मजूमदार परिवार निभा रहा पहली चादरपोशी की ऐतिहासिक परंपरा, दाता के दरबार में गूंजा सौहार्द धर्म से ऊपर इंसानियत का पैगाम देता
बिहपुर प्रखंड के मिल्की गांव में हजरत दाता मांगन शाह रहमतुल्लाह अलैह का दरबार आपसी सौहार्द का उदाहरण है। यहां सभी धर्मों के लोग एक साथ आते हैं। सालाना उर्स पर मेले का आयोजन हुआ, जिसमें महिलाएं मन्नतें पूरी करने के लिए धागे बांधती नजर आईं। पहले चादरपोशी की परंपरा मजूमदार परिवार द्वारा निभाई जाती है।

बिहपुर, संवाद सूत्र। बिहपुर प्रखंड के मिल्की गांव स्थित हजरत दाता मांगन शाह रहमतुल्लाह अलैह का दरबार आपसी सौहार्द और इंसानियत की मिसाल के रूप में जाना जाता है। यहां न कोई ऊंच है, न नीच, न अमीर गरीब का भेद और न ही धर्म या जाति का फर्क। इस दरबार में पहुंचते ही हर व्यक्ति केवल एक इंसान बन जाता है, जहां सिर झुकाने वालों की कतार में यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस धर्म, पंथ या समाज से जुड़ा है। मिल्की पंचायत में स्थित मजार-ए-शरीफ पर सालाना उर्स के अवसर पर मेले का आयोजन किया गया है।
शुक्रवार की रात उत्सव की शुरुआत परंपरागत सौहार्द की खुशबू के साथ हुई। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार सबसे पहली चादर कायस्थ परिवार द्वारा चढ़ाई गई। इसके बाद दूसरी चादर बिहपुर के अंचलाधिकारी लवकुश कुमार ने चढ़ाई। फिर अन्य श्रद्धालुओं को चादरपोशी का अवसर मिला। उर्स के मौके पर लगे मेले में भारी भीड़ उमड़ रही है। तरह-तरह की दुकानों से मेला गुलजार है, जहां खाने-पीने से लेकर घरेलू उपयोग की वस्तुएं बिक रही हैं। खास आकर्षण का केंद्र तलवार की दुकानें बनी हुई हैं। सड़क किनारे सजी इन दुकानों पर विभिन्न आकार और डिजाइन की तलवारें बिक्री के लिए रखी गई हैं। पूर्णिया जिले से आए एक दुकानदार ने बताया कि वे देश के कई मेलों में तलवार बेच चुके हैं और यहां 200 से लेकर 1500 रुपये तक की तलवारें लोगों द्वारा खरीदी जा रही हैं। मान्यता के अनुसार कभी यह इलाका घना जंगल हुआ करता था और दाता के मजार-ए-शरीफ की रखवाली शेर किया करते थे। ब्रिटिश शासनकाल में भी यहां उर्स-ए-पाक के आयोजन का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि बिहपुर के बालाचंद मजूमदार को एक हत्या के झूठे मामले में फांसी की सजा सुनाई जाने वाली थी। परिजनों ने निराश होकर दाता मांगन शाह से फरियाद की। इसके बाद बालाचंद मजूमदार को बाइज्जत बरी कर दिया गया। उर्स-ए-पाक निगरानी कमेटी के सचिव रबूल हसन, जो वर्ष 2012 से इंतजामिया कमेटी से जुड़े हैं, बताते हैं कि बीते दशकों में दरगाह की व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। मन्नतों के धागों से भर गई दरगाह, महिलाओं की उमड़ी आस्था दरगाह पर इन दिनों आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। जियारत के बाद खासकर महिलाएं मन्नत पूरी होने की उम्मीद में धागे बांधती नजर आईं। सिर पर चुनरी ओढ़े महिलाएं लगातार दरगाह पहुंच रही थीं और श्रद्धा भाव से अपनी मुरादें मांग रही थीं। धागों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी थी कि नए धागे बांधने के लिए जगह ढूंढना मुश्किल हो गया। भागलपुर जिले के भीट्ठी निवासी नसीमा खातून बताती हैं कि दाता मांगन शाह रहमतुल्लाह अलैह उन्हें हर साल अपने दरबार में खुद बुलाते हैं। बीते दस वर्षों से लगातार वह उर्स में हाजिरी लगा रही हैं। एकचारी गनौरा निवासी मो. मांगन बताते हैं कि वह करीब 15 वर्षों से दाता मांगन शाह के उर्स में नियमित रूप से हाजिरी लगा रहे हैं। उनका कहना है कि कोई भी काम या जिम्मेदारी क्यों न हो, दाता के दरबार में पहुंचना उनके लिए सबसे अहम होता है। मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड अंतर्गत देवल निवासी मो. आलम बताते हैं कि वे करीब 20 वर्षों से लगातार दाता मांगन शाह के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। उन्हें कभी मायूस नहीं होने दिया। दाता मांगन शाह के उर्स में पहली चादरपोशी की परंपरा निभा रहे अरविंद मजूमदार दाता मांगन शाह रहमतुल्लाह अलैहे के मजार-ए-शरीफ पर आयोजित उर्स-ए-पाक में पहली चादरपोशी की परंपरा वर्षों से मजूमदार परिवार निभाता आ रहा है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी अरविंद मजूमदार निभा रहे हैं। अरविंद मजूमदार की पत्नी व शिक्षिका हीरा देवी ने बताया कि दाता मांगन शाह के प्रति उनके परिवार में आस्था और श्रद्धा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इसी विश्वास के साथ उनका परिवार हर वर्ष उर्स के अवसर पर पहली चादरपोशी करता है और आगे भी यह परंपरा निरंतर जारी दाता मांगन शाह के उर्स पर खानकाह की ओर से चादरपोशी, सैकड़ों अकीदतमंद हुए शामिल वहीं हजरत सैयदना दाता मांगन शाह रहमतुल्लाह अलैहे के सालाना उर्स-ए-पाक पर शुक्रवार को खानकाह ए आलिया कादिरिया फरीदिया मोहब्बतिया की ओर से चादरपोशी की गई। सज्जादानशीन हजरत अली कौनैन खां कादरी फरीदी व नायब सज्जादानशीन मौलाना अली शब्बर खां कादरी फरीदी की अगुवाई में यह रस्म अदा हुई।
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