सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप, गांवों में बढ़ी चुनावी गर्मी
बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। पार्टियां सोशल मीडिया का उपयोग कर ग्रामीण वोटरों को साधने में जुटी हैं। डिजिटल युग में यह सस्ता और प्रभावी माध्यम बन गया है। आईटी...

बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद सियासी पारा हाई है। पार्टियों में जिला से लेकर राज्य स्तर तक सियासी सरगर्मी बढ़ी हुई है। राजनीतिक पार्टियों में भी शंका आशंकाओं के कारण उथल पुथल की स्थिति हो रही है। इस सियासी वार के बीच ग्रामीण परिवेश के लोगों के लिए सोशल मीडिया सूचना का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। पार्टी के संभावित प्रत्याशी ग्रामीण वोटरों को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म के माध्यम से साधने में जुटे हुए हैं।
इसमें युवा वर्ग से लेकर महिलाएं, अधेड़ और बुजुर्ग वर्ग के लोग शामिल हैं। कम खर्च में प्रभावी परिणाम डिजिटल युग में सोशल मीडिया राजनीतिक दलों के लिए प्रचार का बड़ा, सस्ता और प्रभावी माध्यम बनी हुई है। यह माध्यम फॉलोअर के जरिए कम लागत में प्रभावी परिणाम देती है। नेताओं का भी मानना है कि जहां वे अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचाने के लिए पहले इंतजार करते थे, लेकिन बदलते समय में वे सिर्फ सेकंड से भी कम समय में अपनी पूरी बात सोशल मीडिया के माध्यम से कहकर लाखों लोगों के बीच पहुंच जाते हैं।
यह माध्यम राजनीतिक दलों को लोगों के साथ बिना रोक टोक संवाद का मौका देती है। आईटी सेल की धमक बिहार में डिजिटल दौर के अनुरूप ही ग्रामीण से लेकर हर तरह के वोटरों को साधने के लिए क्षेत्रीय पार्टियां भी अपना आईटी सेल तैयार करती है। वे लोग अपने सेल में चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की मदद ले रहे हैं। जो पार्टियों और उनके नेताओं के लिए आकर्षक प्रचार तैयार करते हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर क्षेत्र विशेष के अनुरूप समस्याओं के निदान से जुड़ी वीडियो, रील और मीम्स तैयार करते हैं। जो लोगों तक रोचकता के साथ पहुंचती है।
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