बसंत पंचमी पर मां मुंडेश्वरी को तीन क्विंटल ‘तांडुल’ का लगेगा भोग

Jan 21, 2026 09:20 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, भभुआ
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मां मुंडेश्वरी को बसंत पंचमी के दिन तीन क्विंटल तांडुल प्रसाद का भोग लगाया जाएगा। यह प्रसाद बनारस के कारीगरों द्वारा गोविंदभोग या बासमती चावल के आटे, घी, मेवा और चीनी-गुड़ से तैयार किया जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री ने 2012 में इस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित किया था।

बसंत पंचमी पर मां मुंडेश्वरी को तीन क्विंटल ‘तांडुल’ का लगेगा भोग

मां मुंडेश्वरी धार्मिक न्यास समिति के गोदाम में कारीगर कर रहे हैं गोविंदभोग या बासमति चावल, घी, मेवा, चीनी-गुड़ से प्रसाद तैयार भोग लगाने के लिए तत्कालीन दंडनायक मंदिर के कुलपति भागुदलन दिए थे दीनार कालंतर में बंद हो चुकी इस परंपरा को वर्ष 2012 मुख्यमंत्री ने कराई थी शुरुआत (पेज चार की बॉटम खबर) भभुआ, कार्यालय संवाददाता। बसंत पंचमी के दिन शुक्रवार को मां मुंडेश्वरी को तीन क्विंटल ‘तांडुल’ प्रसाद का भोग लगेगा। इसकी तैयारी मां मुंडेश्वरी न्यास समिति द्वारा की जा रही है। इस प्रसाद को बनारस के कारीगर द्वारा बासमति या गोविंदभोग चावल के आटा, घी, मेवा, चीनी या गुड़ से तैयार करना शुरू कर दिए हैं।

इसकी बिक्री के लिए धाम परिसर में समिति की एक दुकान भी है। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा मंदिर में ऑनलाइन प्रसाद चढ़ाने और डाक या कुरियर के माध्यम से श्रद्धालु तक तांडुल प्रसाद पहुंचाने की भी सुविधा उपलब्ध कराई गई है। बताया गया है कि कैमूर की पंवरा पहाड़ी पर स्थित मंदिर में मां भवानी मुंडेश्वरी को तांडुल (चावल) का भोग लगाने की परंपरा प्राचीन है। कोलकाता म्यूजियम में संरक्षित मुंडेश्वरी शिलालेख में उल्लेखित है कि तत्कालीन दंडनायक गोमी भट्ट ने मंदिर के कुलपति रहे भागुदलन को मंदिर को 50 दीनार (मुद्रा) दान किए थे। वह दान विनितेश्वर के मंदिर (मुंडेश्वरी मंदिर) में दीप जलाने एवं ताडुल प्रसाद का नियमित भोग लगाने के लिए था। बिहार राज्य धार्मिक न्यास समिति द्वारा वर्ष 2008 में राष्ट्रीय स्तर के पुरातत्वविदों एवं इतिहासकारों द्वारा कराए गए शोध के बाद शिलालेख की तिथि 108 ई. से लेकर 636 के बीच की बताई गई थी, जिससे पता चलता है कि मंदिर में तांडुल प्रसाद की परंपरा करीब 15 से 19 सौ वर्ष पुरानी है। धार्मिक न्यास पर्षद के तत्कालीन प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल ने वर्ष 2012 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों वर्षों पुरानी, लेकिन कालांतर में बंद हो चुकी तांडुल प्रसाद का भोग लगाने की परंपरा को पुन: आरंभ कराया था। जब मुख्यमंत्री तांडुल के भोग लगाने की पुरानी परंपरा को पुन: शुरू कराने आए थे, तब मुंडेश्वरी धाम में उन्होंने जनसभा को भी संबोधित किया था। तब उन्होंने इस अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल को देश के पर्यटन मानचित्र से जोड़ने और स्तरीय पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। तभी से मुंडेश्वरी ट्रस्ट द्वारा भगवती को तांडुल का नियमित भोग लगाया जा रहा है। बनारस के कारीगर तैयार कर रहे प्रसाद मां मुंडेश्वरी ट्रस्ट के सचिव अशोक कुमार सिंह ने बताया कि तांडुल का अर्थ चावल होता है। तांडुल प्रसाद चावल के आटे को घी में भूनकर उसमें मेवा तथा चीनी या गुड़ मिलाकर लड्डू के स्वरूप में तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि मोकरी के गोविंदभोग या बासमति चावल से बनारस के कारीगरों द्वारा प्रसाद तैयार कराया जा रहा है। मां को तांडुल का भोग नियमित लगाया जाता है। नवरात्र में बढ़ जाती है तांडुल प्रसाद की खपत मां मुंडेश्वरी ट्रस्ट के सचिव अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि बसंत पंचमी के दिन के लिए तीन क्विंटल से ज्यादा तांडुल प्रसाद तैयार कराया जाएगा। शारदीय व चैत नवरात्र में इसकी खपत बढ़ जाती है। श्रद्धालुओं के लिए बिक्री काउंटर भी खोला गया है। मंदिर के पुजारी द्वारा मां को भोग लगाया जाता है। दोपहर की आरती के दौरान तांडुल का भोग और संध्याकाल की आरती में खीर का भोग लगाया जाता है। दोनों वक्त चावल से तैयार प्रसाद का ही भोग लगता है। फोटो- 21 जनवरी भभुआ- कैप्शन- भगवानपुर की पंवरा पहाड़ी पर स्थित मंदिर में मंगलवार को मां मुंडेश्वरी को तांडुल का भोग लगाते पुजारी।

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