपरागत व्यंजन खास होते थे। अब दहीबड़ा की भी कई वैरायटी बनने लगी है। स्वाद में बदलाव आया है, लेकिन पहले जैसा मेलजोल कम दिखता है।
-ममता सिंह
अब होली पर कस्टर्ड और पेठा जैसी मिठाइयों की मांग बढ़ गई है। पहले आटे का मालपुआ बनता था, अब उसमें कई तरह की सामग्री मिलाई जाती है, अब त्योहार का स्वरूप बदल गया है। आज भी कटहल की सब्जी खास है।
-माला पोद्दार
पहले होली का मतलब था पूरे मोहल्ले का एक साथ रंग खेलना और मिलकर पकवान खाना। अब घरों में दहीबड़ा और पुआ के साथ कई नई चीजें जुड़ गई हैं, जैसे चाट, पुलाव, कई तरह के कचौड़ी बनाये जा रहे हैं।
-अलका कुमारी
पहले होली पर सम्मेलन और सामूहिक आयोजन होते थे। लोग बिना किसी संकोच के एक-दूसरे के घर जाते थे। अब मिलन समारोह तो होता है, पर सीमित दायरे में। खाने में भी बदलाव आया है। आधुनिक व्यंजन बढ़े हैं।
-रेनू राय
होली पर दहीबड़ा, मालपुआ और कटहल की सब्जी खास पहले भी थी और आज भी है, लेकिन अब इनके साथ पापड़ी चाट, टिकिया चाट और फ्राइड भी बनने लगे हैं। होली की मिठास अब कम हो रहा है।
-स्वाति कुमारी
पहले होली पर रंग और गुलाल घर-घर जाकर लगाते थे, लोग पूरे दिन एक-दूसरे के घर आते-जाते थे। अब सिर्फ औपचारिकता रह गई है। पकवानों की संख्या में जरूर बढ़ोतरी हुई है, चाट और कस्टर्ड आम होता जा रहा है।
-रीता जायसवाल
होली में अब व्यंजन कई प्रकार के बनते हैं, जैसे पुलाव, फ्राइड राइस और अलग-अलग तरह के चाट। मालपुआ में भी नई सामग्री डाली जा रही है। खाने की चीजें बढ़ी हैं, लेकिन पहले होली में सादगी थी अब थोड़ी कमी आई है।
-किरण देवी
पहले होली पर गिने-चुने पकवान बनते थे, खाने वाले ज्यादा होते थे। अब दहीबड़ा, पुआ और कचौड़ी के साथ कई नई चीजें जुड़ गई हैं, या यू कहें की अब व्यंजन अधिक बनाये जाते हैं, फिर भी पहले जैसी सामूहिकता अब नहीं रही।
-पिंकी देवी
समय के साथ होली के पकवानों की परंपराएं बदल रही हैं। अब घरों में चाट और मीठे की कई किस्में बनने लगी हैं। पहले लोग घरों में पकवान के लिए खुद से मसाला या अन्य समाग्री तैयार करते थे, पर अब रेडीमेड होता जा रहा है।
-राखी कुमारी
होली के खाने में विविधता आई है, कस्टर्ड और पेठा भी शामिल हो गए हैं। लेकिन त्योहार का जो अपनापन था, वह अब कम होता जा रहा है। पहले होली पर पूरा मोहल्ला एक परिवार जैसा लगता था। सामूहिक रूप से लोग होली खेलते थे।
-गुंजन देवी
पहले आटे का मालपुआ बनता था, अब उसमें खोया और छेना मिलाया जा रहा है। दहीबड़ा की भी कई किस्में बनने लगी हैं। होली पर लोगों के घरों में आज खाने की चीजें बढ़ी हैं। महंगाई से किचन पर असर पड़ रहा है।
-प्रतिम देवी
पहले होली पर बच्चे सुबह से शाम तक रंग खेलते थे और सबके घर जाकर पकवान खाते थे। अब कई कारणों से त्योहार सीमित होता जा रहा है। होली पर अब मालपुआ ही नहीं बल्कि घरों में चाट और नए व्यंजन बनने लगे हैं।
-पूनम
होली के पकवानों में समय के साथ काफी बदलाव आया है। अब बच्चों की पसंद को देखते हुए नए-नए व्यंजन बनाए जाते हैं। आज पकवानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन लोगों के बीच अब पहले की तरह मेलमिलाप नहीं रहा।
-निकिता कुमारी
समस्याएं
1. पहले होली पर लोग बिना झिझक एक-दूसरे के घर जाते थे, साथ बैठकर खाते-पीते थे। अब सीमित दायरे में मनाया जा रहा है, जिससे आपसी संबंध कमजोर होता जा रहा है।
2. होली पर पहले कम पकवान बनते थे, लेकिन अपनापन ज्यादा था। अब व्यंजनों की संख्या बढ़ गई है, पर कई परिवार में अब दिखावे तक सीमित हो गया है।
3. होली पर पहले बच्चे मोहल्ले में खुलकर रंग खेलते थे और सबके घर जाकर एक-दूसरे के साथ खाना खाते थे। बच्चों का अब आपसी जुड़ाव कम होता जा रहा है।
4. होली के दौरान मालपुआ, दहीबड़ा जैसे पारंपरिक व्यंजन अब नए तरीके से बनने लगे हैं। इससे पुरानी पारंपरिक स्वाद अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
5. होली पर पहले सम्मेलन और बड़े सामूहिक कार्यक्रम होते थे। अब केवल मिलन समारोह तक सीमित रह गया है। जिससे सामूहिक उत्साह कम हो गया है।
सुझाव
1. होली के अवसर पर मोहल्ले स्तर पर होली मिलन समरोह कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए, ताकि लोग फिर से एक साथ बैठकर त्योहार मनाने का आनंद ले सकें।
2. होली पर अब कई तरह के नए पकवान बन रहे हैं, पुआ की जगह अब मालपुआ बनने लगे हैं। पुराने जैसे आटे का पुआ बने तो होली की संस्कृति बनी रहेगी।
3. होली पर्व में परिवार के लोग बच्चों के लिए सामूहिक रंग खेलने का मौका दें, ताकि आसपास के बच्चों में आपसी सहयोग और तालमेल बना रहे। उनके बीच उत्साह रहे।
4. लोगों को होली के त्योहार को दिखावे से दूर रखकर सादगी और अपनापन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि होली की असली खुशी महसूस हो सके।
5. होली के अवसर पर हर परिवार को पड़ोसियों और रिश्तेदारों को घर बुलाने की परंपरा को फिर से बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिससे संबंध और मजबूत बना रहे।
प्रस्तुति: वीरेन्द्र कुमार, संतोष कुमार, फोटोग्राफ: कान्तेश
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