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गजब! अंग की धरती पर अंगिका पढ़ाने वाले न शिक्षक और न पढ़ने को इच्छुक छात्र

Bhagalpur University, bhagalpur, TMBU

भागलपुर समेत बिहार और झारखंड के 21 जिलों में लगभग चार करोड़ अंगिका बोलने वाले लोग हैं, लेकिन तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के अंगिका पीजी विभाग में इस बार एक भी छात्र दाखिला लेने नहीं आया। दोनों राज्यों में सिर्फ टीएमबीयू में ही अंगिका की पढ़ाई होती है।
 
सत्र 2018-20 में एक भी नामांकन नहीं
टीएमबीयू में पीजी में 85 सीटें हैं, लेकिन सत्र 2018-20 में एक भी नामांकन नहीं हुआ। अंगिका को बढ़ावा देने के लिए 10 जून 2002 को पीजी विभाग खोला गया था। पहले सत्र में 75 छात्रों का नामांकन हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे संख्या घटती गई। पिछले साल सिर्फ पांच दाखिले हुए। पिछले पांच साल में किसी भी सत्र में छात्रों की संख्या 10 के पार नहीं गई है। विभाग बंद होने के कगार पर है। इसको खोलने का उद्देश्य अंगिका में शोध के अलावा अंगिका लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा और लोक साहित्य को बढ़ावा देना था। 
  
सिर्फ एक शिक्षक हैं पीजी विभाग में
अंगिका विभाग में एक शिक्षक डॉ. मधुसूदन झा हैं। वह भी हिन्दी के हैं। विभाग उनके पास अतिरिक्त प्रभार में है। चार शिक्षकों के पद सृजित हैं, लेकिन बहाली नहीं हुई। अंग उत्थान आंदोलन समित के अध्यक्ष गौतम सुमन बताते हैं कि इसकी पढ़ाई इंटर और स्नातक में भी होनी चाहिए, तब छात्र आएंगे। 

प्रतियोगी परीक्षाओं में अंगिका हो शामिल 
अंगिका भाषा पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए इसे प्रतियोगी परीक्षा में शामिल करने की जरूरत है। इसे लेकर पीजी अर्थशास्त्र के छात्र और अंगिका भाषी आशीष कुमार ने बताया कि अंगिका भाषा पढ़ने से नौकरी नहीं मिलने वाली है। छात्रों का कहना है कि झारखंड राज्य सेवा की प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंगिका को शामिल किया गया है। बिहार राज्य की प्रतियोगिता परीक्षाओं में इसे शामिल किया जाए, जैसे मैथिली शामिल है।

साहित्यिक रूप से धनी
अंग उत्थान समिति का दावा है कि पूर्व बिहार, कोसी-सीमांचल और संताल परगना के 21 जिलों में चार करोड़ लोग अंगिका बोलते हैं। साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र ने बताया कि अंगिका में दर्जनों क्लासिकल साहित्य हैं। आधा दर्जन से अधिक महाकाव्य हैं।

लोग अंगिका को लेकर हीन भावना से ग्रसित
हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. बहादुर मिश्र बताते हैं कि हिन्दी के नामचीन विद्वान और विधान पार्षद डॉ. महेश्वरी सिंह महेश लंदन में भी अंगिका ही बोलते थे। वरीय चिकित्सक डॉ. डीपी सिंह ने अपने क्लीनिक का नाम ही अंगिका रखा है। उन्होंने तीन बच्चों और नतिनी के नाम का टाइटिल भी आंगिक रखा है। उन्होंने कहा कि लोग खुद अंगिका भाषा को लेकर हीन भावना से ग्रसित हैं। जबकि बांग्ला और मैथिली भाषियों को ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अंगिका में बोलकर मरीजों की तकलीफ को दूर करना डॉक्टरों का कर्तव्य है। 

प्रभारी कुलपति प्रो. एलसी साहा ने बताया कि अंगिका से नौकरी के आसार नहीं हैं। इसलिए छात्र नहीं मिल रहे हैं। स्नातक में पढ़ाई का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है। शिक्षक बहाल हों व प्रतियोगी परीक्षाओं में इसे शामिल किया जाए। 
 

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  • Web Title:amazing: Angika Department now verge of closure in TMBU due to neither teacher and nor any admission of students in Department for 2018-20 session