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धीरे-धीरे गुमनामी की ओर बढ़ रहा अररिया का जूट उद्योग, किसानों ने भी मोड़ा मुंह

araria was big name in jute industry now is slowly moving towards oblivion

जूट उद्योग के क्षेत्र में कभी अररिया का नाम हुआ करता था, लेकिन अब यह गुमनामी की ओर बढ़ रहा है। इससे जुड़े कारोबारी कम हो रहे हैं और किसान पाट की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। पाट की गुणवत्ता जांचनेवालों की कमी होती जा रही है। 

अररिया में सिमट गया है जूट उद्योग
आज से करीब 15 साल पहले पूरे जिले में 100 के आसपास गोला (मशीन जिससे जूट को प्रेस किया जाता है) हुआ करते थे। अब इनकी संख्या 40 के करीब रह गई है। अररिया शहर के मारवाड़ी पट्टी में पहले दस गोला हुआ करता था जो चार पर सिमट गया है। बाकी फारबिसगंज में किसी तरह चल रहे हैं।

लागत के अनुरूप भाव भी नहीं मिल रहा
 मारवाड़ी पट्टी से रोजाना 10 से 15 टन जूट मील को जाया करता था जबकि अब मुश्किल से तीन-चार टन। फारबिसगंज में इस कारोबार से जोड़ा एक बड़ा पहचानवाला गोला गाछी था, जो अब बंद है। 1992 से जूट के कारोबार से जुड़े मारवाड़ीपट्टी के अजय वैद बताते हैं खरीद तो हो रही है, लेकिन कमाई नहीं। कारण कि गुणवत्ता नहीं मिल रही है। किसान पाट की खेती नहीं करना चाहते हैं और पाट की गुणवत्ता जांचनेवाले भी कम रह गए हैं। किसानों को लागत के अनुरूप भाव भी नहीं मिल रहा है। इसके विपरीत कम मेहनत में मक्का उपजाने में किसानों को अधिक लाभ मिल रहा है। इसलिए अररिया अब मक्का की खेती का हब बनता जा रहा है। 

जूट कारोबारियों ने अपना धंधा बदल लिया
अजय कहते हैं जूट मील बिहार में नहीं रही। इसके कारण केवल कोलकाता माल भेजना पड़ता है। उनकी मनमानी होती है। पेमेंट बहुत फंसता है। बहुत से जूट कारोबारियों ने अपना धंधा बदल लिया है। वे भी मौके की तलाश में हैं। मारवाड़ीपट्टी के ही जूट कारोबारी वीरेंद्र कुमार कहते हैं कि उनका परिवार इस धंधे में 30-35 साल से है। अब पहले जैसी बात नहीं है। 40 प्रतिशत तक कारोबार कम हो गया है। पाट के किसान मिर्जापुर के शिव नारायण मेहता कहते हैं कि 15 साल से इसकी खेती वे कर रहे हैं। पहले चार से पांच एकड़ में खेती करते थे। अब दस कट्ठे में खेती कर रहे हैं। मजदूर नहीं मिलते हैं। रेट भी ठीक नहीं रहा। पहले जूट कारपोरेशन ऑफ इंडिया (जेसीआई) और बिस्कोमान से भी मदद मिलती थी। अब तो अररिया शहर में जेसीआई का कार्यालय भी नहीं रहा।

अररिया में बाढ़ ने भी पाट की खेती को बहुत बर्बाद किया
किसान रवीन्द्र कुमार मेहता का भी ऐसा ही कहना था। बेलवा के किसान हलीम कहते हैं अब भाव नहीं मिलता है और पाट की खेती में लागत और मेहनत बहुत है। अररिया में बाढ़ ने भी पाट की खेती को बहुत बर्बाद किया है। 2017 की बाढ़ में उनको 50 हजार का नुकसान हुआ था। इस साल भी बाढ़ में नुकसान हुआ है। बाढ़ का पानी पाट की जड़ों में लंबे समय तक रहने से जूट की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अब मकई की खेती में सुविधा और पैसा दोनों है। बाजार भी है।
 
अररिया में अब केवल निम्न गुणवत्ता का जूट
जूट की गुणवत्ता को तीसा देशाल (टीडी) नंबर के आधार पर दिया जाता है। अररिया टीडी05, टीडी 06 और टीडी07। टीडी 01 से लेकर 3 तक तो दूर टीडी 04 भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इसके रेट में 500 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक का अंतर हो जाता है।

कटिहार व समस्तीपुर की मिलें भी बंद
जेसीआई के क्षेत्रीय प्रबंधक पॉल लकड़ा कहते हैं निगम की ओर से पूरा प्रयास किया जा रहा है कि किसान पाट की खेती करें। गांव-गांव में प्रचार और प्रोग्राम चलाया जा रहा है। सोना पावडर भी नि:शुल्क बांटा गया है। जो पाट की खेती के लिये अच्छा होता है। पिछले साल के मुकाबले खेती बढ़ी भी है, लेकिन यह सही है कि पाट की खेती में मेहनत बहुत है। बिहार में समस्तीपुर और कटिहार में जो जूट मील थी वह भी बंद है। बाजार का अभाव तो है।

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