खगड़िया: दो दिवसीय उर्स मेला में अंतिम दिन उमड़ा जनसैलाब
अलौली में जोगिया शरीफ का 124वां उर्स-ए-महमूदी मंगलवार को समाप्त हुआ। इस दौरान देश-विदेश से हजारों जायरीन पहुंचे। कार्यक्रम में सूफियाना क़व्वाली और उर्स की रस्में शामिल थीं। मौलाना गुलाम रसूल बलियावी ने भाईचारे और मोहब्बत का संदेश दिया। उर्स के समापन के बाद जनसैलाब लौटने लगा।

अलौली, एक प्रतिनिधि जोगिया शरीफ में दो दिवसीय 124वां मरकज़ी उर्स-ए-महमूदी का मंगलवार की शाम को समापन हो गया। उर्स में देश-विदेश से हज़ारो जायरीन पहुंचे। समापन के बाद जब उनकी वापसी शुरू हुई तो गांव की सड़कों पर जनसैलाब दिखाई दी। हर तरफ भीड़ ही नजर आई। सहंसी पंचायत के जोगिया शरीफ गाँव में हजरत महमूद बख्श उर्फ फुदन अली जोगियावी का 124वां उर्स मुबारक अकीदत के माहौल में मुकम्मल हो गया। इसमें शिरकत करने के लिए देश-विदेश से हज़ारो जायरीन पहुंचे। सोमवार को पहली रात जलसा का आयोजन किया गया। रात में क़रीब तीन बजे दरगाह पे चादर चढ़ाई गई।
उसी रात उसी स्टेज़ पे जोगिया खानकाह शरीफ के सज्जादा नशी के मझले लड़के मौलना बाबू ज़ुन्नुरैन फरीदी साहब का निकाह भी हुआ। वही दूसरी रात में सूफियाना क़व्वाली भी हुई। इसी के साथ दो दिवसीय उर्स का समापन हो गया। इसके बाद जायरीन की वापसी का सिलसिला शुरू हो गया। दरगाह से लेकर मेन सड़कों पर जनसैलाब दिखा। मेन रोड से लेकर उर्स स्थल दरगाह मैदान और आसपास का इलाका जायरीन से ठसाठस भरा रहा। इस बीच उर्स स्थल पर बने मंच पर कार्यक्रम चलते रहे। उर्स के कार्यक्रम दरगाह प्रमुख सज्जादानशीन हजरत मौलान बाबू सईदैन फरीदी की सदारत व नईब सज्जादानशीन हजरत बाबू सकलइेन फरीदी की कायदात व हजरत बाबू सालिक हुसैन फरीदी की हिमायत में संपन्न हुए। निगरानी बाबू सिबतैन फरीदी की रही। मरकज़ी उर्स में उलमा ने पैगाम दिया। उर्स-ए-महमूदी में दूर दराज से आए देश के जाने माने उलमा ने दीन और मसलक पर पैगाम दिया। वहीं सियासी और सामाजिक विषयों पर भी चर्चा की। मौलाना गुलाम रसूल बलियावी ने कहा कि इसका उद्देश्य भाईचारा, मोहब्बत और इंसानियत को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि सूफीवाद का असल मकसद हर दिल में मोहब्बत और हर इंसान को बराबरी का हक देना है। अंत में बलियावी ने कहा कि आधी रोटी खाओ लेकिन अपने बच्चे को पढ़ाओ। मौलना गुलाम रब्बानी अल्हाबादी ने कहा कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है और इसका आधार सिर्फ मोहब्बत होनी चाहिए। बाबू सिबतैन फरीदी ने कहा सूफी-संतों का पैगाम सदियों से अमन, मोहब्बत और भाईचारे का रहा है। आज हम उसी रोशनी को फैला रहे हैं ताकि समाज में नफरत और दूरी की दीवारें गिराई जा सकें। जैसे ही कुल की रस्म शुरू हुई और लाउडस्पीकर पर कुरान की आयतें गूंजने लगीं, जो जायरीन जहां था उसके कदम वहीं रुक गए । हज़ारो लोगों ने दुआ के लिए हाथ उठाए। इस उर्स (मेला ) को सफल बनाने में बाबू जुन्नराइन फ़रीदी ,बाबू हारमैन फ़रीदी, बाबू नूरुलऐन फरीदी ,बाबू शौक़ फरीदी,बाबू तौफ़ीक़ फरीदी , बाबू फ़ेदाये रसूल फरीदी, बाबू बहराइन फरीदी , बाबू नवाज़ फरीदी , बाबू अमन फरीदी , हाजी अबसार साहब कोलकाता , मौलना मुस्तकीम फरीदी ,हफ़ीज़ तौक़ीर रज़वी , मौलना ज़ुल्फ़क़ार अज़ीमी, हफ़ीज़ असदुल्लाह फ़रीदी आदि ने अहम भूमिका निभाई।

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